Tuesday, December 21, 2010

'पÓ से 'प्याजÓ, 'लÓ से 'लहसुनÓ

मेरे सामने एक प्याज है। इसे मैं एक हफ्ते से टकटकी लगाकर देख रहा हूं कि आखिर बनाने वाले नेे क्या सोचकर इसे 'टियर गनÓ थमा दी। वरना, कितनी खूबसूरत फिगर है। ज्यों-ज्यों कपड़े उतरते जाते हैं, त्यों-त्यों निखार आता जाता है। लेकिन, इतनी मस्त अदाओं वाला प्याज इस समय सबको जार-जार रुला रहा है।
मैं भी रो रहा हूं। एक हफ्ते से सोच रहा हूं कि परिवार के इस इकलौते प्याज को खर्च करूं या ड्राइंग रूम में सजा दूं। किचेन के स्तर से तो ऊपर उठ चुका है वो। पक्का फ्रेम करवाकर दीवार पर लगवाने का इरादा इसलिए नहीं है कि अभी मुझे प्याज के किचेन में वापस लौटने की उम्मीद है। आशावादी हूं न। इसीलिए।
खैर, इसे इसके एक किलो साथियों के साथ पिछले महीने खरीदा था सब्जीमंडी से। बाकी साथी तो पेट की जंग की भेंट चढ़ गए। अब ये इकलौता बचा है। मेरी आंखों का नूर, मेरा कोहिनूर, जाने-जिगर, घर का इकलौता चिराग, चश्मे-बद्दूर। कहने की जरूरत नहीं कि आजकल मैं प्याज की पूजा रहा हूं। खाने के लिए सोचना भी पाप है। लहसुन भी इन दिनों प्याज का मौसेरा भाई बनकर उभरा है।
खाते-पीते घरों के लोग जानते हैं कि लहसुन-प्याज विहीन भोजन करना कितना कष्टप्रद होता है। फिर मैं तो उस खानदान को बिलांग कराता हूं, जहां बकरे का मतलब बिरयानी और लेग पीस का मतलब सिर्फ मुर्गा समझा जाता है। और, दुनिया के तमाम बावर्चीखाने गवाह हैं कि बिना लहसुन-प्याज के बकरे, मुर्गे तो छोडिय़े, झींगा मछली तक कुकर में जाने को राजी नहीं होती।
कल मेरे कुकर ने मुझसे पूछा- कितने दिन मुझे और दाल-भात पर जिंदा रहना पड़ेगा। तुम्हें शाकाहार का संदेशा देना हो तो शौक से दो लेकिन मुझे तो हफ्ते में मिनिमम दो दिन नॉन वेज चाहिए ही चाहिए। कहते हुए कुकर के ढक्कन से लार टपकने लगी। मुझे अफसोस भी हुआ। बेचारा कुकर। यही तो दिन हैं इसके खाने-खेलने के। ऐसे अनेक अवसर आये, जब कुकर का मन नहीं होता था तो भी बकरे का भेजा या मुर्गे की टांग जबर्दस्ती उसमें घुस जाते थे। प्रेशर लगाना पड़ता है। मजबूरी है। आप ही बताइये, वह कौन पत्थर दिल पेटू होगा जो ये सीन देखकर कुकर में सीटी न लगा दे। यही हाल कड़ाही का था। मछली के मूड़ों के बीच खेली-पढ़ी मेरी कड़ाही को आजकल पालक और करमकल्ले से काम चलाना पड़ रहा था। मिक्सी कल पूछ रही थी कि क्या मुझे खाली जूस निकालने के लिए रख छोड़ा है। आजकल मसाला क्यों नहीं पीसते। प्याज महंगा है तो चटनी ही पीस लो। भारी दिन चल रहे हैं क्या। अब मैं इस कम्बख्त कड़ाही और मिक्सी को कैसे समझाऊं कि हम जैसे आम आदमियों के लिए इससे भारी दिन और क्या होंगे।
प्याज महंगा होने से केवल किचेन का ही कुकर नहीं रो रहा है। कूकुर अर्थात कुत्ते भी रो रहे हैं। जो बंगलों की चारदीवारी में बंद रहते हैं, उनकी बात मैं नहीं जानता लेकिन गली के कुत्तों का तो स्वाद चला गया है। कल मैंने कूड़े के ढेर के पास एक कुत्ते को बेमन से टहलते देखा। भोज्य पदार्थों, अंत: और वाह्य वस्त्रों के टुकड़ों, कॉस्मेटिक सामान और कम्प्यूटर के पुर्जों सहित कई चीजें उस कूड़े की शोभा बढ़ा रही थीं लेकिन कुत्ते के चेहरे से उदासी की पर्तें हट नहीं रही थीं। पास ही एक सुअरिया अपनी दिनचर्या जी रही थी। सुअरिया तृप्त होकर खुश थी। कुत्ता उदास। एक तरफ आशा की ताल-तलैया थी। दूसरी तरफ निराशा की सुनामी। एक ओर मुंह लटकाये कुत्ता था तो दूसरी ओर चहचहाती-इठलाती सुअरिया। इधर खुशी, उधर मातम।
थोड़ी देर में सुअरिया ने कुत्ते से पूछा- 'कुत्ता सर! अब तो फिर एनडीए की सरकार बन गई है। लोगों में खौफ नहीं है। वे आधी रात तक घूमने-फिरने लगे हैं। अब तुम्हारे पास उन्हें काटने और भौंकने का चौबीसों घंटों इस्कोप है। चारों ओर सुशासन की बयार नहीं बल्कि आंधी चल रही है। कल मैं टहलते हुए नदी तक चली गयी थी। वहां कई सरकारी कर्मचारी एक अजगर से काम करवाने पर तुले थे। लेकिन वह भी था सरकारी अजगर। वह भी उस जमाने का, जब विभागों में काम न करने का रिवाज था। अजगर टस से मस होने को तैयार न था। इधर कर्मचारियों को भी नया-नया डीए मिला था। वे भी डीए के जोश में थे। बड़ी जोर-आजमाइश हुई। लेकिन होइये वही जो राम रचि राखा। अर्थात, इस युद्ध में विजय की जयमाला अजगर के गले में पड़ी। कर्मचारी ये कहते हुए वापस लौट गए कि दो बार डीए और बढऩे दो। इतने में तो इसे हिलाना भी मुश्किल है। खैर, उस अजगर से मेरी काफी देर बात हुई। तमाम मुद्दों पर। वह आजकल बीमार है। अल्ट्रासाउंड कराया था। डॉक्टर का कहना है कि बिना प्याज का मीट-मछली खाने से इसके पेट में इनफेक्शन हो गया है। दवा चल रही है। सुबह-शाम हरे प्याज वाला सागा खा रहा है और दूध में च्यवनप्राश ले रहा है।Ó
सुअरिया ने ढेर पर आकर गिरी नई लाट को देखकर एक बार अपने होंठों पर जीभ फेरी फिर आगे बोली- 'भाई ये प्याज-व्याज तो चोंचले हैं तुम लोगों के। हम लोगों को देखो। एक ही फेवरिट डिश। हजारों-लाखों सालों से चली आ रही है। न मैन्यू बदला। न अंदाज। सर्वत्र उपलब्ध। न बीपीएल कार्ड की जरूरत न एपीएल की। न चोर चुराये न डाकू ले जाये। न सडऩे का खतरा। न खराब होने का डर। न फ्रिज की जरूरत, न ओवन की। आदमी कुछ भी खाये, उसे कनवर्ट हमारी डिश में ही होना है। प्याज-लहसुन महंगा हो हमारी बला से। लेकिन तुम क्यों उदास हो। देखो दिसंबर खतम हो रहा है। किसी युवती की मादक अंगड़ाई की तरह ठंड अंग-अंग में चुभने लगी है। कितना रोमांटिक मौसम है। खास तौर से तुम कुत्ता समुदाय के लिए। अरे तुम्हें तो अपनी कुतिया को लेकर गोवा या शिमला निकल जाना चाहिए था। यहीं रहना था तो पटना के गांधी मैदान में रैली करते। आने वाले साल को 'अंतर्राष्ट्रीय कुत्ता वर्षÓ घोषित किए जाने की मांग करते... मगर तुम यहां मुंह लटकाये यहां घूरे के ढेर पर उदास बैठे हो। अच्छा बस इतना बता दो कि क्या तुम्हारी कुतिया किसी और के साथ भाग गई है या तुम्हारा पिल्ला पड़ोसी को पापा बोलता है। भगवान के लिए बता दो फिर मैं अपने प्रियतम के पास चली जाऊंगी। देखो कितनी देर से मेरा प्रियतम मैनहोल में युगल स्नान करने के लिए मुझे बुला रहा है।Ó
कुत्ते ने एक लंबी सांस ली और कहना शुरू किया- 'तुम्हें पता है कि किसी कुत्ते के लिए दुनिया की सबसे बड़ी सजा क्या है? उसे हड्डी से दूर कर देना। और हड्डी की सबसे बडी सजा है उसे लहसुन-प्याज से दूर कर दिया जाए। और मैं, एक कुत्ता होकर ये दोनों सजाएं एक साथ भोग रहा हूं। घोर नाइंसाफी है। पहले झुग्गी- झोपडिय़ों की जूठन में भी लहसुन-प्याज के छिलके के दर्शन हो जाते थे। लेकिन अब तो बंगलों के बाहर भी मूली और गोभी के पत्तों का पहरा है। अरे तुम क्या जाना कि दुनिया कितने तरह के स्वादों से भरी हुई है।Ó
कहते हुए कुत्ता बिना बल्ब वाले सट्रीट लाइट के खंभे के नीचे बैठ गया। पास ही किसी मैगजीन का फटा हुआ पेज पड़ा था। उस पेज पर प्याज की फोटो छपी थी और पीछे से गीत की आवाज आ रही थी- 'मैं तो एक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर!Ó

Saturday, October 30, 2010

दरोगा भर्ती लिखित परीक्षा (बिहार)

नोट : हर खंड के सभी सवालों का जवाब देना जरूरी है। हर सवाल के अंक अलग-अलग हैं, जो आपकी एड़ी की नाप और खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा जांचने के बाद निर्धारित किये जायेंगे।

खंड (क) सामान्य ज्ञान

(1) पोस्टमार्टम हमेशा मरने बाद ही क्यों किया जाता है?
(2) मृत्युपूर्व बयान जीवित अवस्था में क्यों दर्ज करवाना चाहिए?
(3) दो पुलिस वालों को मौसेरा भाई क्यों नहीं कहा जा सकता?
(4) एक आदर्श पुलिसकर्मी को अपने सेवाकाल में कितनी बार निलंबित और लाइन हाजिर होना चाहिए?
(5) इनकाउंटर में मरने के लिए अपराधी होना क्यों आवश्यक है?

खंड (ख) व्यावहारिक ज्ञान

(1) मां और बहन की गाली से आप क्या समझते हैं? ये अपने घर में क्यों नहीं दी जा सकतीं?
(2) 'वर्दी पर धब्बाÓ लगाने के पांच सर्वश्रेष्ठ तरीके कौन से हैं? तथा, पिछले वित्तीय वर्ष में इन धब्बों को छुड़ाने के लिए विभाग को कुल कितनी राशि खर्च करनी पड़ी?
(3) 'मुठभेड़Ó आउटडोर गेम है या इनडोर? इसे अपराधियों के अलावा और किन- किन लोगों के साथ खेला जा सकता है?
(4) क्या विभागीय महिलाओं को भी उन्हीं नजरों से देखा जाना चाहिए, जिन नजरों से कुछ पुलिस वाले अन्य को देखते हैं?
(5) प्रदेश के पांच नामचीन अपराधियों की जीवनी और उपलब्धियां संक्षेप में लिखिये। कोई भी जीवनी दो सौ शब्दों से ज्यादा बड़ी न हो। बेशक अपराधी चाहे जितना बड़ा क्यों न हो।

खंड (ग) आरक्षित ज्ञान

(1) 'आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूंÓ की अवधारणा पर जो लोग विश्वास करते हैं, उन्हें समाज में क्या कहा जाता है? चित्र बनाकर इस अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
(2) ट्रक के नीचे खड़े होकर लिए जाने वाले धन को भी ऊपरी आमदनी क्यों कहते हैं? ये अधिकतम कितनी ऊंचाई तक की जा सकती है, जिसमें निगरानी या इंटेलिजेंस का खतरा न हो?
(3) पांच अपराधी प्रति माह फरार होने की दर से पूरी जेल खाली होने में कितने वक्त की दरकार होगी?
(4) टिप्पण्ी लिखिये : कमीना, कुत्ता, पितृ नाम से अनभिज्ञ, मसालेदार मदिरा, डंडे का महात्म्य।
(5) थाने में ताला डालने में क्या-क्या कानूनी अड़चनें सामने आती हैं?

असली राशिफल- अपने कर्मों के आधार पर देखें

मेष : - इस राशि वालों के पंचम घर में राजद और छठे में बची-खुची लोजपा है। दूसरी ओर जद-यू और भाजपा का पंचक भी किलकारी मार रहा है। अत: थूक कर चाटने से बचें। आवश्यकता होने पर ही थूकें। किसी तरह काम न चले तो उसे गटक लें। ये प्राकृतिक विटामिन का काम भी करता है। आश्वासन और भाषणबाजी से कुछ दिनों के लिए तोबा कर लें। समाज से ध्वनि प्रदूषण कम करने में अपना हाथ बंटायें।

कर्क :- आपकी कुंडली में काले धन और काली महिला का योग है। यदि आप भी काले हैं तो कहना ही क्या। आपके दोनों हाथों में लड्डू है। अमावस की रात में चेहरे पर कालिख पोत कर और काला कंबल ओढ़कर, बिना स्ट्रीट लाइट वाली सड़क के खुले मैनहोल के पास काले कुत्ते को काली मसूर की दाल खिलायें। साथ में आप भी खायें। मनोकामना पूर्ण होगी। जमीन पर चलने से बचें। रात में एक पैर बांधकर सोयें।

तुला :- बड़ा लड़का प्रेम विवाह करेगा। जिसके कारण दहेज हानि का योग है। छोटे की शादी में भरपूर मिलेगा लेकिन वह सब बारात बिदा कराकर लौटते समय लुट जायेगा। उसमें अगर आप बच गये तो जिंदा रहेंगे। बेहतर हो कि बचे हुए कामकाज जल्द से जल्द निपटा लें और संपत्ति का बंटवारा कर दें। किसी पर भरोसा न करें। खुद पर भी नहीं। पंद्रह दिन तक आधी रात को देसी दारू पीकर बुलंद आवाज में पड़ोसियों को गालियां दें। सोलहवें दिन बिना किसी प्रयास के आप पोस्टमार्टम हाउस पहुंच जायेंगे। वहां से मोक्ष पाने का प्रयत्न करें।

मकर :- उदर विकार रहेगा। पेट में बातें पचाने में कठिनाई होगी लेकिन परनिंदा में आनंद आयेगा। हां, पड़ोसियों से संबंध खराब होने का पूरा-पूरा खतरा है। जीवन साथी आपके चरित्र पर शक करेगा। किंतु उसकी परवाह न करते हुए नये संबंधों को बदस्तूर जारी रखें। बच्चों को प्रेम विवाह के लिए उकसायें क्योंकि दहेज के जमाने में बेटी को डोली में बिठाना आपके बूते में है नहीं। बड़ा लड़का भी किसी लड़की को भगा कर लायेगा। अग्रिम जमानत का बंदोबस्त कर लें क्योंकि अपहरण का मुकदमा आप पर भी लदने का अंदेशा है।

वृष :- बुरी तरह अपमान का योग है। पुलिस से सहायता हरगिज न मांगें। अपरिहार्य हो तो किसी अपराधी को कांफीडेंस में लें। मनोदशा पिछले अपमान जैसी ही रहेगी। अर्थात, दूसरों की पत्नियों को आप घूरेंगे और दूसरे आपकी। ऐहतियात और संयम से काम लें। वरना मोहल्ले के साथ-साथ घर में भी चप्पलें पडऩे का खतरा है। एक आंख बंद करके किसी पैदायशी एक आंख वाले को एक समय का भोजन करायें और उसे भोजपुरी गानों की सीडी भेंट करें।

सिंह :- आपका खराब समय शुरू हो चुका है। दफ्तर में बॉस से कहासुनी होगी। तो आपकी नौकरी कितने दिन चलेगी। नौकरी नहीं रहेगी तो घर में बीवी क्यों रहेगी। वह मायके जाने की धमकी देकर आपके बॉस के घर की शोभा बढ़ायेगी। ऐसी स्थिति आने से रोकने के लिए रोज सुबह-शाम बॉस के साथ उनकी पत्नी की भी आरती उतारें। बुधवार की दोपहर को पत्नी पीडि़त दोस्तों के साथ बैठकर 'बेवफा बीवीÓ कहानी का पाठ करें। पाठ की समाप्ति कर सब मिलकर दो-दो पैग दारू का प्रसाद ग्रहण करें।

वृश्चिक :- आप गल्ती से मनुष्यों में पैदा हो गये हैं। इस सच्चाई को शीघ्र से शीघ्र स्वीकार करें और मोहल्ले के कुत्तों की सोहबत करें। उनकी चाल-ढाल, बोलचाल, आचार-विचार और चरित्र का अध्ययन करें। एक पैर उठाकर आवश्यक कार्य निपटायें। भोजन करते समय हाथों का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। कोशिश करें तो लेटकर भी सुगमता से खाना सीख जायेंगे। आधी रात को उठकर मोहल्ले के कुत्तों के सुर में सुर मिलाने का अभ्यास करें। इसे उस दिन सफल मानें, जिस दिन कोई कुतिया आपकी आवाज से मुतस्सर होकर खिंची चली आये। चार पहिया वाहनों से सावधान रहें।

कुम्भ :- आपके पंचतत्वों, क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा में जल का तत्व गौण है। आंखों में तो कभी था ही नहीं। अर्थात आपमें राजनीति करने के पूरे लक्षण हैं। एकाध आपराधिक मुकदमे भी खुद पर चलवाने का प्रयास करें। आपके अंदर चूंकि जल का तत्व गायब है इसलिए आपको जल से परहेज रखना चाहिए। पानी तभी पियें जब प्यास लगे। नीट पानी तो हरगिज न पियें... उसमें रम, व्हिस्की या ठर्रा आदि पौष्टिक पेयों का अवश्य समावेश करें। स्नान करने की कतई न सोचें। आपके लिए एक चुल्लू ही काफी है। ऐसे में बाथरूम के भीतर कदम रखना आपके लिए हितकर नहीं है।

Saturday, April 24, 2010

चंद नये यातायात संकेत

अपना शहर जो दुर्भाग्य या सौभाग्य से ऐन बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। इस शहर में लोग चलने के लिए प्राय: दो विधियों का प्रयोग करते हैं। एक - सड़क और दूसरे - गढ्डे। सड़क और गढ्डों का वही संबंध है जो छायावादी कवियों ने चोली और दामन तय कर दिया है। इसलिए दोनों को एक- दूसरे से जुदा करने पर वही दफा लगती है, जो लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट, सलीम-अनारकली, हीर-रांझा आदि प्रागैतिहासिक प्रेमी युगलों के खिलाफ साजिश रचने वालों पर लगी थी। फिर भी जुदा नहीं किया जा सका। तो नगर निगम किस खेत की मूली है। इसलिए जनता जब ज्यादा शोर मचाती है तो कुछ सड़कों बनाने के लिए निगम तोड़ देता है। अर्थात निर्माण के लिए विध्वंस। एक डान को मारने के लिए दूसरे को पैदा करना ही पड़ता है। यही सृष्टि का भी नियम है।
खैर, बात हो रही थी शहर की, जो दुर्भाग्य या सौभाग्य बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। सवाल यह है कि शहर में लोग चलते कैसे हैं। जैसा मैंने ऊपर कहा कि शहर में चलने के लिए सर्वाधिक सुलभ साधन दो ही हैं- सड़क और गढ्डे। वो बात अलग है कि कुछ ज्ञान पिपासु अपनी जिज्ञासा शांत करने को मैनहोल या नाले का रुख भी कर लेते हैं।
कुछ शव के रूप में शहर को अपना अंतिम दर्शन देते हैं। बाकी इसकी जरूरत भी नहीं समझते और परिवार को मुआवजे के हवाले करके सीधे बैंकुठधाम की राह पकड़ लेते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनकी आत्मा को दुर्घटना मे मरने के बाद ही शांति मिलेगी। अत: वे वही रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। वैसे मरने के लिए बाढ़ और सूखा भी विकल्प हैं लेकिन काफी लोग इतना धैर्य नहीं रख पाते। आप ही बताइये कि जाड़े में मरने का मूड बनाने वाला व्यक्ति क्या अगली बरसात की राह देखेगा। वो भी भरोसा नहीं कि बरसात हो ही जाएगी।
हालांकि आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम हमारी पुलिस भी करती है लेकिन लोगों का उस पर विश्वास नहीं। फर्जी एनकाउंटर भले थम गए हों लेकिन 'अपराधी' को मारने पर किसी युग में प्रतिबंध नहीं रहा है। आज भी नहीं है। लेकिन कुछ लोग पिछड़े के पिछड़े ही बने रहना चाहते हैं। पुलिस के हाथों मरने में उनकी नानी मरती है।
बहरहाल, मेरे कहने का लब्बो-लुआब ये है कि सांसारिक माया-मोह से छुटकारा पाने को शहर की सड़कें और गडढे भी कम भूमिका नहीं निभाते। मेरे एक परिचित का करीब तीस वर्ष का अनुभव है नगर निगम का। वह उसके कर्मचारी नहीं हैं लेकिन मुकदमा लड़ते- लड़ते कानून और नियमों के पक्के जानकार हो गए हैं। उनका कहना है कि नगम के संविधान में सड़कों का प्रावधान तो है लेकिन गढ्डों का नहीं। शायद संविधान लिखने वालों ने गढ्डों की कल्पना नहीं की होगी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में कोई गढ्डा प्रधान युग आएगा, जिसमें शहर, मोहल्ला और सड़क क्या.. पूरे के पूरे देश को ही समा लेने की क्षमता होगी।
हमारे - आपके सौभाग्य से ये वहीं युग है। सड़क से लेकर विधानसभा तक गढ्डे ही गढ्डे हैं। अलग- अलग साइज और प्रकृत्ति के। शहर में यातायात भी सदा सुहागन है। गढ्डों के आसपास मौजूद सड़क के किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, इसके लिए यातायात विभाग और थाना-चौकी भी हैं। इसके अलावा काफी अरसे से महसूस किया जा रहा था कि सड़कों और चौराहों पर जो यातायात संकेत के बोर्ड लगाए जाते हैं, वे शहर की फितरत से मेल नहीं खाते। इस शहर को ऐसे संकेतों की आवश्यकता है, जिसके लोग अभ्यस्त हैं। विभाग की सुविधा के लिए परिस्थितयों का उल्लेख मैं कर देता हूं। उनके लिए संकेत यातायात विभाग तय कर ले।
मुलाहिजा हो :-
* चौराहे पर पुलिस की जगह गाय बैठी है। कृपया उसके गोबर को क्षति पहुंचाये बिना सड़क पार करें।
* स्ट्रीट लाइट खराब है। लेकिन खंभे में करंट आता है। सावधान रहें।
* अगले मोड़ पर पिस्तौल- चाकू से लैस दो कार्यकर्ता लैस मिल सकते हैं। अपना भला- बुरा आप खुद सोच लें।
* सिपाही जी की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए ट्रक वालों से निवेदन है कि खुले पैसे लेकर चाय की दुकान पर आ जाएं।
* चौराहे पर कुत्तों के वर्चस्व की जंग जारी है। और, अस्पताल में रैबीज के इंजेक्शन नहीं हैं।
* यहां उत्तम किस्म की नकली दारू हर समय मिलती है। चुनाव, रैलियों या विशेष अवसरों पर आर्डर देकर सप्लाई की व्यवस्था है।
* आगे जाम लगा है। तुरंत पीछे लौट जाएं वरना फिर पलट भी न सकेंगे।
* इस रोड पर विधायक निधि से अतिक्रमण किया गया है। उसे घूरें नहीं।

Wednesday, April 21, 2010

जलजमाव - गंदगी पर उच्च स्तरीय वैज्ञानिक विश्लेषण

शहर की गंदगी अब एक तरह से ब्रांड बन चुकी है। चैनल वाले उसे इतने ऐंगल से घुमा- घुमाकर दिखा चुके हैं कि अब गंदगी का सारा ग्लैमर खत्म हो चुका है। इतने मनोयोग से शायद फैशन परेड का कवरेज भी नहीं करते होंगे। खैर, इधर सुनने में आया है कि गंदगी से अब सरकार, विपक्ष, अधिकारी और पीडि़तों से लेकर नॉन पीडि़तों तक के सब्र का पैमाना भर चुका है। यही नहीं बरसों पूर्व स्वर्गीय हो चुके स्वनामधन्य वैज्ञानिक भी इस गंदगी से चिंतित हैं।
पिछले दिनों इन वैज्ञानिकों की आत्माओं का एक अखिल ब्रह्मांड सम्मेलन अंतरिक्ष के गांधी मैदान में हुआ। सम्मेलन में मुजफ्फरपुर की गंदगी, अतिक्रमण, वसूली, बिजली, पानी, कूड़ा- कचरा, जलजमाव, अस्पताल आदि समस्याओं पर भी विचार किया गया। चूंकि ये विश्लेषण चोटी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, इसलिए इसे 'चोटी का वैज्ञानिक विश्लेषण' नाम दिया गया।
महान वैज्ञानिक आइंसटीन का मानना था कि मई के महीने में साढ़े तीन सौ प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के उल्कापिंड धरती पर अस्सी डिग्री देशांतर से दशमलव पंद्रह मिलीमीटर ईस्ट में गिरते हैं। ये जगह ठीक वहां है, जहां अघोरिया बाजार का नाला गिरता है। लेकिन दिखता नहीं क्योंकि उस पर अतिक्रमण किया गया है। अत: जब तक तीन अरब साल से जारी उल्कापिंडों की इस बारिश को कर्क रेखा से पौने पांच सौ वर्ग माइक्रोमीटर देशांतर में शिफ्ट नहीं किया जाएगा, तब तक कल्याणी चौक के जाम की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
ये सुनकर आर्कमिडीज की आत्मा को क्रोध आ गया। वह बिगड़कर बोली- 'जलजमाव का मुझसे ज्यादा तजुर्बा है आपको। मैं तो डिक्लेयर्ड साइंटिस्ट ही वहीं हुआ।' खैर, दादा आर्कमिडीज ने जो फार्मूला बताया, उसके अनुसार जलजमाव प्रभावित क्षेत्रों की टोटल गंदगी को नालों की सिल्ट में जोड़ने के बाद उसमें नगर निगम के कुल कर्मचारियों की संख्या का गुणा करने पर जो संख्या ज्ञात होगी, उसमें अघोरिया बाजार के आयतन का भाग दे दें। इस भागफल और भारत के अंतरिक्ष भाग्यफल में जो अनुपात है, उससे क्षेत्र की कुल गंदगी का पता लगाया जा सकता है। और तब ही इसका समाधान हो सकता है।
गुरुत्वाकर्षण के नियम यदि न्यूटन ने खुद न बनाये होते तो इस वक्त वहां दरोगा जी फौजदारी का मुकदमा लिख रहे होते। बात ही कुछ ऐसी कही थी आर्कमिडीज ने, जिसे सुनकर न्यूटन का खून खौलने की इजाजत मांगने लगा। आर्कमिडीज का फार्मूला उन्होंने सुना। एकदम असहमत थे उससे। उनके हिसाब से भारत का अंतरिक्ष भाग्यफल और अघोरिया बाजार की गंदगी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सर आइजक का मानना था कि ये सब क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप है। यदि अघोरिया बाजार को उसी तरह पलटा जा सकता, जिस तरह पैजामा सीधा करके पहना जाता है तो निश्चित रूप से वहां पांच अरब साल ईसा पूर्व हुए जलजमाव के निशान मिल जाएंगे। वर्तमान संकट तो तत्कालीन दमन की प्रतिक्रिया भर है। हालांकि दुनिया को गति के नियमों से परिचित कराने वाला महान वैज्ञानिक इस बात पर अवश्य हैरान था कि नगर निगम के कार्य की गति कौन से नियम से प्रतिपादित होती है।
इसके बाद सम्मेलन में गैलीलियो, राबर्ट बंधु, मार्कोनी, ग्राहम बेल, वगैरह- वगैरह ने भी अपने- अपने शोधपत्र पढ़े। जिनसे निष्कर्ष निकला कि जब तक शहर के आपेक्षिक घनत्व और नगर निगम की आद्रता की रासायनिक प्रतिक्रिया होती रहेगी, तब तक इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। मुख्यमंत्री कर लें तो भले कर लें।

Tuesday, April 20, 2010

थूक का महात्म्य

'थूक' एक प्रकृति प्रदत्त पदार्थ है और थूकना मनुष्य प्रदत्त आदत। 'थूक' का उत्पादन मनुष्यों और पशुओं दोनों प्राणियों में समान रूप से होता है। अभी ये तय नहीं हो सका है कि 'लार गिरना', 'थूक कर चाटना', 'थू-थू करना' या करवाना जैसे मुहावरे मनुष्यों की वजह से गढ़े गए या पशुओं की वजह से।
खैर, उत्पादन भले पशुओं में भी होता हो लेकिन इसका सर्वाधिक वितरण सर्वाधिक मनुष्यों में ही होता है। कुछ लोग इसका वितरण किए बिना बात तक नहीं कर पाते। इनके सामने खड़ा व्यक्ति या तो बार-बार अपना चेहरा रूमाल से पोंछता रहता है या फिर सामने वाले के जोरदार झापड़ रसीद कर देता है।
मुहावरे की दृष्टि से ये प्रक्रिया 'मुंह पर थूकना' की श्रेणी में आती है। लेकिन मुहावरे में चूंकि मुंह पर पड़ने वाले छींटों की मात्रा तय नहीं की गयी है, इसलिए ये प्रक्रिया आज तक गुमनामी की जिंदगी जी रही है। 'थूककर चाटना' एक अन्य मुहावरा है। इस मुहावरे में चूंकि पदार्थ का स्वाद स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे स्वांत: सुखाय की श्रेणी में मान लिया गया है।
राजनीति में थूककर चाटने वालों का सबसे ज्यादा महत्व है। बल्कि यूं कहें कि केवल राजनीति ही ऐसा क्षेत्र है, जहां थूकने और फिर चाटने की पूरी आजादी है। इसका प्रमाण है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल को थूकने या चाटने के लिए गठबंधन करते नहीं देखा गया। इसके लिए पूरी स्वतंत्रता दी गई है। आदमी कहीं भी कुल्ला भर- भरके थूक सकता है और विकास में अपना हाथ बंटा सकता है। सच कहा जाए तो राजनीति में थूकने और चाटने की असीम संभावनाएं हैं। मैनेजमेंट की भाषा में कहा जाए तो कामयाबी पाने की महत्वपूर्ण टिप।
बिहार एक खैनी प्रधान प्रदेश है। खैनी और थूक का चोली-दामन का साथ है। दूसरे शब्दों में खैनी को थूक फैक्ट्री का रा-मैटेरियल भी कहा जा सकता है। यदि मान लिया जाए कि सूबे में प्रतिदिन तीन मीट्रिक टन खैनी की खपत है तो निश्चित मानिये कि थूक का उत्पादन भी इससे कम कतई नहीं होगा। अब यदि राष्ट्रीय औसत निकाला जाए तो बिहार थूक उत्पादन में अग्रणी राज्यों में होगा।
लेकिन अफसोस कि तमाम खनिज संपदा की तरह ये संपदा भी समुचित योजनाओं के अभाव में बर्बाद हो रही है। सैकड़ों क्विंटल थूक चौराहों, गलियों, सरकारी कार्यालयों के कोनों, दीवारों, डस्टबिनों आदि में बर्बाद कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे प्रदेश का सैकड़ों टन थूक दूसरे प्रदेशों की धरती सींच रहा है। ये अपने संसाधनों की बर्बादी नहीं तो क्या है।
हर व्यक्ति को कहीं भी थूकने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे उन राज्यों या विदेशी सरकारों से सख्त नफरत है, जो थूकने पर जुर्माना वसूल लेती हैं। यह प्राकृतिक संपदा का अपमान ही नहीं, हमारी बरसों पुरानी आदत का दमन भी है। लेकिन खुशी की बात है कि हमारे प्रदेश में थूकने की पूरी आजादी है। कहीं भी थूक सकते हैं लेकिन इसके लिए सबसे माकूल जगह सड़क मानी गई है। .. क्योंकि वह अपनी जागीर होती है। उसे तोडि़ये, खोदिये, अतिक्रमण कीजिए, थूक की नदियां बहा दीजिए या कितना भी अत्याचार कीजिए, वह बेचारी चूं तक नहीं करती।
हां, सड़क पर थूकने वाले कभी- कभी गलतफहमियां अवश्य पैदा कर देते हैं। कुछ लोग इस डिजायन से थूकते हैं कि खड़े होकर देखने पर गिलट का रुपया लगता है। इस चक्कर में बाद में अपने हाथ चुपचाप पैंट से पोंछते नजर आते हैं। मेरे एक पड़ोसी को थूकने के बाद कुछ देर निहारने की आदत थी। पता नहीं वह उसमें क्या तलाशते थे जो उन्हें पूरे जीवन नहीं मिला और एक दिन अचानक उसी थूक को निहारते- निहारते उनकी आत्मा उसी में समाहित हो गई।
एक बात और। लहू का रंग भले एक होता हो लेकिन थूक का नहीं। काल-परिस्थिति और आदतों के अनुसार यह बदलता रहता है। जैसे तंबाकू खाने वाले व्यक्ति से आप दूध जैसे उजले थूक की कल्पना नहीं कर सकते। इसी विधि से लाल, हरे, नीले, चितकबरे, सिल्की सिल्वर, मून लाइट, गोल्डन सिल्वर आदि रंगों का थूक देखकर आप उसके जनक के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। गनीमत है कि भविष्यवक्ताओं तक अभी ये आइडिया नहीं पहुंचा है। वरना हर पैथेलाजी लैब में एक ज्योतिषी भी बैठा नजर आने लगेगा।
लार को थूक की छोटी बहन कहा जा सकता है। जो अक्सर दूसरों की सुख-समृद्धि देखकर खुद-ब-खुद चू जाती है। खैर, बात थूक की चल रही थी। इसी थूक की वजह से कई बार प्रदेश मुसीबतों में पड़ते-पड़ते बचा है। घटना छठ के आसपास की है। एक नेता जी ने गंगा भ्रमण के दौरान उसमें थूक दिया। गंगा मैया को थूक अर्पण की इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई। किसी ने थूक का बदला थूक से लेने की प्रतिज्ञा कर डाली। तो कोई नेता जी के थूक के कतरे गंगा जी से ढुंढवाकर उसका डीएनए टेस्ट करवाने पर अड़ गया। जिनकी समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने गंगा जी की ओर मुंह करके जोरदार प्रणाम किया और जोर से खंखारकर वहंीं रेत पर थूक दिया। ताकि सनद रहे और आने वाली बरसात में रेत में सूख चुका थूक नदी के पानी में मिलकर अमृत बन जाए। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जितनी विधियो हो सकती थीं, सब अपना ली गई।
कहने का मतलब सब हुआ लेकिन बेचारी गंगा मैया के विचार जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। मैली गंगा का उलाहना तो सभी देते हैं किंतु अपने हिस्से की गंदगी को उसमें बहाने से गुरेज नहीं करते। कहते हैं कि गंगाजल में मिलकर हर चीज पूज्य और पवित्र हो जाती है। अत: भविष्य में यदि वैज्ञानिकों के हाथ नेता जी के थूक के अवशेष लग जाएं तो उसे पवित्र मानकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवा दी जाए। मगर इस मुद्दे पर एक- दूसरे की थू-थू से बिल्कुल तोबा कर ली जाए। थोड़ा कहे को ज्यादा समझिएगा। नो स्पिटिंग प्लीज!

Monday, April 19, 2010

हाय आलू! हाय भंटा! हाय परवल! हाय मूली!

पहले ऐसा माना जाता था कि सब्जी खाना स्वास्थ्यवर्धक होता है लेकिन आजकल ऐसा महसूस हो रहा है कि सब्जी खाना समृद्धता की निशानी है। पिछले दिनों मैं गल्ती से सब्जीमंडी चला गया। वहां सब्जियों के भाव सुनकर गश आते- आते बचा। आलू से लेकर पिद्दी भर का कद्दू तक ऐंठा बैठा था.. जैसे शेयर मार्केट का सारा कारोबार इन्हीं के भरोसे है। दलाल स्ट्रीट में बैठे दलालों पर अफसोस भी हुआ। आज तक एक भी सब्जी को लिस्टेड क्यों नहीं किया गया। शायद लोग भूल गये कि मामूली सा प्याज तक इस देश की सरकार बदल चुका है। खैर!
ऐसा नहीं है कि मेरे परिवार में सब्जी खाने का रिवाज नहीं है। सो तो जानने वाले जानते हैं कि मैं खाते-पीते, पहनते-ओढ़ते खानदान को बिलांग करता हूं। इतिहास गवाह है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय भी मेरे पूर्वजों ने अंग्रेजों से ज्यादा विरोध उड़द की दाल और जिमिकंद की सब्जी का किया था। क्योंकि, दोनों चीजें कब्जावर हैं। गैस बहुत बनाती हैं। गैस्ट्रिक के मरीज जानते हैं कि गैस कितनी लज्जाहीन परेशानी है। खुद को भी परेशान करती है और बगल में बैठे व्यक्ति को भी। मेरे विचार से दुनिया में संभवत: गैस ही ऐसी एकमात्र बीमारी है, जो मरीज के साथ उसके तीमारदारों और वातवरण को भी प्रभावित करती है।
बहरहाल मेरे खानदान में सब्जी खाने का इतिहास काफी पुराना है.. पाषाणकालीन सभ्यता से भी पुराना। प्रमाण यह कि मैं तकरीबन सारी सब्जियां पहचानता हूं। मगर इधर पता नहीं कौन सा शनि मेरे मंगल में प्रवेश कर गया कि अमंगल ही अमंगल हो गया। सब्जियां खाना तो दूर, इधर मैं उन्हें देखने तक को तरस गया हूं। पिछले हफ्ते मैंने डरते- डरते अपनी शरीक-ए-हयात से पूछा- 'क्यों जी! आजकल क्या कोई ऐसा व्रत चल रहा है, जिसमें सब्जी खाना मना होता है। सच पूरे पंद्रह दिन हो गये.. मैंने निनुआ का छिल्का तक नहीं देखा।'
बस मेरा यह कहना था कि वह सड़े हुए कुम्हड़े जैसी फट पड़ीं- 'दिमाग सटक गया है या स्पीडी ट्रायल के चक्कर में जल्दी सठिया गये हो। चले हो प्रिंस आफ वेल्स बनने। कुछ पता भी है। सब्जियों में आग लगी हुई है। फायर ब्रिगेड वाले शहरों, कस्बों की ही आगें बुझाने में हांफ रहे हैं.. यहां तो भगवान भी मालिक बनने को तैयार नहीं।' ये सुनकर मेरे अंर्तमन ने मुझे कांपने की आज्ञा दी लेकिन बिना वास्तविकता जांचे कांपना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ था। इसलिए तुरंत झोला उठाया और चला आया सब्जीमंडी। अब आगे की कथा जरा दिल थामकर।
पूरी मंडी में एक अलग किस्म की दहशत व्याप्त थी। हर सब्जी के आगे टैग लगा हुआ था, जिस पर उसका मूल्य अंकित था। बस हाल मार्क की कमी थी वरना सब्जियों और सोने के तेवरों में कोई फर्क नहीं था। ग्राहक सहमे हुए थे। दिल के मरीजों की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। पता नहीं किस सब्जी का भाव सुनकर दौरा पड़ जाये।
कटहल, मटर, मशरूम और शिमला मिर्च जैसी चीजें ब्लैक कैट कमांडो की कड़ी सुरक्षा में थीं। इन्हें छूना तो दरकिनार देखना भी आसान न था। उसके लिये सचिवालय से पास बनवाना पड़ता था। मंडी में रह- रहकर सूचना प्रसारित की जा रही थी कि आफ सीजन सब्जी खरीदने लोगों के लिए पैन संख्या का उल्लेख करना आवश्यक है।
मैंने एक दुकानदार से डरते- डरते आलू का भाव पूछा। उसने ऐसे घूरा जैसे तसल्ली कर लेना चाहता हो कि औकात भी है आलू खरीदने की या खामखां टाइम खोटी करने चले आए। फिर कुछ सोचकर बोला- 'एक रुपए जोड़ा!' दाम सुनकर अपनी शरीक-ए-हयात का चेहरा याद आ गया, जिसके खाली हाथ लौटने पर और सुर्ख हो जाने का पूरा- पूरा खतरा था।
हिम्मत करके आगे पूछा- 'और भय्या.. भंटा क्या भाव?'
'पचास पैसे प्रति वर्ग इंच!'
'यार भंटा बेच रहे हो या अपार्टमेंट।' मैंने कह तो दिया लेकिन इससे पहले कि दुकानदार वीर रस में प्रवेश करे, आगे बढ़ गया।
अगले दुकानदार से कुछ कहने की जरूरत न पड़ी। उसे शायद लगा कि मैं सूचना कार्यालय से सूचना पाने के अधिकार के तहत सूचनाधिकारी की स्वीकृति लेकर उसे सूचित करने आ रहा हूं। इसलिए पास पहुंचते ही बिना कामा- फुल स्टॉप के चालू हो गया-
'ध्यान से नोट कर लीजिये। मैं एक बार में ही सारी सब्जियों के भाव बता देता हूं.. मूली दो रुपए प्रति सेंटीमीटर, परवल का छिल्का चार रुपए पाव, हरी धनिया एक रुपए की चार पत्ती, मिर्च एक रुपए जोड़ा, टमाटर, कुंदरू और भिंडी दो रुपए में दो मिनट दिखाये जाएंगे। अंडरस्टैंड.. हिंदी में कुछ समझे। अब आगे बढि़ये.. चलिये, दुकान के सीधे प्रसारण का समय हो रहा है। चैनल वाले आते ही होंगे।'
इसके बाद के शब्द मैं नहीं सुन सका और मंडी के बाहर निकल आया। बाहर जानवरों का हरा-हरा चार बिक रहा था। मन में एक स्वाभाविक उत्कंठा हुई कि जब जानवर मनुष्य का भोजन कर सकते हैं तो मनुष्य उनका क्यों नहीं। सिद्ध भी हो चुका है कि चारा कतई नुकसानदायक चीज नहीं है। उसे मनुष्य आसानी से पचा सकता है। वैसे भी आकार-प्रकार को अगर छोड़ दिया जाए तो सब्जियों और चारे की हरियाली में कोई फर्क नहीं होता।
चारा बेचने वाला मेरी ओर बड़ी हसरत से देख रहा था। पता नहीं हालत पर उसे रहम आ रहा था या वह बेवकूफ समझ रहा था कि घर में गाय-घोड़े बंधे होंगे। एक पल मैं चारे के सामने ठिठका फिर पूछा- 'ये क्या भाव है?'
दोस्तों! जवाब में दुकानदार केवल मुस्कुराया। हालांकि वह कह सकता था कि भाव जानकर क्या करोगे। आप तो ये बताओ.. यहीं खाओगे या घर ले जाओगे। लेकिन उसकी मुस्कुराहट में जो शब्द छिपे थे अगर वे आकार पाते तो शायद ये होते- मंहगाई कोसने की नहीं सोचने की चीज है। आखिर क्यों हर चीज का दाम आसमान छू रहा है। वजह साफ है। मांग ज्यादा, उत्पादन कम। ऊपर से प्राकृतिक आपदाएं। प्रदूषित पर्यावरण। इसलिए असंतुलन है। देखते जाइये.. अगर अब भी नहीं चेते तो एक दिन आप वाकई चारे का भाव पूछते नजर आएंगे।
और अंत में..
मुरारी के फ्रिज में शराब की खाली बोतलें देखकर उनके दोस्त ने पूछा- 'ये खाली बोतलों का क्या मतलब है?'
'ये मेरे उन मेहमानों के लिए हैं, जो नहीं पीते।' जवाब मिला।

Sunday, April 11, 2010

मरने के बाद

मुझे एक झटका सा लगा। महसूस हुआ कि मैं जमीन छोड़ चुका हूं। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह हवाई यात्रा में महसूस होता है। जमीन छोड़ने और इस अहसास को महसूस करने के दरम्यान मैंने अच्छी भली ऊंचाई पकड़ ली। जैसे हवा का अनुकूल रुख होने पर पतंग खुद-ब-खुद अपनी ऊंचाई तलाश लेती है।
तभी दूसरा झटका लगा। ये देखकर कि मेरा शरीर गायब था। हैरत हुई कि जिस जिस्म को तेल, पानी, शैंपू और जूं देकर इतने बरसों तक पाला पोसा, वह अचानक दगा दे गया। मेरी हालत अजीब सी होनी शुरू होती। इसी बीच मुझे एक और अपने जैसा दिखा। वह मेरी ही ओर आ रहा था। पास आकर बोला- 'बधाई हो! आखिर तुम मर ही गये।'
अपने मरने का जिक्र सुनकर मैं चौंका। तो ये बात है। इसीलिए मेरा पांच फुट बाई तीस सेंटीमीटर का शरीर नदारद है। अब मैंने उसे ध्यान से देखा। वह भी मेरी ही तरह था यानी मरा हुआ। इसका मतलब! आगे कुछ मैं सोच पाता, उसके पहले ही वह बोला- 'पता है, तुम्हारे साथ मैं भी पुलिस की गोली से घायल हुआ था। और, तुम्हारे साथ ही सरकारी अस्पताल में भर्ती भी हुआ। वहां पता नहीं क्या हुआ। डॉक्टर तुम्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गये। मैं बेहोश हो गया। होश आया तो तुम्हारे बेड पर ढाई- ढाई फुट के दो मरीज पड़े थे। मैं इसे डॉक्टरों का चमत्कार समझ रहा था। लेकिन तुम्हें यहां देखकर मेरा मतलब मरा हुआ देखकर मेरी सारी चिंताएं दूर हो गयीं।'
किसी के मरने पर खुश होना और बात है लेकिन अपने मरने की खुशी दूसरे को मनाते देखना.. भगवान ये दिन किसी को न दिखाये। लेकिन उसे मेरी भावनाओं से कोई मतलब नहीं था। शायद वह बेवकूफ समझ रहा था कि आदमी के मरने के बाद उसकी भावनाएं भी मर जाती हैं। सच कहा है कि कुछ लोगों को मरने के बाद भी अक्ल नहीं आती। वह उसी श्रेणी में था। मुझे गुमसुम देखकर उसे होश आया और मेरे मरने की खुाशी में गा रहे मंगल गीतों को उसने विराम लगाया।
'क्या हुआ बिरादर?' उसने सहानुभूति से पूछा।
'कुछ नहीं यार। विश्वास नहीं हो रहा कि मैं मर चुका हूं।' मैंने सच्चाई बता दी।
'होता है यार.. होता है। पहली-पहली बार मरने में ऐसा ही होता है।' उसने इस आत्मविश्वास से जवाब दिया जैसे उसे कई बार मरने का तर्जुबा हो।
'.. जानते हो', वह आगे बाला- 'अस्पताल में मेरे सामने के बेड वाला मरीज तो पोस्टमार्टम में पहुंचने के बाद भी नहीं मान रहा था कि वह मर चुका है। बाद में इलाके के दरोगा जी ने जाकर हड़का तब साला मरने को तैयार हुआ।'
मुझे लगा कि छोटी सी मृत्योपरांत आयु में भी उसने मरने के मामले में काफी रिसर्च कर डाली है। अब मुझे उसमें दिलचस्पी जाग उठी। वैसे भी उस इलाके में, जहां कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था.. उसके सहारे टाइम पास किया जा सकता था। ये सोच मैंने उससे मित्रवत पूछा- 'मरने के पहले जब तुम जिंदा थे, मेरा मतलब धरती पर तुम क्या करते थे?'
'नौकरी की तलाश।' उसने सपाट सा जवाब दिया।
'यानी कुछ नहीं करते थे।'
'कहा न कि नौकरी की तलाश करता था। घर में सबसे बड़ा था। पिताजी इसी इंतजार में रिटायर हो गये कि बुढ़ापे में उनका सहारा बनूंगा। अपने चार छोटे भाई- बहनों को पैरों पर खड़ा करूंगा। कैंसर पीडि़त मां का इलाज कराऊंगा.. लेकिन कुछ न करा सका तो जानबूझकर उस भीड़ में घुस गया, जिस पर पुलिस गोली चला रही थी। और, मेरी मुराद पूरी हो गयी। पिता को निकम्मे बेटे से छुटकारा मिल गया।'
उसकी बात सुनकर इच्छा हुई कि मेरी आंखें भर आयें लेकिन आंखें थी ही नहीं। मुझे लगा कि वह उतना बेवकूफ नहीं है, जितना मैं माने बैठा हूं।
अचानक वह बोला- 'चलो श्मशान घाट चलते हैं। वहां अपना अंतिम संस्कार हो रहा होगा।'
अपना अंतिम संस्कार होते देखना। यह विचार भी कमाल का था। यहां तो साक्षात होने जा रहा था। सच्चाई यह थी कि हम मर चुके थे और अब अंतिम संस्कार ही देख सकते थे। शादी-ब्याह या किसी पार्टी में तो कोई बुलाने से रहा। मैंने मौन स्वीकृति दे दी और थोड़ी ही देर में हम दोनों श्मशान घाट आ गये।
मजे की भीड़ थी वहां भी। हालांकि शहर में कोई दंगा या बलवा भी नहीं हुआ था और सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक न ही किसी महामारी का हमला। फिर भी श्मशान गुलजार था। वहां मजे की चिल्ल-पों मची हुई थी। मुर्दा से ज्यादा शोर भावी मुर्दे मतलब कंधा देने वाले मचा रहे थे। (क्रमश:)

Saturday, April 10, 2010

मुजफ्फरपुर सीमा प्रारंभ, सड़क समाप्त

प्रणाम इस शहर को, जो इतने सारे और तरह- तरह के गढ्डों के बीच रहकर भी जिंदा है! प्रणाम नगर निगम को, जिसके तमाम प्रयासों के बावजूद शहर का कोई न कोई कोना साफ दिख ही जाता है! प्रणाम निगम के कर्मचारियों को, जिनके सतत प्रयत्‍‌नों से शहर हमेशा कूड़े के ढेर पर बैठा रहता है। जैसे पर्यावरणविदों को चुनौती दे रहा हो- 'जो करना हो कर लो, हम बारह साल क्या चौरासी साल बाद भी घूरे के घेरे ही रहेंगे।' प्रणाम यहां के आवारा पशुओं को, जिनको यातायात नियमों की जानकारी हो न हो लेकिन इतना अवश्य जानते हैं कि उनके किस ऐंगल से बैठने से सड़क पर जाम लग सकता है!
अगला प्रणाम यहां के पुलिसजनों को! जिनकी वर्दी देखकर कुत्ते मुंह फेर लेते हैं, इसलिए कि इन्फेक्शन न हो जाये। यूं तो शहर में कौवे दिखते नहीं लेकिन अगर सौभाग्य से दिख जाते हैं तो पुलिस को देखकर चहचहाने लगते हैं! बकरों की मम्मियां खैर मनाने लगती है और मुर्गो की टांगें फड़फड़ाने लगती हैं! मछलियां विचारने लगती हैं कि उनके एक के बजाय दो मूड़े क्यों न हुए!
सम्मानित अपराधियों, गली के श्रद्धेय गुंडों, चौराहों के प्रात: स्मरणीय बदमाशों, कम्प्यूटर और नेट के युग में भी लड़कियों को देखकर सीटी बजाने वाली प्राचीन प्रथा पर यकीन करने वाले मजनुओं, मिलावट को व्यापार का धर्म और हाथी की लीद को मसाले का मर्म मानने वाले निष्ठावान व्यापारियों को भी मेरा सादर प्रणाम!
अब आगे की कथा जरा दिल थामकर पढ़ें-
दाद, खाज, खुजली, अकौता, भगंदर, नासूर, बवासीर, कांच, पेट का दर्द, पीठ का दर्द, पुट्ठे का दर्द, अम्लबाई का दर्द, हैजा, कालरा, डायरिया, रात में नींद नहीं आती हो, दिन में खट्टी डकारें आती हों, रात में मीठी हवा निकलती हो, पेट लगातार कुश्ती लड़ता रहता हो या अजीब- अजीब आवाजें करता हो, आंखों में खराबी हो, दूर की चीजें साफ नजर न आती हों, पास की चीजें बिल्कुल न दिखती हों, पैरों में ऐंठन रहती हो, हाथ कंपकंपाते हों, फालिज का खतरा हो, किडनी प्राब्लम हो, डायबिटीज, कैंसर, हेपेटाइटिस, इन्सेफलाइटिस, कंजक्टिवाइटिस, पुराना दमा हो या नया एचआईवी, फेफड़ों में पानी भर गया हो या आंखों का सूख गया हो, कान में आवाज की जगह केवल हवा आती- जाती हो, या ऐसी ही कोई बीमारी यदि आपको अभी तक नहीं हुई है तो चिंता की कोई बात नहीं है। इस शहर में हर बीमारी का जबर्दस्त इस्कोप है। यकीन न हो तो जूरन छपरा जाकर देख लीजिये। ये अंदाज लगाना मुश्किल है कि शहर में डॉक्टर ज्यादा हैं या मरीज! किसी भी डॉक्टर से संपर्क कीजिये।
डॉक्टर साहब न सिर्फ आपकी बीमारी का इलाज करेंगे, बल्कि ये भी बतायेंगे कि वे किस बीमारी का इलाज कर रहे हैं। वरना कुछ डॉक्टर तो मरीज के क्लीनिक में घुसते ही उसका इलाज शुरू कर देते हैं। बाद में पता चलता है कि जल्दी में जिसे इंजेक्शन दिया गया, वह मरीज नहीं उसका अटेंडेंट था। दूसरे शहरों की तरह जांच रिपोर्ट देखने के बाद ही यहां भी बीमारी बताने की प्रथा है। फिर भी समझदार मरीज जांच रिपोर्ट पर ज्यादा विश्वास नहीं करते। बस खुद को डॉक्टर के हवाले कर देते हैं। मरीज बीमार होकर अपना धर्म निबाहते हैं और डॉक्टर इलाज करके अपना। पैथालॉजी वाले रिपोर्ट देकर अपना। रिपोर्ट कभी- कभी गलत भी निकल जाती है। लेकिन उससे आपकी बीमारी गलत नहीं हो जाती। वह हर हाल में वही रहती है, जो लेकर आप डॉक्टर के पास गये थे।
जिक्र होता है जब कयामत का, तेरे जलवों की बात होती है। अर्थात डॉक्टरों का जिक्र हो और अस्पताल की बात न हो तो बात बनती नहीं। इसलिए मेरा एसकेएमसीएच को भी दंडवत प्रणाम! उसकी इमरजेंसी को प्रणाम, जो खुद इमरजेंसी में भर्ती होने योग्य है! उसके वार्डो को प्रणाम, जो भूतपूर्व मरीजों की रूहों को भी पनाह देते हैं। प्रणाम तो उस धाम को भी करने को जी चाहता है, जहां आदमी चार कंधों पर सवार होकर अपनी अंतिम यात्रा पर जाता है लेकिन इतनी जल्दी नहीं। फिलहाल चलते- चलते एक किस्सा सुन लीजिये-

और अंत में..
पिछले माह नारद मुनि को रास्ते में यमराज मिल गये। उनके साथ आत्माओं से भरी एक गठरी थी। ये देख मुनिवर ने यमराज से पूछा- 'नारायण! नारायण! महाराज इतनी सारी आत्माओं को एक साथ लेकर जा रहे हैं.. यमलोक में सब ठीकठाक तो है न!'
'ऐसी कोई बात नहीं है मुनिवर, दरअसल मार्च का प्रेशर है.. टारगेट पूरा करना है न।' यमराज ने जवाब दिया।

Saturday, March 13, 2010

न नहाने की संस्कृति

इधर कुछ समय से देश में एक नयी तरह की संस्कृति की लहर आयी हुई है। इसका नाम है- 'न नहाने की संस्कृति' इसलिए समाज में भी दो वर्ग हो गये हैं। एक वे. जो नहाते हैं और दूसरे वे जो नहीं नहाते हैं। 'नहाने' की आदिम परंपरा को मानने वालों का कहना है कि जब तक नल के नीचे बैठकर दो- चार ड्रम पानी न बहा लिया जाये, तब तक शरीर सूखा रहता है. आत्मा सूखी रहती है और सूखी आत्मा का परमात्मा में विलय अर्थात मिलन नहीं हो सकता।जबकि 'न नहाने' के पक्षधरों को न लोटे से मतलब है और न साबुन से। 'नहाना' इनकी नजर में सती जैसी कुप्रथा है, जिसका अंत शीघ्रातिशीघ्र हो जाना चाहिए। इनका मानना है कि आत्मा तो अजर-अमर है। उसे न कोई मार सकता है, न काट सकता है। न सुखा सकता है, न गीला कर सकता है. फिर उस पर नहाने या न नहाने का क्या असर!मेरे एक मित्र हैं। विद्धान नहीं हैं। शायद इसीलिए मित्र है। हर विषय पर बहस कर सकते हैं। खुद को इस संस्कृति का जनक समझते हैं। इनका दावा है कि केवल पैदा होने के बाद नहाये थे। वो भी लेबर रूम में क्योंकि वहां डॉक्टरों और नर्सो पर वश नहीं चल सका। बाद में जैसे बस चलता गया. पानी से दूर होते गये। और, आज ईश्वर की कृपा से उनके घर मे बाथरूम को छोड़कर सब कुछ है।एक दिन मुझे मिले और लिस्ट जैसी कोई चीज दिखाते हुए बोले- 'ये देखो. मैंने न नहाने की वालों की एक राष्ट्रीय समिति बनायी है। जिसके एक माह में ही पांच सौ मेंबर बन गये हैं।'मैंने उत्सुकतावश उनकी लिस्ट देखी। जिस समिति को वो राष्ट्रीय स्तर का बता रहे थे। उसमें अधिकांश नाम जिला स्तर के ही थे। फिर भी उनमें कई डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों, साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों आदि के नाम देखकर आंदोलन की सफलता के प्रति मैं आश्वस्त हो गया।'तुम्हारा नाम भी इसमें लिख लूं?'उन्होंने अचानक पूछा तो मैं घबरा गया। हकलाते हुए कहा- 'मुझे माफ करो भाई। बीवी-बच्चों वाला आदमी हूं। कभी-कभी नहाना पड़ ही जाता है और झूठ बोलकर मैं समिति का सदस्य नहीं बनना चाहता।''समझ गया तुम लोगों की औकात। किसी अच्छे काम में साथ नहीं दे सकते। पता नहीं नहा-नहा कर कौन सा नोबेल पुरस्कार जीत लोगे।'उनका रौद्र रूप देखकर कुछ देर के लिए तो मैं सहम गया। लेकिन थोड़ी ही देर में सामान्य हो गया। वजह यह है कि मित्रवर का रौद्र रूप बस उतनी ही देर तक ठहरता है, जब तक खुद उनकी सेहत के लिए खतरा न बन जाये। इसलिए वह ये रूप हर किसी को नहीं दिखाते। पुलिस, डॉक्टर, ठेकेदार, गली के गुंडे, गली के कुत्ते, पत्‍‌नी (चाहे अपनी हो या पड़ोसी या परिचित की) जैसे लोग उनकी उस लिस्ट में शामिल हैं, जिनको वे सपने में भी रौद्र रूप दिखाने की कल्पना नहीं कर सकते।
खैर, उनके किसी रूप की परवाह न करते हुए मैंने पूछा- 'ये जो तुमने न नहाने वालों की समिति बनायी है, उसके पीछे कोई पीएचडी करने की मंशा है?'
'क्यों पीएचडी के बिना क्या कोई शोध नहीं किया जा सकता।' उन्होंने पलटकर जवाबी सवाल दागा।
'नहीं सो तो इस देश में बिना शोध के भी लोग पीएचडी कर लेते हैं लेकिन मैं यह जानना चाहता था कि तुम लोगों के नहाने के पीछे क्यों पड़े हो?'
'मेरी बातें तुम्हें अभी समझ में नहीं आयेंगी। जैसे ईसामसीह की बातें भी लोगों को उस वक्त पल्ले नहीं पड़ी थीं।' कहकर उन्होंने जोरों से खंखारा लेकिन इस डर से थूका नहीं कि कहीं बेचारी जमीन गीली न हो जाये.. और वापस पी गये।
मैं उनकी मितव्ययता को अभी दाद दे ही रहा था कि वह अचानक बोले- 'अच्छा बड़े नहाऊ बनते हो तो एक बात बताओ.. दुनिया में सबसे पहले नहाने वाला व्यक्ति कौन था?'
इस प्रश्न से मैं बीट हो गया। हकलाते हुए कहा- 'आदम और हव्वा के बारे में मैंने पढ़ा जरूर है लेकिन ये जिक्र कहीं नहीं आया कि वे नहाते थे।'
यह सुनते ही वह खुशी से उछलकर बोले- 'यही तो मैं कहता हूं कि जब आदम और हव्वा नहीं नहाये तो हम क्यों नहायें। यानी नहाना हमारी संस्कृति में कभी रहा ही नहीं। ये सब शैंपू- साबुन बनाने वाली कंपनियों का प्रोपोगंडा है।'
उनकी बात में वजन था लेकिन अपनी संस्कृति को स्नान विहीन मान लेने का दुस्साहस मैं नहीं कर पा रहा था। फिर भी पीछे नहीं हटा। बोला- 'माई डियर, ये बताओ कि सबसे पहले नहाने वाला जो भी रहा हो लेकिन क्या वो अब तक तुम्हारे लिए जिंदा बैठा होगा?'
'वो तो मर ही जायेगा..' वह खुशी से चीखे- '.. और ये जितने नहा रहे हैं.. सब मरेंगे।'
कहते हुए वे अपनी तशरीफ का टोकरा वहां से उठा ले गये। मैंने सोचा मुसीबत टली। किन्तु यह महज खुशफहमी थी। अगले ही दिन उनकी समिति के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन का निमंत्रण पत्र मिला। मैं सदस्य तो नहीं था लेकिन रोज नहाता भी नहीं था इसलिए चला गया।
अधिवेशन स्थल पर कड़ी सर्तकता बरती जा रही थी। कोई नहाया- धोया परिंदा भी वहां पर नहीं मार सकता था। वॉलंटियर पहले आगंतुक को सूंघते और यदि कोई दुर्गन्ध विहीन व्यक्ति हाथ लग जाता तो उसे अपमान सहित लौटा दिया जाता। मैं सौभाग्यशाली रहा कि उस दिन नहाये होने के बावजूद बास मार रहा था इसलिए आसानी से घुस गया।
प्रेक्षागार के भीतर भी व्यवस्था बहुत उत्तम थी। पूरा सभागार वातानुकूलित था ताकि कोई पसीने तक से न भीग सके। नदी, तालाब, सागर, कुंआ, पोखर, बिसलरी, छाता, रेनकोट, बर्फ, भाप आदि ऐसी सारी चीजों का जिक्र वर्जित था, जिनका पानी से दूर- दूर तक भी संबंध हो। पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था। अनेक लोग पूर्व परिचित थे और एक- दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। मानो कह रहे हैं.. अच्छा तो आप भी नहीं नहाते हैं। वहीं कुछ लोग अपनी कलई खुल जाने के डर से इधर- उधर बगलें झांक रहे थे। कायदे से उन्हें चुल्लू भर पानी की दरकार थी लेकिन समिति की आचार संहिता के तहत वहां पानी किसी भी मात्रा या रूप में स्वीकार्य नहीं था।
खैर, कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। मित्रवर ने समिति के उद्देश्यों के बारे में बताने के बाद मुख्य अतिथि को माइक पर आमंत्रित किया। उनका भाषण इस प्रकार था-
प्रिय स्नान के शत्रुओं, मेरे मित्रों!
मुझे ये देखकर अपार हर्ष हो रहा है कि इस सभागार में कितने सारे लोग बिना नहाये बैठे हैं। मैं आज तक ये नहीं समझ सका कि अपने देश में नहाने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है। माना कि दुनिया का तीन चौथाई हिस्सा पानी है और अपना देश भी तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि नहा ही लिया जाये।
कितने ही उपयोग हैं पानी के। चाय बनाइये। लस्सी बनाइये। दूध में मिलाइये, दारू में मिलाइये। जल संस्थानों में भिजवाइये। लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि अपने देश में शादी का मतलब बच्चे और पानी का मतलब केवल नहाना समझा जाता है। ये सब उस जमाने की बातें हैं, जब आदमी के पास कोई काम नहीं होता था। वह नहाता था और बच्चे पैदा करता था। लेकिन आज.. कितने काम हैं, कितनी चुनौतियां हैं हमारे सामने। पाकिस्तान है, तालिबान है, नक्सली हैं, कश्मीरी उग्रवादी हैं, देसी बदमाश हैं, गरीबी है, योजनाएं हैं, चुनाव हैं, बाढ़ है, सूखा है.. और भी पता नहीं क्या- क्या है।
सोचिये कितने कठिन दौर से गुजर रहे हैं हम। हर लम्हा दहशत और फिक्र में गुजरता है। पता नहीं चलता कौन मानव बम है कि दुश्मन बम। ऐसे दौर में नहाने की बात तक सोचना पाप है। गद्दारी है देश के साथ। एक ओर लाखों- करोड़ों लोगों को पीने का पानी तक नहीं मिल पाता और दूसरी ओर करोड़ों गैलन पानी नहाने में बर्बाद कर दिया जाता है। ये राष्ट्रीय नुकसान नहीं तो क्या है। खासकर ऐसे दौर में जब लोगों की आंखों तक का पानी मर गया हो।
मुझे खबर मिली है कि इतना सब होने के बाद भी कुछ लोग सुबह- शाम दोनों टाइम नहाते हैं। आप ही बताइये.. क्या ऐसे लोगों को समाज में रहने का हक है। कतई नहीं। इसलिए मेरे साथ आप भी कसम खाइये कि इस संस्कृति को आगे बढ़ाने में आप अपने तन-मन-धन से योगदान देंगे। अपने आसपास नजर रखेंगे कि कोई चोरी- छिपे नहा तो नहीं रहा। और यदि कोई दिख जाये तो उसे नल के नीचे से खींच लायेंगे। मारेंगे, पीटेंगे, गोबर, मिट्टी, कीचड़ आदि से उके अलंकृत करेंगे लेकिन किसी भी कीमत पर उसे दोबारा नल के नीचे बैठने नहीं देंगे। याद रखें जब तक पूरा समाज इस एजेंडे को स्वीकृति नहीं दे देता, तब तक जल की राष्ट्रीय समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जय हिन्द!

मेरे बारे में

अपने बारे में जीते जी लिखना वैसे ही है जैसे कोई अपनी ही प्रतिमा का अनावरण करे। लेकिन लिखना इसलिए जरूरी है कि बाद में पता नहीं कोई लिखे या न लिखे। इसके अलावा आने वाला समय रोबोटों का होगा। ऐसे संकेत दिखने लगे हैं। रोबोट तो रोबोट ही है। हो सकता है कि भविष्य में जीवनियां लिखने का काम भी रोबोटों के हवाले हो जाए तो? रोबोट मशीन है। ऐसी मशीन जो कम्प्यूटरीकृत होती है। मशीन में गड़बड़ी भी आ जाती है। सोचिए ऐसी सूरत में क्या होगा-रोबोट को कमल किशोर सक्सेना की जीवनी लिखनी है। उसमें सारे संबंधित डाटा फीड कर दिए गए। माउस क्लिक किया और ऐन उसी वक्त कम्प्यूटर हैंग कर गया। हैंगोवर से जब वो वापस लौटा तो अपने साथ वायरस के कारण ओसामा बिन लादेन के डाटा भी ले आया। और, उसने वे भी कमल जी की जीवनी में मिला दिए। अब आप ही बताइए ऐसी जीवनी मार्केट में न ही जाए तो अच्छा। इन्हीं चंद शुबहों के कारण मैं अपने बारे में खुद लिखने का फैसला किया। खैर!मेरी जीवनी कोई ऐसी नहीं है जिसे पढ़कर कोई गांधी, नेहरू या ओबामा बन जाए। अरे, जब मैं खुद नहीं बन सका तो दूसरा क्या खाक बनेगा। कम से कम मेरी जीवनी पढ़कर तो नहीं। मेरा विचार है कि यदि महापुरुष लोग जीते जी अपनी जीवनी पढ़ लेते तो शायद वे भी वे न बन पाते जो मरने के बाद जीवनी लिख जाने से बन गए। एक बात और! अपने बारे में सच-सच लिखना वाकई साहस का काम है। यह मुझे महसूस हो रहा है। हालांकि, जीवनी लेखन के मामले में सच का कितने प्रतिशत सहारा लिया जाता है, इस पर अच्छी खासी डिबेट हो सकती है। हो सकता है कि कुछ लोग महापुरुष की श्रेणी से निकलकर डायरेक्ट औंधे मुंह मैनहोल में नजर आएं। (क्रमश:)

Friday, February 26, 2010

जूता चिंतन

वक्त का तकाजा है कि सबसे निचले स्तर पर पड़ी वस्तु भी ब्रांडिंग चाहती है। अपने को मार्केट में अपडेट रखना चाहती है। सुंदर दिखना चाहती है ताकि हर कोई उसकी तरफ देखे। उसे पसंद करे। उसकी चर्चा करे।खुद को धरा का सबसे खूबसूरत समझने की गलतफहमी कई लोगों को होती है। पिछले दिनों मेरे जूतों को हो गयी। वे पिछले कई हफ्ते से कई ग्राम धूल का कंबल लपेटे मेरी ओर कातर निगाहों से देख रहे थे कि शायद मुझे उनकी हालत पर तरस आ जाए। तरस आया भी। जूतों के बुद्धि होती तो तरस बुद्धि पर आता। उन बेचारों को नहीं मालूम कि वे कितने मासूम हैं। ये नहीं जानते कि गंदगी- सुंदरता सब छलावा है। ये शरीर नश्वर है। असली चीज है आत्मा। उसकी सफाई जरूरी है। रोज। हो सके तो कई बार। लेकिन जूतों के आत्मा होती तो वे जूते ही क्यों होते। उनकी नियति पैरों में ही रहना है लिहाजा उनसे बहुत अपेक्षा नहीं रखी जा सकती। वैसे भी ये सारी बातें उनकी वेव लेंग्थ से बाहर थीं। हां, उनके जुबान होती तो शायद यही कहते- 'खुद तो कई- कई दिन नहाते नहीं हो। हमको भी अपने जैसा बना रखा है। कान खोल कर सुन लो। लेकिन कान भी कैसे खुलेंगे। उनकी भी तो कई साल से सफाई नहीं हुई। पता नहीं कितना कचरा निकले। नगर निगम के मैनहोल की तरह बरसों से जाम पड़े हैं।' अब मुझे जूतों के तेवरों से विद्रोह की बू आने लगी। जिसके भविष्य में किसी आंदोलन की सुगबुगसहट भी मैंने महसूस की। मामला सीरियस लग रहा था। दर्शन और अध्यात्म के जरिये जूतों को समझाना नामुमकिन था। उनकी ओर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। डर था कि कहीं पैरों से निकलकर वे मेरे सिर को डीजे का स्टेज न बना लें। भलाई इसी में थी कि फौरन किसी लेदर एक्सपर्ट को कांटेक्ट किया जाए। हिंदी में बोले तो चर्म शास्त्री। वैसे ये विशेषज्ञ जगह- जगह सड़क के किनारे बैठे आमतौर पर मिल जाते हैं लेकिन जिस दिन मैं खोजने निकला तो दो किलोमीटर तक नहीं मिले। मन में संशय भी हुआ कि कहीं प्रदेश का वास्तव में इतना विकास तो नहीं हो गया कि यहां के लोगों ने पालिश करने या जूतों की रीपेयरिंग का काम छोड़ दिया हो। सब के सब आईएएस, एमबीए, बैंक कंपटीशन आदि की तैयारियों में जुटे हों। विकास की दृष्टि ये यह अच्छी कल्पना थी लेकिन वास्तविकता के धरातल पर बहुत भयानक। जरा सोचिये अगर सारे लोग पढ़- लिख जाएं। नौकरी करने लगें। समाज तरक्की कर जाए। गरीबी जैसी बातें इतिहास की पुस्तकों में दर्ज कर दी जाएं। तो क्या होगा। भाईसाहब कदम- कदम पर परेशानियां पेश आएंगी। भूखे मर जाएंगे कोई चाट- पकौड़ी वाला नहीं मिलेगा। मकान बनवाना होगा। मजदूर नहीं मिलेगा। मार्केट में खरीदारी करने के बाद सामान उठाकर कार तक पहुंचाने वाला नहीं मिलेगा। गाड़ी खराब हो जाएगी तो रिक्शा नहीं मिलेगा। कहां तक गिनाउं। पहली बार समझ में आया कि समाज को सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए गरीब और गरीबी कितने आवश्यक हैं। खैर, चर्म शिल्पी को खोजते- खोजते मैं अब तक पांच किलोमीटर चल चुका था। अब तक पूरे जीवन में टोटल इतना मार्निग वाक मैंने नहीं किया था। लेकिन जूतों की मांगें पूरी न करने पर होली पर अनहोनी का पूरा- पूरा अंदेशा था। अचानक मेरी मायूस निगाहें चमक उठीं। मन मयूर नाच उठा। दिल में शहनाइयां बजने लगीं। पूरा कलयुग अभी नहीं आया। कुछ धर्म अभी बाकी है। सड़क के सामने वाली पट्टी पर एक चर्म शिल्पी (प्राचीन काल में इन्हें रैदास के नाम से जाना जाता था।) नजर आया। मैं लपककर उसके पास पहुंचा। वह एक फटी चप्पल पर थीसिस लिख रहा था। मुझे आशा था कि कस्टमर देखकर वह अदब से उठकर खड़ा होगा और मेरा स्वागत करेगा। लेकिन वह चुपचाप अपने काम में जुटा रहा। मुझे यकीन हो गया कि समाज को अपने विकास की कोई जल्दी नहीं है। जिसमें कुछ लोगों की मानसिकता है कि आपकी गरज हो तो हमारे घर में संडास बनवा दें वरना हम तो डिब्बा लेकर बरसों से खेत जा रहे हैं.. आगे भी जाते रहेंगे। वह अपने काम में जुटा रहा। हारकर मैंने ही पहल की- 'जूतों में पालिश हो जाएगी?' अबकी पहली बार उसने नजर उठाई। एक बार मुझे देखा। दूसरी बार जूतों की तरफ। जैसे तसल्ली कर लेना चाहता हो कि जूते मेरे अपने ही हैं या मंदिर के बाहर से लाए गए हैं। जूतों से ज्यादा देर वह मेरा चेहरा ताकता रहा। शायद उस पर जूतों से ज्यादा धूल थी। फिर उसने जोरों से खंखारा और करीब डेढ़ सौ ग्राम बलगम पीछे मुंह करके धरती मैया को समर्पित कर दिया। फिर मुझसे मुखातिब होता हुआ बोला- 'जूतों की रसीद है? अबकी मैं चौंका। मैं अपनी निगाहों को जब तक प्रश्नवाचक पुट दे पाता, उससे पहले ही वह बोला- 'ऐसा है सर, हम कोई गलत काम नहीं करते। सच्चे आदमी हैं, काम भी सच्चा ही करते हैं। रसीद नहीं है तो पालिश नहीं होगी।''यार, जबसे मेरे पैर पैदा हुए हैं, तबसे मैं जूता-चप्पल पहन रहा हूं। बारात वगैरह में तो पालिश फ्री में करवा लेता हूं फिर भी कभी इमरजेंसी पालिश करवानी ही पड़ जाती है। आज तक किसी ने रसीद नहीं मांगी। इस बजट में भी कोई ऐसा कानून नहीं बनाया गया है। फिर काहे की रसीद!'उसने मुझे फिर घूरा। इस बार उसकी नजर वैसी थी जैसी किसी दरोगा की सड़क पर घूमते आवारा आदमी के लिए होती है। फिर बोला- 'देखिये गर्द- गुबार में कुछ पता नहीं चल रहा लेकिन चेहरे से आप पढ़े- लिखे मालूम पड़ रहे हैं। खैर, मैं आपको क्लियर कर दूं कि आजकल किसी का कोई भरोसा नहीं। कौन साला आतंकवादी निकल आए। कल पुलिस हमको परेशान करे कि तुम्हारी ही दुकान से पालिश कराई थी। इसलिए कृपया या तो जूते की रसीद दिखायें या अपनी आइडेंटटी का कोई प्रूफ। पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, चुनाव पहचान पत्र, राशन कार्ड या बिजली का बिल इनमें से कुछ है आपके पास!' (क्रमश:)

Sunday, February 21, 2010

जय राम जी की!

प्रिय पाठकों!

काफी दिनों से इच्छा थी कि मैं भी 'ब्लॉगबाजी' की जंग में शामिल हो जाउं। दरअसल कशमकश इस बात को लेकर थी कि ब्लॉग बना भी लूं तो उसमें लिखूंगा क्या। इंटरनेट की अनंत दुनिया। उसमें ब्लॉगबाजों की जबर्दस्त भीड़। इस भीड़ में भी बड़े- बड़े नाम। जिनके बारे में पढ़ने के लिए लोगों में होड़ होती है। मीडिया जिनके ब्लॉगों में लिखी बातों को बढ़कर बढि़या खबरें बना लेता है। ऐसी जंग में मेरे जैसा अदना आदमी क्या हैसियत रखता है, जो मैं ब्लॉग-व्लॉग का चक्कर पालूं। ये उधेड़बुन कई महीने चलती रही।

इस बीच मेरे कई मित्रों ने अपने- अपने ब्लॉग बना लिए और मुझे सीना तानकर बताने लगे कि भइया हम भी ब्लॉगियर हो गये हैं। ऐसे - ऐसे लोग जो शायद हिन्दी या अंग्रेजी में सही- सही 'ब्लॉग' शब्द न लिख सकें। ऐसे- ऐसे मूर्धन्यों ने जब ब्लॉग बना लिए तो मैंने सोचा कि कमल किशोर सक्सेना अगर तुम बिना ब्लॉग बनाये मर गये तो तुम्हारा ये जन्म तो गया ही। अगले पर भी खतरा है क्योंकि जब तक तुम्हारी पीढ़ी के पुनर्जन्म लेने का नंबर आयेगा, तब तक शायद भगवान भी अपने एसाइनमेंट ब्लॉग से करने लगें। बस ये ख्याल आते ही मैंने उठाया कम्प्यूटर का माउस और थोड़ी देर तिडि़क-तड़ाक करने के बाद एक ब्लॉग गढ़ डाला। ईश्वर आपको मेरा ब्लॉग झेलने की शक्ति दे।

चिंता न करें।

समय-समय पर मुलाकात होती रहेगी।

फिर मिलेंगे किसी दिन!