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Tuesday, December 21, 2010

'पÓ से 'प्याजÓ, 'लÓ से 'लहसुनÓ

मेरे सामने एक प्याज है। इसे मैं एक हफ्ते से टकटकी लगाकर देख रहा हूं कि आखिर बनाने वाले नेे क्या सोचकर इसे 'टियर गनÓ थमा दी। वरना, कितनी खूबसूरत फिगर है। ज्यों-ज्यों कपड़े उतरते जाते हैं, त्यों-त्यों निखार आता जाता है। लेकिन, इतनी मस्त अदाओं वाला प्याज इस समय सबको जार-जार रुला रहा है।
मैं भी रो रहा हूं। एक हफ्ते से सोच रहा हूं कि परिवार के इस इकलौते प्याज को खर्च करूं या ड्राइंग रूम में सजा दूं। किचेन के स्तर से तो ऊपर उठ चुका है वो। पक्का फ्रेम करवाकर दीवार पर लगवाने का इरादा इसलिए नहीं है कि अभी मुझे प्याज के किचेन में वापस लौटने की उम्मीद है। आशावादी हूं न। इसीलिए।
खैर, इसे इसके एक किलो साथियों के साथ पिछले महीने खरीदा था सब्जीमंडी से। बाकी साथी तो पेट की जंग की भेंट चढ़ गए। अब ये इकलौता बचा है। मेरी आंखों का नूर, मेरा कोहिनूर, जाने-जिगर, घर का इकलौता चिराग, चश्मे-बद्दूर। कहने की जरूरत नहीं कि आजकल मैं प्याज की पूजा रहा हूं। खाने के लिए सोचना भी पाप है। लहसुन भी इन दिनों प्याज का मौसेरा भाई बनकर उभरा है।
खाते-पीते घरों के लोग जानते हैं कि लहसुन-प्याज विहीन भोजन करना कितना कष्टप्रद होता है। फिर मैं तो उस खानदान को बिलांग कराता हूं, जहां बकरे का मतलब बिरयानी और लेग पीस का मतलब सिर्फ मुर्गा समझा जाता है। और, दुनिया के तमाम बावर्चीखाने गवाह हैं कि बिना लहसुन-प्याज के बकरे, मुर्गे तो छोडिय़े, झींगा मछली तक कुकर में जाने को राजी नहीं होती।
कल मेरे कुकर ने मुझसे पूछा- कितने दिन मुझे और दाल-भात पर जिंदा रहना पड़ेगा। तुम्हें शाकाहार का संदेशा देना हो तो शौक से दो लेकिन मुझे तो हफ्ते में मिनिमम दो दिन नॉन वेज चाहिए ही चाहिए। कहते हुए कुकर के ढक्कन से लार टपकने लगी। मुझे अफसोस भी हुआ। बेचारा कुकर। यही तो दिन हैं इसके खाने-खेलने के। ऐसे अनेक अवसर आये, जब कुकर का मन नहीं होता था तो भी बकरे का भेजा या मुर्गे की टांग जबर्दस्ती उसमें घुस जाते थे। प्रेशर लगाना पड़ता है। मजबूरी है। आप ही बताइये, वह कौन पत्थर दिल पेटू होगा जो ये सीन देखकर कुकर में सीटी न लगा दे। यही हाल कड़ाही का था। मछली के मूड़ों के बीच खेली-पढ़ी मेरी कड़ाही को आजकल पालक और करमकल्ले से काम चलाना पड़ रहा था। मिक्सी कल पूछ रही थी कि क्या मुझे खाली जूस निकालने के लिए रख छोड़ा है। आजकल मसाला क्यों नहीं पीसते। प्याज महंगा है तो चटनी ही पीस लो। भारी दिन चल रहे हैं क्या। अब मैं इस कम्बख्त कड़ाही और मिक्सी को कैसे समझाऊं कि हम जैसे आम आदमियों के लिए इससे भारी दिन और क्या होंगे।
प्याज महंगा होने से केवल किचेन का ही कुकर नहीं रो रहा है। कूकुर अर्थात कुत्ते भी रो रहे हैं। जो बंगलों की चारदीवारी में बंद रहते हैं, उनकी बात मैं नहीं जानता लेकिन गली के कुत्तों का तो स्वाद चला गया है। कल मैंने कूड़े के ढेर के पास एक कुत्ते को बेमन से टहलते देखा। भोज्य पदार्थों, अंत: और वाह्य वस्त्रों के टुकड़ों, कॉस्मेटिक सामान और कम्प्यूटर के पुर्जों सहित कई चीजें उस कूड़े की शोभा बढ़ा रही थीं लेकिन कुत्ते के चेहरे से उदासी की पर्तें हट नहीं रही थीं। पास ही एक सुअरिया अपनी दिनचर्या जी रही थी। सुअरिया तृप्त होकर खुश थी। कुत्ता उदास। एक तरफ आशा की ताल-तलैया थी। दूसरी तरफ निराशा की सुनामी। एक ओर मुंह लटकाये कुत्ता था तो दूसरी ओर चहचहाती-इठलाती सुअरिया। इधर खुशी, उधर मातम।
थोड़ी देर में सुअरिया ने कुत्ते से पूछा- 'कुत्ता सर! अब तो फिर एनडीए की सरकार बन गई है। लोगों में खौफ नहीं है। वे आधी रात तक घूमने-फिरने लगे हैं। अब तुम्हारे पास उन्हें काटने और भौंकने का चौबीसों घंटों इस्कोप है। चारों ओर सुशासन की बयार नहीं बल्कि आंधी चल रही है। कल मैं टहलते हुए नदी तक चली गयी थी। वहां कई सरकारी कर्मचारी एक अजगर से काम करवाने पर तुले थे। लेकिन वह भी था सरकारी अजगर। वह भी उस जमाने का, जब विभागों में काम न करने का रिवाज था। अजगर टस से मस होने को तैयार न था। इधर कर्मचारियों को भी नया-नया डीए मिला था। वे भी डीए के जोश में थे। बड़ी जोर-आजमाइश हुई। लेकिन होइये वही जो राम रचि राखा। अर्थात, इस युद्ध में विजय की जयमाला अजगर के गले में पड़ी। कर्मचारी ये कहते हुए वापस लौट गए कि दो बार डीए और बढऩे दो। इतने में तो इसे हिलाना भी मुश्किल है। खैर, उस अजगर से मेरी काफी देर बात हुई। तमाम मुद्दों पर। वह आजकल बीमार है। अल्ट्रासाउंड कराया था। डॉक्टर का कहना है कि बिना प्याज का मीट-मछली खाने से इसके पेट में इनफेक्शन हो गया है। दवा चल रही है। सुबह-शाम हरे प्याज वाला सागा खा रहा है और दूध में च्यवनप्राश ले रहा है।Ó
सुअरिया ने ढेर पर आकर गिरी नई लाट को देखकर एक बार अपने होंठों पर जीभ फेरी फिर आगे बोली- 'भाई ये प्याज-व्याज तो चोंचले हैं तुम लोगों के। हम लोगों को देखो। एक ही फेवरिट डिश। हजारों-लाखों सालों से चली आ रही है। न मैन्यू बदला। न अंदाज। सर्वत्र उपलब्ध। न बीपीएल कार्ड की जरूरत न एपीएल की। न चोर चुराये न डाकू ले जाये। न सडऩे का खतरा। न खराब होने का डर। न फ्रिज की जरूरत, न ओवन की। आदमी कुछ भी खाये, उसे कनवर्ट हमारी डिश में ही होना है। प्याज-लहसुन महंगा हो हमारी बला से। लेकिन तुम क्यों उदास हो। देखो दिसंबर खतम हो रहा है। किसी युवती की मादक अंगड़ाई की तरह ठंड अंग-अंग में चुभने लगी है। कितना रोमांटिक मौसम है। खास तौर से तुम कुत्ता समुदाय के लिए। अरे तुम्हें तो अपनी कुतिया को लेकर गोवा या शिमला निकल जाना चाहिए था। यहीं रहना था तो पटना के गांधी मैदान में रैली करते। आने वाले साल को 'अंतर्राष्ट्रीय कुत्ता वर्षÓ घोषित किए जाने की मांग करते... मगर तुम यहां मुंह लटकाये यहां घूरे के ढेर पर उदास बैठे हो। अच्छा बस इतना बता दो कि क्या तुम्हारी कुतिया किसी और के साथ भाग गई है या तुम्हारा पिल्ला पड़ोसी को पापा बोलता है। भगवान के लिए बता दो फिर मैं अपने प्रियतम के पास चली जाऊंगी। देखो कितनी देर से मेरा प्रियतम मैनहोल में युगल स्नान करने के लिए मुझे बुला रहा है।Ó
कुत्ते ने एक लंबी सांस ली और कहना शुरू किया- 'तुम्हें पता है कि किसी कुत्ते के लिए दुनिया की सबसे बड़ी सजा क्या है? उसे हड्डी से दूर कर देना। और हड्डी की सबसे बडी सजा है उसे लहसुन-प्याज से दूर कर दिया जाए। और मैं, एक कुत्ता होकर ये दोनों सजाएं एक साथ भोग रहा हूं। घोर नाइंसाफी है। पहले झुग्गी- झोपडिय़ों की जूठन में भी लहसुन-प्याज के छिलके के दर्शन हो जाते थे। लेकिन अब तो बंगलों के बाहर भी मूली और गोभी के पत्तों का पहरा है। अरे तुम क्या जाना कि दुनिया कितने तरह के स्वादों से भरी हुई है।Ó
कहते हुए कुत्ता बिना बल्ब वाले सट्रीट लाइट के खंभे के नीचे बैठ गया। पास ही किसी मैगजीन का फटा हुआ पेज पड़ा था। उस पेज पर प्याज की फोटो छपी थी और पीछे से गीत की आवाज आ रही थी- 'मैं तो एक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर!Ó

Saturday, October 30, 2010

दरोगा भर्ती लिखित परीक्षा (बिहार)

नोट : हर खंड के सभी सवालों का जवाब देना जरूरी है। हर सवाल के अंक अलग-अलग हैं, जो आपकी एड़ी की नाप और खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा जांचने के बाद निर्धारित किये जायेंगे।

खंड (क) सामान्य ज्ञान

(1) पोस्टमार्टम हमेशा मरने बाद ही क्यों किया जाता है?
(2) मृत्युपूर्व बयान जीवित अवस्था में क्यों दर्ज करवाना चाहिए?
(3) दो पुलिस वालों को मौसेरा भाई क्यों नहीं कहा जा सकता?
(4) एक आदर्श पुलिसकर्मी को अपने सेवाकाल में कितनी बार निलंबित और लाइन हाजिर होना चाहिए?
(5) इनकाउंटर में मरने के लिए अपराधी होना क्यों आवश्यक है?

खंड (ख) व्यावहारिक ज्ञान

(1) मां और बहन की गाली से आप क्या समझते हैं? ये अपने घर में क्यों नहीं दी जा सकतीं?
(2) 'वर्दी पर धब्बाÓ लगाने के पांच सर्वश्रेष्ठ तरीके कौन से हैं? तथा, पिछले वित्तीय वर्ष में इन धब्बों को छुड़ाने के लिए विभाग को कुल कितनी राशि खर्च करनी पड़ी?
(3) 'मुठभेड़Ó आउटडोर गेम है या इनडोर? इसे अपराधियों के अलावा और किन- किन लोगों के साथ खेला जा सकता है?
(4) क्या विभागीय महिलाओं को भी उन्हीं नजरों से देखा जाना चाहिए, जिन नजरों से कुछ पुलिस वाले अन्य को देखते हैं?
(5) प्रदेश के पांच नामचीन अपराधियों की जीवनी और उपलब्धियां संक्षेप में लिखिये। कोई भी जीवनी दो सौ शब्दों से ज्यादा बड़ी न हो। बेशक अपराधी चाहे जितना बड़ा क्यों न हो।

खंड (ग) आरक्षित ज्ञान

(1) 'आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूंÓ की अवधारणा पर जो लोग विश्वास करते हैं, उन्हें समाज में क्या कहा जाता है? चित्र बनाकर इस अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
(2) ट्रक के नीचे खड़े होकर लिए जाने वाले धन को भी ऊपरी आमदनी क्यों कहते हैं? ये अधिकतम कितनी ऊंचाई तक की जा सकती है, जिसमें निगरानी या इंटेलिजेंस का खतरा न हो?
(3) पांच अपराधी प्रति माह फरार होने की दर से पूरी जेल खाली होने में कितने वक्त की दरकार होगी?
(4) टिप्पण्ी लिखिये : कमीना, कुत्ता, पितृ नाम से अनभिज्ञ, मसालेदार मदिरा, डंडे का महात्म्य।
(5) थाने में ताला डालने में क्या-क्या कानूनी अड़चनें सामने आती हैं?

असली राशिफल- अपने कर्मों के आधार पर देखें

मेष : - इस राशि वालों के पंचम घर में राजद और छठे में बची-खुची लोजपा है। दूसरी ओर जद-यू और भाजपा का पंचक भी किलकारी मार रहा है। अत: थूक कर चाटने से बचें। आवश्यकता होने पर ही थूकें। किसी तरह काम न चले तो उसे गटक लें। ये प्राकृतिक विटामिन का काम भी करता है। आश्वासन और भाषणबाजी से कुछ दिनों के लिए तोबा कर लें। समाज से ध्वनि प्रदूषण कम करने में अपना हाथ बंटायें।

कर्क :- आपकी कुंडली में काले धन और काली महिला का योग है। यदि आप भी काले हैं तो कहना ही क्या। आपके दोनों हाथों में लड्डू है। अमावस की रात में चेहरे पर कालिख पोत कर और काला कंबल ओढ़कर, बिना स्ट्रीट लाइट वाली सड़क के खुले मैनहोल के पास काले कुत्ते को काली मसूर की दाल खिलायें। साथ में आप भी खायें। मनोकामना पूर्ण होगी। जमीन पर चलने से बचें। रात में एक पैर बांधकर सोयें।

तुला :- बड़ा लड़का प्रेम विवाह करेगा। जिसके कारण दहेज हानि का योग है। छोटे की शादी में भरपूर मिलेगा लेकिन वह सब बारात बिदा कराकर लौटते समय लुट जायेगा। उसमें अगर आप बच गये तो जिंदा रहेंगे। बेहतर हो कि बचे हुए कामकाज जल्द से जल्द निपटा लें और संपत्ति का बंटवारा कर दें। किसी पर भरोसा न करें। खुद पर भी नहीं। पंद्रह दिन तक आधी रात को देसी दारू पीकर बुलंद आवाज में पड़ोसियों को गालियां दें। सोलहवें दिन बिना किसी प्रयास के आप पोस्टमार्टम हाउस पहुंच जायेंगे। वहां से मोक्ष पाने का प्रयत्न करें।

मकर :- उदर विकार रहेगा। पेट में बातें पचाने में कठिनाई होगी लेकिन परनिंदा में आनंद आयेगा। हां, पड़ोसियों से संबंध खराब होने का पूरा-पूरा खतरा है। जीवन साथी आपके चरित्र पर शक करेगा। किंतु उसकी परवाह न करते हुए नये संबंधों को बदस्तूर जारी रखें। बच्चों को प्रेम विवाह के लिए उकसायें क्योंकि दहेज के जमाने में बेटी को डोली में बिठाना आपके बूते में है नहीं। बड़ा लड़का भी किसी लड़की को भगा कर लायेगा। अग्रिम जमानत का बंदोबस्त कर लें क्योंकि अपहरण का मुकदमा आप पर भी लदने का अंदेशा है।

वृष :- बुरी तरह अपमान का योग है। पुलिस से सहायता हरगिज न मांगें। अपरिहार्य हो तो किसी अपराधी को कांफीडेंस में लें। मनोदशा पिछले अपमान जैसी ही रहेगी। अर्थात, दूसरों की पत्नियों को आप घूरेंगे और दूसरे आपकी। ऐहतियात और संयम से काम लें। वरना मोहल्ले के साथ-साथ घर में भी चप्पलें पडऩे का खतरा है। एक आंख बंद करके किसी पैदायशी एक आंख वाले को एक समय का भोजन करायें और उसे भोजपुरी गानों की सीडी भेंट करें।

सिंह :- आपका खराब समय शुरू हो चुका है। दफ्तर में बॉस से कहासुनी होगी। तो आपकी नौकरी कितने दिन चलेगी। नौकरी नहीं रहेगी तो घर में बीवी क्यों रहेगी। वह मायके जाने की धमकी देकर आपके बॉस के घर की शोभा बढ़ायेगी। ऐसी स्थिति आने से रोकने के लिए रोज सुबह-शाम बॉस के साथ उनकी पत्नी की भी आरती उतारें। बुधवार की दोपहर को पत्नी पीडि़त दोस्तों के साथ बैठकर 'बेवफा बीवीÓ कहानी का पाठ करें। पाठ की समाप्ति कर सब मिलकर दो-दो पैग दारू का प्रसाद ग्रहण करें।

वृश्चिक :- आप गल्ती से मनुष्यों में पैदा हो गये हैं। इस सच्चाई को शीघ्र से शीघ्र स्वीकार करें और मोहल्ले के कुत्तों की सोहबत करें। उनकी चाल-ढाल, बोलचाल, आचार-विचार और चरित्र का अध्ययन करें। एक पैर उठाकर आवश्यक कार्य निपटायें। भोजन करते समय हाथों का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। कोशिश करें तो लेटकर भी सुगमता से खाना सीख जायेंगे। आधी रात को उठकर मोहल्ले के कुत्तों के सुर में सुर मिलाने का अभ्यास करें। इसे उस दिन सफल मानें, जिस दिन कोई कुतिया आपकी आवाज से मुतस्सर होकर खिंची चली आये। चार पहिया वाहनों से सावधान रहें।

कुम्भ :- आपके पंचतत्वों, क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा में जल का तत्व गौण है। आंखों में तो कभी था ही नहीं। अर्थात आपमें राजनीति करने के पूरे लक्षण हैं। एकाध आपराधिक मुकदमे भी खुद पर चलवाने का प्रयास करें। आपके अंदर चूंकि जल का तत्व गायब है इसलिए आपको जल से परहेज रखना चाहिए। पानी तभी पियें जब प्यास लगे। नीट पानी तो हरगिज न पियें... उसमें रम, व्हिस्की या ठर्रा आदि पौष्टिक पेयों का अवश्य समावेश करें। स्नान करने की कतई न सोचें। आपके लिए एक चुल्लू ही काफी है। ऐसे में बाथरूम के भीतर कदम रखना आपके लिए हितकर नहीं है।

Saturday, April 24, 2010

चंद नये यातायात संकेत

अपना शहर जो दुर्भाग्य या सौभाग्य से ऐन बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। इस शहर में लोग चलने के लिए प्राय: दो विधियों का प्रयोग करते हैं। एक - सड़क और दूसरे - गढ्डे। सड़क और गढ्डों का वही संबंध है जो छायावादी कवियों ने चोली और दामन तय कर दिया है। इसलिए दोनों को एक- दूसरे से जुदा करने पर वही दफा लगती है, जो लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट, सलीम-अनारकली, हीर-रांझा आदि प्रागैतिहासिक प्रेमी युगलों के खिलाफ साजिश रचने वालों पर लगी थी। फिर भी जुदा नहीं किया जा सका। तो नगर निगम किस खेत की मूली है। इसलिए जनता जब ज्यादा शोर मचाती है तो कुछ सड़कों बनाने के लिए निगम तोड़ देता है। अर्थात निर्माण के लिए विध्वंस। एक डान को मारने के लिए दूसरे को पैदा करना ही पड़ता है। यही सृष्टि का भी नियम है।
खैर, बात हो रही थी शहर की, जो दुर्भाग्य या सौभाग्य बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। सवाल यह है कि शहर में लोग चलते कैसे हैं। जैसा मैंने ऊपर कहा कि शहर में चलने के लिए सर्वाधिक सुलभ साधन दो ही हैं- सड़क और गढ्डे। वो बात अलग है कि कुछ ज्ञान पिपासु अपनी जिज्ञासा शांत करने को मैनहोल या नाले का रुख भी कर लेते हैं।
कुछ शव के रूप में शहर को अपना अंतिम दर्शन देते हैं। बाकी इसकी जरूरत भी नहीं समझते और परिवार को मुआवजे के हवाले करके सीधे बैंकुठधाम की राह पकड़ लेते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनकी आत्मा को दुर्घटना मे मरने के बाद ही शांति मिलेगी। अत: वे वही रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। वैसे मरने के लिए बाढ़ और सूखा भी विकल्प हैं लेकिन काफी लोग इतना धैर्य नहीं रख पाते। आप ही बताइये कि जाड़े में मरने का मूड बनाने वाला व्यक्ति क्या अगली बरसात की राह देखेगा। वो भी भरोसा नहीं कि बरसात हो ही जाएगी।
हालांकि आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम हमारी पुलिस भी करती है लेकिन लोगों का उस पर विश्वास नहीं। फर्जी एनकाउंटर भले थम गए हों लेकिन 'अपराधी' को मारने पर किसी युग में प्रतिबंध नहीं रहा है। आज भी नहीं है। लेकिन कुछ लोग पिछड़े के पिछड़े ही बने रहना चाहते हैं। पुलिस के हाथों मरने में उनकी नानी मरती है।
बहरहाल, मेरे कहने का लब्बो-लुआब ये है कि सांसारिक माया-मोह से छुटकारा पाने को शहर की सड़कें और गडढे भी कम भूमिका नहीं निभाते। मेरे एक परिचित का करीब तीस वर्ष का अनुभव है नगर निगम का। वह उसके कर्मचारी नहीं हैं लेकिन मुकदमा लड़ते- लड़ते कानून और नियमों के पक्के जानकार हो गए हैं। उनका कहना है कि नगम के संविधान में सड़कों का प्रावधान तो है लेकिन गढ्डों का नहीं। शायद संविधान लिखने वालों ने गढ्डों की कल्पना नहीं की होगी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में कोई गढ्डा प्रधान युग आएगा, जिसमें शहर, मोहल्ला और सड़क क्या.. पूरे के पूरे देश को ही समा लेने की क्षमता होगी।
हमारे - आपके सौभाग्य से ये वहीं युग है। सड़क से लेकर विधानसभा तक गढ्डे ही गढ्डे हैं। अलग- अलग साइज और प्रकृत्ति के। शहर में यातायात भी सदा सुहागन है। गढ्डों के आसपास मौजूद सड़क के किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, इसके लिए यातायात विभाग और थाना-चौकी भी हैं। इसके अलावा काफी अरसे से महसूस किया जा रहा था कि सड़कों और चौराहों पर जो यातायात संकेत के बोर्ड लगाए जाते हैं, वे शहर की फितरत से मेल नहीं खाते। इस शहर को ऐसे संकेतों की आवश्यकता है, जिसके लोग अभ्यस्त हैं। विभाग की सुविधा के लिए परिस्थितयों का उल्लेख मैं कर देता हूं। उनके लिए संकेत यातायात विभाग तय कर ले।
मुलाहिजा हो :-
* चौराहे पर पुलिस की जगह गाय बैठी है। कृपया उसके गोबर को क्षति पहुंचाये बिना सड़क पार करें।
* स्ट्रीट लाइट खराब है। लेकिन खंभे में करंट आता है। सावधान रहें।
* अगले मोड़ पर पिस्तौल- चाकू से लैस दो कार्यकर्ता लैस मिल सकते हैं। अपना भला- बुरा आप खुद सोच लें।
* सिपाही जी की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए ट्रक वालों से निवेदन है कि खुले पैसे लेकर चाय की दुकान पर आ जाएं।
* चौराहे पर कुत्तों के वर्चस्व की जंग जारी है। और, अस्पताल में रैबीज के इंजेक्शन नहीं हैं।
* यहां उत्तम किस्म की नकली दारू हर समय मिलती है। चुनाव, रैलियों या विशेष अवसरों पर आर्डर देकर सप्लाई की व्यवस्था है।
* आगे जाम लगा है। तुरंत पीछे लौट जाएं वरना फिर पलट भी न सकेंगे।
* इस रोड पर विधायक निधि से अतिक्रमण किया गया है। उसे घूरें नहीं।

Wednesday, April 21, 2010

जलजमाव - गंदगी पर उच्च स्तरीय वैज्ञानिक विश्लेषण

शहर की गंदगी अब एक तरह से ब्रांड बन चुकी है। चैनल वाले उसे इतने ऐंगल से घुमा- घुमाकर दिखा चुके हैं कि अब गंदगी का सारा ग्लैमर खत्म हो चुका है। इतने मनोयोग से शायद फैशन परेड का कवरेज भी नहीं करते होंगे। खैर, इधर सुनने में आया है कि गंदगी से अब सरकार, विपक्ष, अधिकारी और पीडि़तों से लेकर नॉन पीडि़तों तक के सब्र का पैमाना भर चुका है। यही नहीं बरसों पूर्व स्वर्गीय हो चुके स्वनामधन्य वैज्ञानिक भी इस गंदगी से चिंतित हैं।
पिछले दिनों इन वैज्ञानिकों की आत्माओं का एक अखिल ब्रह्मांड सम्मेलन अंतरिक्ष के गांधी मैदान में हुआ। सम्मेलन में मुजफ्फरपुर की गंदगी, अतिक्रमण, वसूली, बिजली, पानी, कूड़ा- कचरा, जलजमाव, अस्पताल आदि समस्याओं पर भी विचार किया गया। चूंकि ये विश्लेषण चोटी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, इसलिए इसे 'चोटी का वैज्ञानिक विश्लेषण' नाम दिया गया।
महान वैज्ञानिक आइंसटीन का मानना था कि मई के महीने में साढ़े तीन सौ प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के उल्कापिंड धरती पर अस्सी डिग्री देशांतर से दशमलव पंद्रह मिलीमीटर ईस्ट में गिरते हैं। ये जगह ठीक वहां है, जहां अघोरिया बाजार का नाला गिरता है। लेकिन दिखता नहीं क्योंकि उस पर अतिक्रमण किया गया है। अत: जब तक तीन अरब साल से जारी उल्कापिंडों की इस बारिश को कर्क रेखा से पौने पांच सौ वर्ग माइक्रोमीटर देशांतर में शिफ्ट नहीं किया जाएगा, तब तक कल्याणी चौक के जाम की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
ये सुनकर आर्कमिडीज की आत्मा को क्रोध आ गया। वह बिगड़कर बोली- 'जलजमाव का मुझसे ज्यादा तजुर्बा है आपको। मैं तो डिक्लेयर्ड साइंटिस्ट ही वहीं हुआ।' खैर, दादा आर्कमिडीज ने जो फार्मूला बताया, उसके अनुसार जलजमाव प्रभावित क्षेत्रों की टोटल गंदगी को नालों की सिल्ट में जोड़ने के बाद उसमें नगर निगम के कुल कर्मचारियों की संख्या का गुणा करने पर जो संख्या ज्ञात होगी, उसमें अघोरिया बाजार के आयतन का भाग दे दें। इस भागफल और भारत के अंतरिक्ष भाग्यफल में जो अनुपात है, उससे क्षेत्र की कुल गंदगी का पता लगाया जा सकता है। और तब ही इसका समाधान हो सकता है।
गुरुत्वाकर्षण के नियम यदि न्यूटन ने खुद न बनाये होते तो इस वक्त वहां दरोगा जी फौजदारी का मुकदमा लिख रहे होते। बात ही कुछ ऐसी कही थी आर्कमिडीज ने, जिसे सुनकर न्यूटन का खून खौलने की इजाजत मांगने लगा। आर्कमिडीज का फार्मूला उन्होंने सुना। एकदम असहमत थे उससे। उनके हिसाब से भारत का अंतरिक्ष भाग्यफल और अघोरिया बाजार की गंदगी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सर आइजक का मानना था कि ये सब क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप है। यदि अघोरिया बाजार को उसी तरह पलटा जा सकता, जिस तरह पैजामा सीधा करके पहना जाता है तो निश्चित रूप से वहां पांच अरब साल ईसा पूर्व हुए जलजमाव के निशान मिल जाएंगे। वर्तमान संकट तो तत्कालीन दमन की प्रतिक्रिया भर है। हालांकि दुनिया को गति के नियमों से परिचित कराने वाला महान वैज्ञानिक इस बात पर अवश्य हैरान था कि नगर निगम के कार्य की गति कौन से नियम से प्रतिपादित होती है।
इसके बाद सम्मेलन में गैलीलियो, राबर्ट बंधु, मार्कोनी, ग्राहम बेल, वगैरह- वगैरह ने भी अपने- अपने शोधपत्र पढ़े। जिनसे निष्कर्ष निकला कि जब तक शहर के आपेक्षिक घनत्व और नगर निगम की आद्रता की रासायनिक प्रतिक्रिया होती रहेगी, तब तक इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। मुख्यमंत्री कर लें तो भले कर लें।

Tuesday, April 20, 2010

थूक का महात्म्य

'थूक' एक प्रकृति प्रदत्त पदार्थ है और थूकना मनुष्य प्रदत्त आदत। 'थूक' का उत्पादन मनुष्यों और पशुओं दोनों प्राणियों में समान रूप से होता है। अभी ये तय नहीं हो सका है कि 'लार गिरना', 'थूक कर चाटना', 'थू-थू करना' या करवाना जैसे मुहावरे मनुष्यों की वजह से गढ़े गए या पशुओं की वजह से।
खैर, उत्पादन भले पशुओं में भी होता हो लेकिन इसका सर्वाधिक वितरण सर्वाधिक मनुष्यों में ही होता है। कुछ लोग इसका वितरण किए बिना बात तक नहीं कर पाते। इनके सामने खड़ा व्यक्ति या तो बार-बार अपना चेहरा रूमाल से पोंछता रहता है या फिर सामने वाले के जोरदार झापड़ रसीद कर देता है।
मुहावरे की दृष्टि से ये प्रक्रिया 'मुंह पर थूकना' की श्रेणी में आती है। लेकिन मुहावरे में चूंकि मुंह पर पड़ने वाले छींटों की मात्रा तय नहीं की गयी है, इसलिए ये प्रक्रिया आज तक गुमनामी की जिंदगी जी रही है। 'थूककर चाटना' एक अन्य मुहावरा है। इस मुहावरे में चूंकि पदार्थ का स्वाद स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे स्वांत: सुखाय की श्रेणी में मान लिया गया है।
राजनीति में थूककर चाटने वालों का सबसे ज्यादा महत्व है। बल्कि यूं कहें कि केवल राजनीति ही ऐसा क्षेत्र है, जहां थूकने और फिर चाटने की पूरी आजादी है। इसका प्रमाण है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल को थूकने या चाटने के लिए गठबंधन करते नहीं देखा गया। इसके लिए पूरी स्वतंत्रता दी गई है। आदमी कहीं भी कुल्ला भर- भरके थूक सकता है और विकास में अपना हाथ बंटा सकता है। सच कहा जाए तो राजनीति में थूकने और चाटने की असीम संभावनाएं हैं। मैनेजमेंट की भाषा में कहा जाए तो कामयाबी पाने की महत्वपूर्ण टिप।
बिहार एक खैनी प्रधान प्रदेश है। खैनी और थूक का चोली-दामन का साथ है। दूसरे शब्दों में खैनी को थूक फैक्ट्री का रा-मैटेरियल भी कहा जा सकता है। यदि मान लिया जाए कि सूबे में प्रतिदिन तीन मीट्रिक टन खैनी की खपत है तो निश्चित मानिये कि थूक का उत्पादन भी इससे कम कतई नहीं होगा। अब यदि राष्ट्रीय औसत निकाला जाए तो बिहार थूक उत्पादन में अग्रणी राज्यों में होगा।
लेकिन अफसोस कि तमाम खनिज संपदा की तरह ये संपदा भी समुचित योजनाओं के अभाव में बर्बाद हो रही है। सैकड़ों क्विंटल थूक चौराहों, गलियों, सरकारी कार्यालयों के कोनों, दीवारों, डस्टबिनों आदि में बर्बाद कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे प्रदेश का सैकड़ों टन थूक दूसरे प्रदेशों की धरती सींच रहा है। ये अपने संसाधनों की बर्बादी नहीं तो क्या है।
हर व्यक्ति को कहीं भी थूकने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे उन राज्यों या विदेशी सरकारों से सख्त नफरत है, जो थूकने पर जुर्माना वसूल लेती हैं। यह प्राकृतिक संपदा का अपमान ही नहीं, हमारी बरसों पुरानी आदत का दमन भी है। लेकिन खुशी की बात है कि हमारे प्रदेश में थूकने की पूरी आजादी है। कहीं भी थूक सकते हैं लेकिन इसके लिए सबसे माकूल जगह सड़क मानी गई है। .. क्योंकि वह अपनी जागीर होती है। उसे तोडि़ये, खोदिये, अतिक्रमण कीजिए, थूक की नदियां बहा दीजिए या कितना भी अत्याचार कीजिए, वह बेचारी चूं तक नहीं करती।
हां, सड़क पर थूकने वाले कभी- कभी गलतफहमियां अवश्य पैदा कर देते हैं। कुछ लोग इस डिजायन से थूकते हैं कि खड़े होकर देखने पर गिलट का रुपया लगता है। इस चक्कर में बाद में अपने हाथ चुपचाप पैंट से पोंछते नजर आते हैं। मेरे एक पड़ोसी को थूकने के बाद कुछ देर निहारने की आदत थी। पता नहीं वह उसमें क्या तलाशते थे जो उन्हें पूरे जीवन नहीं मिला और एक दिन अचानक उसी थूक को निहारते- निहारते उनकी आत्मा उसी में समाहित हो गई।
एक बात और। लहू का रंग भले एक होता हो लेकिन थूक का नहीं। काल-परिस्थिति और आदतों के अनुसार यह बदलता रहता है। जैसे तंबाकू खाने वाले व्यक्ति से आप दूध जैसे उजले थूक की कल्पना नहीं कर सकते। इसी विधि से लाल, हरे, नीले, चितकबरे, सिल्की सिल्वर, मून लाइट, गोल्डन सिल्वर आदि रंगों का थूक देखकर आप उसके जनक के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। गनीमत है कि भविष्यवक्ताओं तक अभी ये आइडिया नहीं पहुंचा है। वरना हर पैथेलाजी लैब में एक ज्योतिषी भी बैठा नजर आने लगेगा।
लार को थूक की छोटी बहन कहा जा सकता है। जो अक्सर दूसरों की सुख-समृद्धि देखकर खुद-ब-खुद चू जाती है। खैर, बात थूक की चल रही थी। इसी थूक की वजह से कई बार प्रदेश मुसीबतों में पड़ते-पड़ते बचा है। घटना छठ के आसपास की है। एक नेता जी ने गंगा भ्रमण के दौरान उसमें थूक दिया। गंगा मैया को थूक अर्पण की इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई। किसी ने थूक का बदला थूक से लेने की प्रतिज्ञा कर डाली। तो कोई नेता जी के थूक के कतरे गंगा जी से ढुंढवाकर उसका डीएनए टेस्ट करवाने पर अड़ गया। जिनकी समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने गंगा जी की ओर मुंह करके जोरदार प्रणाम किया और जोर से खंखारकर वहंीं रेत पर थूक दिया। ताकि सनद रहे और आने वाली बरसात में रेत में सूख चुका थूक नदी के पानी में मिलकर अमृत बन जाए। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जितनी विधियो हो सकती थीं, सब अपना ली गई।
कहने का मतलब सब हुआ लेकिन बेचारी गंगा मैया के विचार जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। मैली गंगा का उलाहना तो सभी देते हैं किंतु अपने हिस्से की गंदगी को उसमें बहाने से गुरेज नहीं करते। कहते हैं कि गंगाजल में मिलकर हर चीज पूज्य और पवित्र हो जाती है। अत: भविष्य में यदि वैज्ञानिकों के हाथ नेता जी के थूक के अवशेष लग जाएं तो उसे पवित्र मानकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवा दी जाए। मगर इस मुद्दे पर एक- दूसरे की थू-थू से बिल्कुल तोबा कर ली जाए। थोड़ा कहे को ज्यादा समझिएगा। नो स्पिटिंग प्लीज!