Monday, July 18, 2022
एक असली शेर से मुलाकात
एक असली शेर से मुलाकात
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हमारे देश में मुख्यत: दो तरह के 'शेर' पाए जाते हैं, एक सिट्टी-पिट्टी गुम करने वाले और दूसरे शायरी में 'अर्ज़' किए जाने वाले। पहले को देखकर मुंह से 'आह' निकल जाती है और दूसरे को सुनकर 'वाह'! दूसरे वाले सिर्फ़ मुशायरों-महफिलों या शायरों के दीवानों में मिलते हैं लेकिन पहले वाले नोट-सिक्के, बच्चों की किताबों, सरकारी इमारतों-दस्तावेजों से लेकर चिड़ियाघर तक में उपलब्ध होते हैं। इन्हें जंगल का राजा भी कहा जाता है। लेकिन जबसे जंगल कट गए हैं, राजा साहब के रुतबे और संख्या, दोनों में कमी आ गई है। बेचारे प्रीविपर्स के सहारे ज़ू में ज़िंदगी बिता रहे हैं।
पहले ये सर्कस में भी पाए जाते थे किंतु पशुओं के 'मानवाधिकार' का मुद्दा उठने के बाद से सर्कस में इनका भूगोल, इतिहास हो गया। वैसे तो अब सर्कस भी इतिहास बनते जा रहे हैं। मांएं अक्सर अपने बच्चों को सुलाने के लिए शेर के नाम का प्रयोग करती हैं। बच्चा जब तक मोबाइल गेम वाले शेर से परिचित नहीं होता, सो भी जाता है। उसके बाद ख़ुद शेर हो जाता है और मां को सुला देता है। शेर हमारा राष्ट्रीय प्रतीक भी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शेर के कई उपयोग हैं। ये तो अच्छा है कि ये सारी बातें शेर को नहीं पता वरना कबका रॉयल्टी की मांग कर चुका होता।
आजकल इसको मुद्दा बनाकर भी उपयोग किया जा रहा है। मज़े की बात तो ये है कि शेर को मुद्दा बनाने वालों में कुछ गीदड़, रंगे सियार, गिरगिट और आंसू बहाने वाले घड़ियाल भी शामिल हैं। देश के नए संसद भवन के शीर्ष पर स्थापित किए जाने वाले शेरों की मुख मुद्रा कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रही है। उनका मानना है कि ये शेर आक्रामक हैं, जबकि मूल कृति सारनाथ वाले शेर सौम्य हैं। अजीब तर्क है। शेर मूलतः एक हिंसक जानवर है। नव रस की दृष्टि से, उस पर स्वाभाविक रूप से रौद्र, वीर, भयानक और वीभत्स रस शोभा देते हैं। यदि कोई उसमें श्रृंगार, हास्य, करुण, अद्भुत और शांत रस देखना चाहे तो उसकी बुद्धि पर 'तरस' खाने का दिल करता है।
ख़ैर, मामले को तूल पकड़ता देखकर आखिर हमारे भीतर का भी शेर...मतलब पत्रकार जाग गया और हम अपना बीमा कराने के उपरांत जा पहुंचे शेर की मांद में। पहुंच तो गए किंतु उसे देखते ही हाथों से तोते उड़ गए...सारी हिम्मत काफूर हो गई। हमें घबराया देखकर राष्ट्रीय पशु, राष्ट्र भाषा में बोला, "तुम्हारा परिचय?"
"हम आपके साढू भाई।"
"क्या मतलब?" वह बोला।
"मतलब शादी से पहले हम भी शेर थे," हमने जवाब दिया।
ये सुनकर वह इतनी विकराल हंसी हंसा कि हम सहम गए। आगे बोला, "डरो मत! चले आओ...सावन शुरू हो चुका है इसलिए एक महीने के लिए मैंने नॉन वेज छोड़ दिया है।"
"नॉन वेज छोड़ दिया या माहौल देखकर डर गए?"
"डरता तो मैं किसी के बाप से भी नहीं," शेर दहाड़ा फिर अचानक धीमे स्वर में बोला, "पत्नी को छोड़कर...मुद्दे पर आओ।"
"मुद्दे की ही बात कर रहे हैं। कुछ लोगों को आपकी भाव भंगिमा पर आपत्ति है। उनका कहना है कि पहले आप सौम्य और शांत थे...अब दहाड़ रहे हैं?"
"नासमझ हैं वे, जो ऐसा कहते हैं। तुमने अक्षय कुमार के मुंह से वो कहावत तो सुनी ही होगी कि शेर जब दो कदम पीछे लेता है तो लंबी छलांग लगाने के लिए...न कि भागने के लिए। उस सारनाथ वाली 'सौम्यता' को तुम पीछे वाले दो कदम समझो। अब 'स्टार्टअप नाथ' वाला, दहाड़ने का दौर है। पिछली सरकार में तुमने 'सिंह' को भीगी बिल्ली बनकर 'म्याऊं-म्याऊं' करते देखा होगा...अब वो दिन लद गए जब खलील खां फाख्ता उड़ाया करते थे। ये नए ज़माने का भारत है... मैं ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरह से दहाड़ सकता हूं...लेकिन महाराजा दुष्यंत और उनके पुत्र भरत के समय के कुछ संस्कार अभी शेष हैं इसलिए केवल प्रतीक रूप में दहाड़ा हूं।"
शेर अपनी रौ में बोले जा रहा था। ऐसा लगता था उसे काफ़ी दिन बाद बोलने का मौका मिला है या शायद भाभी जी...मतलब शेरनी उस वक्त मांद में नहीं थीं। शेर जी वाकई शेर बन गए थे। आगे बोले, "मेरी जिस पुरानी सौम्य फ़ोटो की चर्चा हो रही है, वह उस ज़माने की है, जब न टेलीफोन होता था...न कैमरा। इंसान ही नहीं, जानवर भी
सीधे साधे होते थे। मूर्तिकार या चित्रकार जिस मुद्रा में मॉडल को बैठा देते, बैठे रहते थे। अब मोबाइल का दौर है। सेल्फी का ज़माना है और तुम जानते हो कि उल्टा-सीधा मुंह बनाए बिना सेल्फी अच्छी नहीं आती। मैंने भी सेल्फी ली और लोगों ने मुख मुद्रा को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया।"
हमने विषय बदलने की गरज से अगला सवाल किया, "श्रीलंका में रहने वाला आपका कज़न आजकल बड़ी मुसीबत में है...आप उसकी कुछ मदद क्यों नहीं करते?"
"भारत सरकार कर तो रही है मदद। वैसे भी ड्रेगन से दोस्ती का यह नतीजा तो होना ही था...होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा।" कहकर शेर ने तो चुप्पी साध ली किंतु गुफ़ा के मुहाने से ज़ोरदार दहाड़ सुनाई दी। दहाड़ श्रीमती शेर की थी। उन्होंने हमारा गिरेबान पकड़कर पूरा जबड़ा खोला ही था कि आंख खुल गई। सामने लाल-लाल आंखें लिए हमारी पंजीकृत शेरनी ... अर्थात पत्नी खड़ी थीं और हम औकात में आ चुके थे।
- कमल किशोर सक्सेना
Sunday, July 10, 2022
सीनियर सिटीजन प्ले ग्रुप स्कूल
सीनियर सिटीजन प्लेग्रुप स्कूल
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खुल गया! खुल गया!! खुल गया!!! आपके शहर लखनऊ में बुज़ुर्गों का माकूल ठिकाना...बोले तो...स्कूल खुल गया। आपके दांत गिर चुके हों। नकली डेंचर लगा हो। पैर चलने को उधार मांगते हों। सांस फूलती हो। डिसेंट डिसेंट्री के मरीज़ हों या धैर्य धराऊ कब्ज़ के। बायपास सर्जरी शुदा हों या डायलिसिस के शौकीन। ख़िज़ाब, बालों से या हड्डी, खाल से पनाह मांग रही हो। हाथों पर फ़ालिज का फ़ौरी हमला हो या पांव कब्र में लटकने के मुन्तज़िर। तो भी न घबराने की ज़रूरत है, न झिझकने की। ज़िंदगी चुक चुकी हो तो भी ये मौक़ा मत चूकें। नए-नए बुड्ढे हों या सेकंड हैंड जवान। पेंशन पाते हों या लड़का-बहू की लात या दोनों। सबके लिए समान अवसर। वृद्धों और वृद्धियों में कोई भेदभाव नहीं। को-एजुकेशन की व्यवस्था।
हमारे शहर में जब से ये स्कूल खुला, वरिष्ठ नागरिकों में खुशी की लहर दौड़ गई। ख़िज़ां को फटकने की दावत देते चेहरों पर बहार आ गई। अपने ज़माने के नामी-गिरामी बैक बेंचर, स्कूल में कुकड़ूं कूं की अलाप लगाने वाले चिकन और चिकन गुनिया, हर क्लास में कई-कई साल टिककर ठोस पढ़ाई करने वाले अनुभवी फेलियरों की तो लॉटरी लग गई। बंटी की दादी हों या पिंकू के दादा, सबका मनपसंद शगल बन गया-सीनियर सिटीजन प्ले ग्रुप स्कूल।
ये स्कूल सुबह बुज़ुर्गों द्वारा ऊपर वाले को याद करने के साथ शुरू होता है ताकि ऊपर वाला उन्हें याद न कर ले। फिर 'गया' एक-एक बुड्ढे-बुड्ढी को हाथ पकड़कर उनकी क्लास में पहुंचाता है। पहले इस काम के लिए 'आया' को रखा गया था। लेकिन स्कूल खुलने के दो दिन बाद ही, विधुर होने की हैट्रिक जड़ चुके एक बुज़ुर्गवार 'आया' को लेकर 'गया' हो गए। उसके बाद से 'आया' के काम के लिए 'गया' को रख लिया गया।
क्लास का सीन ये होता है कि ज़मीन पर रखी कुर्सी-मेज़ों, गद्दों और गाव-तकियों पर बुज़ुर्ग वार अपने-अपने गिलास-कटोरे और चुसनी के साथ रखे हैं। करीब-करीब हर छात्र-छात्रा के कान और नाक चश्मे की गिरफ्त में हैं। टीचर ब्लैक बोर्ड पर एक गोला बनाकर पूछते हैं, "ये क्या है?" खैनी मलता एक छात्र जवाब देता है, "संडास"! दूसरा जवाब, हिलती गर्दन वाले सिर में जड़े मुंह से आता है, "मैनहोल"! ज़बरदस्त नज़ले से परेशान तीसरा मुंह नाक का तोहफ़ा ज़ुबान से रोकने की कोशिश करते हुए बोल पड़ता है, "उल्टा तवा!"
इसके बाद कोई सवाल-जवाब नहीं होता। अब बाबा लोगों का बीपी और दादी लोगों की शुगर चेक करने का टाइम है। आया की जगह रखा गया 'गया' इसे अंजाम देता है। फिर वह सारे स्टूडेंट्स के कान पर जाकर घंटा बजाता है क्योंकि कुछ ऊंचा सुनते हैं, कुछ बिल्कुल नहीं और कुछ के कान रिपेयरिंग और ओवरहालिंग मांगते हैं। पीरियड ओवर। अगला पीरियड पीटी का है। सबको फिर उंगली या हाथ पकड़कर मैदान में लाया जाता है। बाबा आरामदेव के कज़िन विरामदेव ये पीरियड लेते हैं। सब छात्र-छात्राएं ज़मीन पर बैठकर अनुलोम-विलोम, कपालभांति और सूर्य नमस्कार करते हैं। सूर्य नमस्कार करने में कुछ छात्रों के हाथ-पैर आपस में उलझ जाते हैं। उन्हें सुलझाने के लिए डॉक्टर झटका को डिस्पेंसरी सहित बुला लिया जाता है।
एक दिन स्कूल में बदन पर अचकन-चूड़ीदार पैजामा, सिर पर दुपल्ली टोपी, पैरों में कामदार जूतियों में पैबस्त, हाथों में छड़ी लिए लहराते-झूमते, 70 के फेंटे में फिंटे हुए एक बड़े मियां नमूदार हुए। उनके साथ चार कारिंदे भी थे। एक के हाथ में हुक्का, दूसरे के पानदान और तीसरे के उगालदान था। चौथा आगे-आगे रास्ते में झाड़ू देता चल रहा था। ये पूरा काफ़िला बिना किसी की इजाज़त लिए प्रिंसिपल के कमरे में घुस गया। बड़े मियां ने अपनी तशरीफ़ कुर्सी पर टिकाने के बाद एक कारिंदे को इशारा किया।
"हुज़ूर अवध के उजड़े नवाबी ख़ानदान से ताल्लुक रखते हैं," कारिंदे ने बड़े मियां की शान में कसीदे पढ़ते हुए आगे कहा, "आपके मदरसे में तालीम लेने की गरज़ से दाखिले के ख्वाहिशमंद हैं। ये देखिए हुज़ूर का नवाबी सर्टिफिकेट," कहकर कारिंदे ने दो डंडियों के सहारे शनील के कपड़े में लिपटा एक कागज़ प्रिंसिपल साहब के आगे रख दिया।
प्रिंसिपल ने उसे उठाकर पढ़ा, फिर एक नज़र नवाब साहब को देखा और बोले, "ये तो नूर मंज़िल का प्रिस्क्रिप्शन है...क्या नवाब साहब का दौलतखाना वहीं है या वहां इलाज फ़रमां हैं?"
"नहीं जनाब, हुज़ूर अब बिल्कुल ठीक हो चुके हैं। आपको यक़ीन न हो तो उन डॉक्टर साहब से दरयाफ्त कर लें, जिन्होंने हुज़ूर का इलाज किया था और इन्हें ठीक करने के बाद अब अपना इलाज करवा रहे हैं।"
"उसकी ज़रूरत नहीं है," प्रिंसिपल ने दुपल्ली टोपी के नीचे टंके चेहरे को ग़ौर से देखते हुए आगे कहा, "मैं नवाब साहब को पहचान रहा हूं...नूर मंज़िल में ये मेरे रूम मेट हुआ करते थे। इनके आ जाने से हमारे स्कूल की बिल्डिंग में शौहरत के चार चांदों समेत और भी सितारे जड़ जाएंगे।"
इसके बाद नवाब साहब का दाखिला हो गया। बड़े मियां यानी नवाब साहब कुर्सी से उठते हुए सिर्फ़ इतना बोले, "हम कल से आपकी अंजुमन की रौनक बढ़ाएंगे...क्लास में चार अदद स्टूलों का भी इंतज़ाम रखिएगा।"
"स्टूल किसलिए?"
"हमारे कारिंदों के लिए।"
"कारिंदो का क्लास में क्या काम?"
"एक हमारा हुक्का सुलगाएगा। दूसरा, टीचर के सवाल समझकर हमें समझाएगा। तीसरा, होमवर्क न करने पर हमारे एवज में मुर्गा बनेगा और चौथा रिज़र्व में पड़ा रहेगा।"
नवाब साहब का जवाब सुनकर प्रिंसिपल साहब बेहोश हो गए। उन्हें फिर से नूर मंज़िल में भर्ती करवा दिया गया। ताज़ा जानकारी मिलने तक स्कूल बंद था। जैसे ही कुछ नया पता लगेगा, आपको इत्तिला दी जाएगी।
- कमल किशोर सक्सेना
एक्शन रिप्ले
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वैधानिक चेतावनी : हमारी यह बकवास पढ़ने से पहले दो सौ ग्राम बादाम, सौ ग्राम पिस्ता, डेढ़ सौ ग्राम काजू और पाव भर देसी घी का सेवन कर लें। संभव हो तो अमिताभ बच्चन से पूछकर किसी चिल्ड तेल की सिर में मालिश भी करवा लें। कमज़ोर दिल और हाज़मे वाले न ही पढ़ें तो बेहतर। फिर भी ज़िद हो तो अपने रिस्क पर पढ़ें। आपके मन में ये स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि जिस चीज़ के पढ़ने के पहले इतनी गिज़ा ज़रूरी हो, उसे हमने क्या खाकर लिखा होगा। तो बताते चलें कि हम खाते-पीते, पहनते-ओढ़ते-बिछाते घर से हैं। इसलिए हमारी रूहानी, जिस्मानी, रूमानी क्षमताओं पर शक न करें।
अब आइए हमारी विशुद्ध मौलिक बकवास पर।
आपने प्रकाश का नाम तो सुना ही होगा। न न...हम प्रकाश झा, प्रकाश फर्नीचर, प्रकाश हेयर कटिंग सैलून या प्रकाश कुल्फी वाले की बात नहीं कर रहे। हम बात कर रहे हैं उस प्रकाश की, जो सूरज निकलने, एलईडी बल्ब जलाने या विज्ञान नामक विषय में पाया जाता है। इसकी गति होती है 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड। यानी बहुतै तेज़। दूसरा होता है प्रकाश वर्ष। ये प्रकाश का बाप नहीं बल्कि पड़ दादा के ऊपर कई पड़ दादा होता है। ये विज्ञान के साथ-साथ अंतरिक्ष से भी संबंध रखता है। ये दूरी नापने की इकाई है, जैसे गज-फ़िट या मीटर-किलोमीटर। यानी, दूरी नापने के जब सारे पैमाने ख़त्म हो जाते हैं, सस्ते-मद्दे कंप्यूटर-लैपटॉप भी टें बोल जाते हैं, तब दूरियों के पड़ दादा आज़म यानी प्रकाश वर्ष जन्म लेते हैं।
एक प्रकाश वर्ष अर्थात वो दूरी जो प्रकाश एक वर्ष में तय करता है। और, प्रकाश की गति आपको पता ही है तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड। अब एक प्रकाश वर्ष में वह कितनी दूर पहुंचेगा, ये हिसाब लगाने के लिए थोड़ा काजू-बादाम और चबा लें। फिर हमारी बात ध्यान से समझिए-हमारी पृथ्वी का सारा जीवन हर सेकंड लाइव चल रहा है। इसे अंतरिक्ष से बखूबी देखा जा सकता है कि हम इस वक्त क्या कर रहे हैं। अब थोड़ा पीछे यानी अतीत में चलिए। मान लीजिए दो वर्ष पीछे। तो दो वर्ष पहले हम जो कर चुके थे, उसकी किरणें या फ़िल्म अंतरिक्ष में उसी समय पहुंच गई होंगी। राइट। लेकिन अंतरिक्ष तो अनंत है। उसका न ओर है न छोर। इसलिए वे अतीत की किरणें अब भी कहीं यात्रा कर रही होंगी। हम किसी तकनीक की मदद से, उन किरणों यानी प्रकाश से भी बहुत तेज़ गति से चलकर यदि उन्हें पकड़ लें तो आज की तारीख में देख सकते हैं कि दो साल पहले हमने क्या किया था।
हो सकता है ये सारी बातें आपके सिर के ऊपर से प्रकाश की गति से भी तेज़ रफ़्तार से गुज़र रही हों तो आधा पाव चिलगोज़ा और खा लीजिए। और, दिल थाम कर सुनिए आगे की वो दास्तान, जो आपको हॉलीवुड की फिल्मों की याद दिला देगी।
अब आइए मुख्य बकवास पर।
उस विशेष तकनीक के ज़रिए हमारा इरादा पांच हज़ार प्रकाश वर्ष पहले से अपनी यात्रा शुरू करने का था। किंतु फिर ध्यान आया कि उसी समय महाभारत का युद्ध हुआ था। हालांकि मन में लालच भी था कि प्रभु श्रीकृष्ण के दर्शन करते चलें। लेकिन उससे ज़्यादा डर था कि प्रयोग के चक्कर में कहीं कौरवों या पांडवों में से किसी की तलवार के शिकार हो गए तो भविष्य में होने वाले हमारे बच्चे पैदा होने से पहले ही अनाथ हो जाएंगे। लिहाज़ा हमने अपना टारगेट सिकोड़ना शुरू किया। रास्ते में मौर्य, गुप्त और हर्षवर्धन वंश से लेकर सम्राट अशोक तक के युग पड़े किंतु यहां भी वही तीर, तलवार और भाले आदि के ख़तरे थे। इसलिए रुके नहीं। पीछे आते-आते पंद्रहवीं शताब्दी आ गई। वहां मुग़ल साम्राज्य की नींव खुदने जा रही थी। हम फ़ौरन से भी पहले वहां से निकल लिए। कौन बवाल में पड़े। हमें पता था कि आगे हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट शुरू हो जाएगा। वहां से हम इतनी तेज़ भागे कि ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश हुकूमत जैसे स्टेशनों पर भी नहीं रुके और हमारा ब्रेक सीधे आज़ाद और लोकतांत्रिक भारत में लगा। अब हम पैदा होने वाले थे।
पैदा होने के बाद जो पहली क्लिप आप लोगों से शेयर कर रहे हैं, उसमें हम स्कूल जाने लगे हैं। तीसरी कक्षा में हैं। लड़कियां भी साथ में पढ़ती हैं लेकिन तब हमें को-एजूकेशन का मतलब नहीं पता था। सिर्फ़ ये पता था कि क्लास के कुछ बच्चों के टिफ़िन में रोज़ मिठाई क्यों होती है और हमारे में वही परांठा-सब्ज़ी। अब हम छठे दर्जे में हैं। टीचर के हाथ का झन्नाटेदार झापड़ खाकर अभी-अभी स्कूल से लौटे हैं। दहाड़ें मारकर रो रहे हैं क्योंकि माता-पिता के अलावा किसी का यह पहला तमाचा था। आठवें दर्जे तक ये सोचकर खुश होते रहे कि नौंवी से केवल पांच विषय पढ़ने होंगे। पांच विषय यानी सिर्फ़ पांच किताबें। लेकिन बुरा हो लॉर्ड मैकाले का, जिनकी शिक्षा व्यवस्था में किताबों के ढेर में हम ऐसा दबे कि स्नातक करने के बाद ही सांस ले सके।
अब हमारी नौकरी एक अख़बार में लग चुकी है। हमारे संपादक के सिर पर बाल नहीं हैं। लोग कहते हैं कि वह बहुत विद्वान हैं। इस बात से प्रभावित होकर हम भी सैलून में जाकर गंजे हो जाते हैं। विद्वता का तो पता नहीं, हां सहकर्मी ज़रूर पूछ रहे हैं कि पिताजी कब मरे। जब ड्यूटी करके घर लौटे तो सिर में बालों के अंकुर फूट रहे थे। लेकिन पिताजी ने जूता लेकर वे भी साफ़ कर दिए। अब माताजी को अपने लिए एक कुलीन और सुशील बहू की ज़रूरत है। उसकी खोज में हमारे सारे रिश्तेदारों से लेकर पड़ोसी-परिचित तक सब लगे हैं। हम भी बाज़ार, दफ़्तर, सिनेमा आते-जाते रास्ते में दिखने वाली हर लड़की में संभावना खोज रहे हैं।
एक चेहरे में संभावना कुछ ज़्यादा नज़र आती है तो हम आगे बढ़ते हैं लेकिन ये क्या...! वह एक मुक्का हमारी पीठ पर जड़ती है। हम दर्द से कराह उठते हैं। मुंह से निकलता है, "बहन जी...हमारा अपराध क्या है? आपको बुरा लगा हो तो काजू-बादाम के पैसे ले लो। बच्चे की जान लोगी क्या...!" इसके साथ ही अचानक हमारी आंख खुल जाती है। सामने बेगम साक्षात चंडी का रूप धरे खड़ी हैं और धाराप्रवाह बोले जा रही हैं, "कल कितनी भांग खाकर आए थे...ये काजू, बादाम, चिलगोज़ा...प्रकाशवर्ष...सब क्या है? नींद में क्या-क्या बड़बड़ा रहे थे...कुछ होश है!"
अब हम वाकई होश में आ चुके थे।
- कमल किशोर सक्सेना
Saturday, July 9, 2022
मौत का फरमान
मौत का फ़रमान
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पहली बार हमें अपनी आंखों की काबिलियत पर शक़ हुआ। बचपन से हमें अपनी दोनों आंखों पर बहुत गुमान था। इसलिए नहीं कि वे आकार में बड़ी-बड़ी, बंटोला जैसी थीं। इसलिए भी नहीं कि कभी कहीं किसी से लड़ी नहीं, मतलब वर्जिन थीं। या, कि दोनों बराबर थीं, छोटी-बड़ी नहीं। वफ़ादार इतनी कि चश्मे की बैसाखी पकड़ने को तब तैयार हुईं, जब उन्हें एक-दूसरे को ही देखने में दिक्कत होने लगी। फिर इस कागज़ पर लिखी इबारत, जो हमारी आंखों को दिख रही थी, वह किसी और को क्यों नहीं दिखाई दे रही थी। और तो और, वो कागज़ भी किसी को नज़र नहीं आ रहा था। उस पर सिर्फ़ इतना लिखा था, "तुम्हारा समय पूरा हो चुका है। अब से ठीक 12 घंटे के बाद तुम्हारी दूसरे लोक की यात्रा शुरू होगी।"
ये हमारे लिए एक तरह से मौत का फ़रमान था, जो घर के बाहर वाले कमरे में दरवाज़े के पास पड़ा था। उसे शायद दहलीज़ के नीचे से किसी ने भीतर सरकाया था। पोस्टमैन की करतूत भी नहीं हो सकती क्योंकि पत्र किसी लिफाफे में नहीं था और उस पर डाकखाने की मुहर भी नहीं थी। वैसे भी आजकल ई-मेल और व्हाट्स एप के ज़माने में डाक से चिट्ठी कौन भेजता है। हैरत तो यह थी कि घर में वो चिट्ठी हमारे अलावा किसी ने नहीं देखी। जबकि, सुबह 6 बजे से वह दरवाज़ा कई बार खोला-बंद किया जा चुका था। सबसे पहले ग्वाला आया। नल का ताज़ा पानी दे गया। उसमें थोड़ा दूध भी था। फिर शास्त्र सम्मत अर्धांगिनी का दर्ज़ा प्राप्त महिला ने सब्ज़ी वाले से धनिया-मिर्चा लिया। नियमतः उसे साथ में सब्ज़ी भी देनी पड़ी। उसके बाद विधि सम्मत भाई ( ब्रदर इन लॉ ) मिठाई की दुकान से चाशनी ले आया। उसके साथ जलेबी भी प्राप्त हो गई। दोनों बेटे भी अपने दैनिक कार्यक्रम के निमित्त, जिम से अतिरिक्त कैलोरी जलाकर और उतने ही वज़न का पसीना शरीर पर लादकर, वापस आ चुके थे। किंतु इन सबकी टोटल चार जोड़ी आंखों में से एक की भी नज़र उस चिट्ठी पर नहीं पड़ी। हद तो यह थी कि हम हाथ में चिट्ठी लिए खड़े थे लेकिन फिर भी किसी को कुछ नहीं दिख रहा था।
उल्टे परिवार के लोग हमारा चेहरा देख रहे थे और इस बात पर एकमत होने का प्रयास कर रहे थे कि हमें सीधे नूर मंज़िल ( पागलखाना ) में भर्ती कराया जाए या पहले किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखा लिया जाए। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? इस चिट्ठी को किसी की धमकी मानें या वाकई ऊपर वाले का फरमान। धमकी, हमें कौन देता। एक वही शास्त्र सम्मत वाली थीं, लेकिन वह मौखिक देती थीं। बचा ऊपर वाला तो हमें जहां तक याद पड़ता था, हमारे खानदान में दूर-दूर तक किसी को कोई ऐसा फ़रमान नहीं मिला। सबने बिना किसी नोटिस के ही दुनिया छोड़ी। हमें ऐसी स्थिति में घबराने का भी अनुभव नहीं था, फिर भी हिम्मत जुटा कर घबरा लिए। अपनी उन्हीं दुलारी आंखों को, अब हमारी फ़ोटो पर माला पड़ी नज़र आने लगी।
परिवार के लोगों से बहस करना हमने रिटायरमेंट के पहले ही छोड़ दिया था। वे भी हमको अधिकांश मामलों में रिटायर मानकर चलते थे। हमने वह चिट्ठी जेब में डाली और तीन-तीन फिट की जुड़वां टांगों पर, शेष ढाई फीट का जिस्म लादे, लंबे-लंबे डग भरते हुए, बचपन के एकमात्र जीवित दोस्त के पास पहुंच गए। उसे लगातार ज़िंदा रहने का 66 वर्ष का अनुभव था। इत्तफ़ाक से वह उस दिन भी ज़िंदा मिल गया। हमने उसे संक्षेप में सारी दास्तान सुनाई। जिसे सुनने के लिए उसे अपने एक कान से रुई निकालनी पड़ी। दूसरा कान मैल से जाम था। सारी बात सुनकर उसने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और इस तरह गंभीरता से चिंतन करने लगा, जैसे देश की विदेश नीति में आमूल चूल परिवर्तन की दिशा में विचार कर रहा हो।
इस बीच उसके मुंह में मसाले की जुगाली चलती रही। करीब पांच मिनट बाद उसकी आंखों ने जीवित होने का अहसास दिलाया। साथ में मुंह की मांसपेशियों ने भी अपना जीवन प्रमाणपत्र पेश किया और माहौल के सन्नाटे को चीरते हुए जो दो शब्द हमारे कानों से टकराए, वे थे, "चिट्ठी दिखाओ।"
हमने जेब से चिट्ठी निकालकर उसके हाथ पर रख दी। मगर उसने हिकारत से वह हमें वापस करते हुए कहा, "यार सठियाये तो हम-तुम एक साथ थे। लेकिन लगता है तुमने कोई एक्स्ट्रा कोर्स भी कर लिया है। मैंने चिट्ठी मांगी और तुम रुमाल थमा रहे हो...वो भी नाक के आंसुओं में डूबा हुआ।"
उसकी बात से हम चौंके। इसका मतलब साफ़ था कि चिट्ठी उसे भी नहीं दिख रही थी। उधर वह अपनी भड़ास निकालने में लगा था। कह रहा था, "लखनऊ की गर्मी तुम्हारे दिमाग़ में चढ़ गई है। घर जाओ, आराम करो। दो सिल्ली बर्फ़ मैं भिजवा देता हूं...एक बिछा कर लेट जाना, दूसरी ओढ़ लेना।"
हमने अपने स्थाई कमीने दोस्त को खा जाने वाली नज़रों से देखा। लेकिन खाया नहीं क्योंकि उस दिन मंगलवार था और मंगल को हम नॉन वेज नहीं खाते। फिर हमने गूगल से ढूंढ-ढूंढकर चुनिंदा मौलिक लानतें उस पर भेजीं। इस बीच हम घबराहट की चरम सीमा के काफ़ी पास आ गए । डर था कि कहीं इसके बाद दूसरे लोक की सीमा न प्रारंभ हो जाए। ये विचार मन में आते ही वहां से रिवर्स गियर लगा कर भूतकाल हो गए।
इतनी देर में यह तो तय हो गया था कि उक्त चिट्ठी हमारे अलावा किसी को नहीं दिख रही है। हमने तसल्ली के लिए उस चिट्ठी को फिर अपनी आंखों के आगे कई एंगल से नचाया। वह कत्थक, भरत नाट्यम, कत्थकली, कुचीपुड़ी, मोहिनीअट्टम आदि विधाओं में खूब नाची। मगर हर स्टेप के साथ हमें संदेश देना नहीं भूली कि हमारे पास सिर्फ़ 12 घंटे का समय शेष है। चिट्ठी पर यह तहरीर पढ़ते ही हम पर घबराने का दूसरा दौरा पड़ा क्योंकि इस बीच एक घंटा हम बर्बाद कर चुके थे। अब सिर्फ़ 11 घंटे का समय बाक़ी था। उसके बाद....! उसके बाद हमारे नाम के आगे 'स्वर्गीय' लग जाएगा।
"और कहीं मरने के बाद नरक मिला तो?" दिल ने दिमाग़ के आगे शंका रखी।
"तो भी यहां किसको पता चलेगा...लिखा तो फिर भी स्वर्गीय ही जाएगा। आज तक किसी के नाम के पहले नारकीय लिखा देखा है!"
दिमाग़ की दलीलों के आगे दिल ने घुटने टेक दिए। जो होगा देखा जाएगा। हमने 'स्वर्ग' या 'नरक' के झगड़े में न पड़कर अपने बाक़ी बचे एक-एक मिनट का सदुपयोग करने का फ़ैसला किया। समय कम था और कामों की फेहरिस्त लंबी। हमने हिसाब लगाना शुरू किया। तमाम काम अधूरे पड़े थे। कुछ शुरू ही नहीं हुए थे। बचे हुए 11 घंटे में से एक घंटा यह सोचने में ही निकल गया कि हम कौन सा काम करें और कौन सा छोड़ें। फिर ये भी खयाल आया कि कहीं मरने के बाद भूत न बन जाएं। सुना था कि जिनके काम या हसरतें अधूरी रह जाती हैं, वे भूत बनकर मारे-मारे फिरते हैं।
इस विचार के उठते ही हम डर से कांपने लगे। फ़ौरन हनुमान चालीसा पढ़नी शुरू कर दी। डर कुछ कम हुआ तो हिम्मत बढ़ी। हनुमान चालीसा वाला नुस्खा तो कारगर था। लेकिन ये गारंटी नहीं थी कि मृत्योपरांत पढ़ने की परमिशन होगी...क्योंकि आज तक किसी भूत या आत्मा द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ का ज़िक्र नहीं सुना। यही पता था कि उसे सुनकर भूत-प्रेत भाग जाते हैं। अजीब कश्मकश थी। हमें मरने का कोई तजुर्बा भी नहीं था और न कोई भूत-प्रेत हमारी फ्रेंड लिस्ट में था, जो शंका समाधान करता। हम पर तीसरा दौरा पड़ा। गनीमत रही कि दौरा घबराहट का था, दिल का नहीं...वरना डेडलाइन से पहले ही इस जहां से डेबिट होकर उस जहां में क्रेडिट हो चुके होते।
अब 8 घंटे बचे थे हमारे पास। वैसे तो 8 घंटे बहुत होते हैं। नौकरी में एक शिफ्ट की ड्यूटी ख़त्म हो जाती है लेकिन जब ज़िंदगी की शिफ्ट का सवाल हो तो बहुत कम मालूम पड़ते हैं। हमें लगा अगर अधूरे काम निपटाने लगे तो बचा हुआ सारा समय उसी में ख़त्म हो जाएगा और काम शायद फिर भी न निपटें। यह विचार आते ही हमने अधूरे कामों को गोली मारने की सोची। लेकिन अचानक खयाल आया कि यह तो हिंसा हो जाएगी और आख़िरी समय में हिंसा ठीक नहीं। यह सोच अधूरे कामों को भाड़ में जाने का रास्ता दिखा दिया, जो पुराने लखनऊ की तरफ़ जाता था।
अब दिल ने कहा कि चलते-चलते कुछ नेक काम कर लो। सुना है आख़िरी वक्त में की गई नेकी, पूरे जीवन की बदी पर भारी पड़ती है। यह विचार कर हम बैट्री रिक्शा में बैठकर गोमती के पास आ गए। आख़िर नेकी करने के बाद उसे दरिया में भी तो डालना होता है। दरिया की दशा बहुत ख़राब थी। उसमें प्लास्टिक, कचरे, मल-मूत्र के रूप में शहर वालों की नेकियां पहले से पटी पड़ी थीं। हम सोच में पड़ गए कि नेकी लाकर डालेंगे कहां। यहां तो जगह ही नहीं है।
इतनी देर में दो घंटे और कम हो गए। तभी दो सिपाही अपनी तरफ़ आते दिखे। हम आख़िरी समय में पुलिस की सूरत देखने से बचना चाहते थे लेकिन तब तक वे पास आ गए। एक डंडा फटकारता हुआ बोला, "हौ हौ...चचा यहां क्या कर रहे हो?"
"कुछ नहीं...बस ऐसे ही...नदी देखने आए थे।" हमने जवाब दिया।
"काहे... इत्ती उमर हो गई...कभी नदी नहीं देखी!" दूसरे सिपाही ने हमें घूरते हुए कहा। उसके हाथ का डंडा भी अंगड़ाई लेने लगा।
"हम सच कह रहे हैं...नदी ही देखने आए थे...देखिए कितनी गंदगी है।"
"हमें तो लगतो है... ई ससुर गंदगी बढ़ाने आये हैं। चचा तुम्हारा डिब्बा कहां है?"
"कैसा डिब्बा?" हमने घबराकर पूछा।
"सरकार सफ़ाई कराए-कराए परेशान है...स्वच्छ भारत मिशन चलाए है...घर-घर शौचालय बनवा रही है...और तुम साले ससुर के नाती चले आए गंदगी करने"।
एक सिपाही ज़मीन पर डंडा पटककर चिल्लाया तो दूसरा उसका साथ देते हुए बोला, "ले चलो साले को थाने...वहां इसे नदी नहीं समंदर दिखाएंगे।"
हम डर से थर-थर कांपने लगे। लगा शायद यमदूत पुलिस की वर्दी पहनकर हमें लेने आ गए। सिपाही हमें थाने ले जाने पर अड़े थे। उनके चंगुल से छूटना ज़रूरी था। अचानक हमें अपनी जेब में पड़ी उस चिट्ठी का ध्यान आया। हमने उसे निकालकर एक सिपाही के हाथ में रख दिया। उसने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा, "ख़ाली सौ का नोट। चचा कुछ तो लिहाज करो...हम दो लोग हैं...बस 50-50...इतना रेट मत गिराओ।"
अब चौंकने की हमारी बारी थी। मतलब वह चिट्ठी इन्हें सौ का नोट दिख रही है। खैर, इसके बाद वो नोट लेकर दोनों चले गए। हमने इत्मीनान की सांस ली। एक नेक काम तो संपन्न हुआ। घड़ी की सुइयां तेज़ी से भाग रही थीं। हमने सोचा एकाध नेक काम अपने परिवार वालों के लिए भी करते चलें। उन्हें अंजाम देने हम दूसरा टेंपो पकड़कर बैकुंठ धाम आ गए। वहां बड़ी भीड़ थी। चारों तरफ़ मुर्दे ही मुर्दे। हमें लगा यहां तो फुंकने में ही घंटों लग जाएंगे। कहो पुनर्जन्म हो जाए और लाश का नंबर न आए। बेटे और रिश्तेदार अलग कोसेंगे कि बुड्ढा कौन सी मनहूस घड़ी में मरा। ये विचार कर हमने अपने लिए सात मन लकड़ी फटाफट तुलवा कर किनारे रखवा दी और दुकानदार से कह दिया कि शाम को जब हम अर्थी पर आएं तो लड़कों को सप्रेम भेंट कर देना। अच्छा इंप्रेशन पड़ेगा।
लकड़ी वाला क्या सोच रहा होगा, इसकी परवाह किए बिना हम लपककर डेथ सर्टिफिकेट बनवाने जन्म-मृत्यु कार्यालय में घुस गए। वहां कर्मचारी बिना शव देखे सर्टिफिकेट बनाने को तैयार नहीं था। उसे पांच सौ रुपए घूस देकर बड़ी मुश्किल से यकीन दिलवा पाए कि हम ही हैं 'भावी स्वर्गीय!'
ये सब काम निपटाने में अंतिम समय करीब आ गया। आधा घंटा बचा तो हम ओला करके जल्दी से घर आ गए। किसी ने हम पर ध्यान नहीं दिया। हम ड्राइंग रूम में जमीन पर चादर बिछाकर लेट गए। सिरहाने गीता-रामायण रख ली। एक कंडा और दो अगरबत्ती भी जलाकर रख दीं। कोरम पूरा हो गया। अब सिर्फ़ हमें प्राण त्यागने थे। मगर असमंजस इस बात को लेकर था कि प्राण ख़ुद त्यागने होंगे या यमदूतों का इंतज़ार करना होगा। हमने इंतज़ार करने का निश्चय किया और आंखें बंद करके, मुंह में गोमती से लाया गंगाजल डालकर, 'राम नाम सत्य है' का जाप करने लगे। तभी यमदूत ने बुरी तरह झिंझोड़ा। आंखें खोलीं तो वही शास्त्र सम्मत अर्धांगिनी का दर्ज़ा प्राप्त खड़ी थीं। साथ-साथ चिल्ला भी रही थीं, "देखो अपने बाप की करतूत...पलंग के नीचे लेटे पता नहीं क्या-क्या बक रहे हैं। लाख कहा कि रात में गरिष्ठ खाना मत खाओ...लेकिन नहीं, करेंगे अपने मन की। कैसे-कैसे, उल्टे-सीधे सपने देखते हैं। अब तो इन्हें नूर मंज़िल जाकर जमा कर ही आओ।"
हम हतप्रभ से इधर उधर ताकने लगे। उधर बड़ा बेटा मोबाइल से नूर मंज़िल का नंबर डायल कर रहा था।
- कमल किशोर सक्सेना
Monday, May 9, 2022
एक छोटी सी लव स्टोरी
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मैं एक भूत हूं। भूत, भविष्य, वर्तमान वाला नहीं... मरने के बाद वाला। मरने के पहले जब मैं ज़िंदा था तो बाकायदा पैंसठ किलो का शरीर रखता था। उस शरीर में करीब 150 ग्राम का दिल। दिल में जान के अलावा तमाम अरमान, सुख - चैन और तमन्नाएं भी बसती थीं। एकदम हाउसफुल था। ऐसी खचाखच स्थिति में वह मेरे पड़ोस में रहने आ गई। उसे देखते ही पहला काम ये हुआ कि मेरे दिल से जान निकलकर उसमें ट्रांसफ़र हो गई, सुख - चैन बग़ावत कर बैठे, अरमानों की सुनामी आ गई। ये मेरा पहला प्यार था। तब मैं हाई स्कूल में पढ़ता था और वह आठवीं में। हम दोनों की शिक्षा भी नाबालिग थी और हम भी।
छह महीने मैं उसे बस देखता ही रहा। तब मुझे समझ में आया कि वह कहीं और देखती है। उसका कहीं और देखना आंखों के दोष के कारण नहीं, बल्कि इस कारण था कि उसकी दृष्टि, मुझे पारकर सामने रहने वाले एक और लड़के पर ठहरती थी। मेरी इकतरफ़ा प्रेम कहानी में पहली बार विलेन की एंट्री हुई। दिल ने भी पहली बार ईर्ष्या की भावना महसूस की। नतीजा, अगले दिन मैंने उस विलेन को बिना किसी कारण के पीट दिया। वह विज्ञान का विद्यार्थी था। उसने न्यूटन का तीसरा नियम पढ़ा था, अतः उसने प्रतिक्रिया में मुझे पीट दिया। उस ज़माने में मेरे आत्मसम्मान का जन्म नहीं हुआ था, फिर भी उसे ठेस लग गई।
उन्हीं दिनों मैंने कहीं पढ़ लिया कि मोहब्बत और जंग में सब जायज़ होता है। यहां मोहब्बत ( भले इकतरफ़ा ) भी थी और जंग भी, अतः मैं कुछ जायज़ करने का मौक़ा ढूंढने लगा। कहते हैं कि सच्चे इश्क़ में तमाम मुश्किलें आती हैं... इसलिए यहां भी आईं। मैं कुछ करने का मौक़ा ही ढूंढता रह गया और उसके पापा ने दूसरे मोहल्ले में मकान ढूंढ लिया। लेकिन, सच्चे आशिक़ की तरह मैंने हार नहीं मानी और अपने इश्क़ की गुमटी उसके स्कूल के बाहर डाल ली। रोज़ अपने स्कूल की जगह मैं उसके विद्यालय में हाज़िरी देने लगा। इस चक्कर में मेरी अटेंडेंस शॉर्ट हो गई और परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया। मुझे परीक्षा न दे पाने से ज़्यादा दुख इस बात का था कि उसने अब तक एक बार भी मेरी ओर नज़र उठाकर देखा नहीं था। अपने घुटने की यादगार चोट के अलावा, अब मैंने इश्क़ की चोट भी महसूस की।
उन दिनों इश्क़ में चोट खाए लोग गांजा, चरस, शराब आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन करते थे, जिससे उनमें बड़े से बड़ा सदमा सहने की हिम्मत बनी रहती थी। अतः मैंने बिना समय गंवाए मोहल्ले की ' नशा भक्षण समिति ' की सदस्यता ग्रहण कर ली। वह समिति वास्तव में घायल और टूटे दिल वालों का नर्सिंग होम थी। कुछ सदस्य इश्क़ में पागल होकर समिति की शरण में आए थे, उनके लिए अलग विभाग था। कुछ आई सी यू में थे। समिति के अध्यक्ष को ख़ुद कई जगह से ठुकराए जाने का लंबा तजुर्बा हासिल था, इसलिए वह ड्रग्स लेते थे। मेरा केस अभी गंभीर नहीं हुआ था, लिहाज़ा मुझे दारू के तीन पैग का हल्का डोज़ देने के बाद लेटर - ओ - थेरोपी ( लव लेटर लिखने ) की सलाह दी गई। मैं देवदास पर नवीं बार फ़िल्म नहीं बनवाना चाहता था, अतः इस थेरोपी के लिए राज़ी हो गया।
मेरे अंदर लिखने - पढ़ने का इतना ही सलीका होता तो हाई स्कूल न पास कर लेता। लेटर लिखवाने के लिए मुझे दूसरे मोहल्ले के एक ' प्रेम पत्र विशेषज्ञ ' की सेवाएं लेनी पड़ीं क्योंकि अपने मोहल्ले में सब मेरे जैसे थे। उनके लिए भैंस और काले अक्षर में कोई भेद न था... गनीमत सिर्फ़ इतनी थी कि उन्होंने कभी काले अक्षर से दूध दुहने की कोशिश नहीं की। उन प्रेम पत्र विशेषज्ञ के पास इतना काम था कि अगले छह महीने तक समय नहीं था। ऐसा लग रहा था, जैसे उस दौर का हर व्यक्ति बस प्रेम करने का ही काम करता था, बाक़ी काम अमेरिका आदि देशों की मदद से होते थे। ख़ैर, छह महीने बाद अपने हिस्से का प्रेम पत्र लिखवाने के बाद जब मैं उसे देने गया तो पता चला कि वह स्कूल ही नहीं, शहर भी छोड़ गई।
इस झटके के बाद क़ायदे से मुझे संपूर्ण रूप से टूट जाना चाहिए था लेकिन ख़ाली मेरा दिल टूटा, जिसे मैंने फेविकोल से चिपकाकर काम चलाने लायक बना लिया। पत्र लिखवाने की फ़ीस तो बेकार गई ही, साथ ही उसे पाने की आख़िरी उम्मीद भी टूट गई। अब मेरे सामने दो रास्ते थे... आत्महत्या कर लूं या किसी का अपहरण कर उससे प्रेम करूं। लेकिन, प्रेम में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता, ये सोच मैं जेब में पत्र डालकर, उसे देने योग्य चेहरे की खोज में जुट गया। समय बीतता गया। तब तक मैं हाई स्कूल में पांच बार फेल होकर मोहल्ले में नया रिकॉर्ड बना चुका था। इस बीच एक से नज़रें मिलीं भी, वह भी हाई स्कूल में तीन बार फेल हो चुकी थी। लेकिन उसे भी पत्र देने की नौबत नहीं आई क्योंकि वह और किसी सीनियर फेलियर की तलाश में थी।
इसके बाद उक्त प्रेम पत्र देने के लिए मैंने तीन प्रयास और किए। पहला प्रयास राशन की लाइन में किया। वह महिलाओं की लाइन में पीछे लगी थी। उसका साथ पाने को मैं अपनी लाइन में आगे से पीछे आ गया। लेकिन, मेरे आगे से हटते ही उसने अपने भाई को मेरे स्थान पर लगा दिया और ख़ुद घर चली गई। चिट्ठी जेब में ही पड़ी रह गई। दूसरी कोशिश तब की, जब घरवालों को पूरा विश्वास हो गया कि मैं इस जन्म में हाई स्कूल पास नहीं कर सकता। अंततः इसी क्लास में लगातार सात बार फेल होने के बाद पढ़ाई ने मुझे छोड़ दिया। तब पड़ोस के घर में बर्तन मांजने वाली को मैंने उक्त पत्र देने की कोशिश की। उसने अपने पति से शिकायत कर दी और मैं अपनी टांगों से हाथ धोते - धोते बचा। केवल पैर तुड़वाने के एग्रीमेंट के बाद मैंने प्रेम के पत्राचार पाठ्यक्रम से तौबा कर ली। पत्र को बक्से में रखकर मैं लगभग भूल गया।
तीन महीने बाद मैं फिर अपने पैरों पर खड़ा हो गया। इस बीच, साथ के सभी यार - दोस्त, विवाह और बच्चों को प्राप्त हो चुके थे। शुभचिंतकों ने सलाह दी कि शादी कर लो, प्रेम उसके बाद भी किया जा सकता है। मैं तैयार हो गया किंतु शहर में अब कोई शरीफ़ परिवार मुझे अपना दामाद बनाने को तैयार न था। थक - हारकर मैंने एक भूतपूर्व गुंडे की बेटी का उद्धार करने की सोची। ये मेरा तीसरा और अंतिम प्रयास था। गुंडे की बेटी भी गुंडी थी। मुझसे पहले वह दो लोगों का उनके जीवन से उद्धार कर चुकी थी, ये बात मुझे मालूम न थी। ख़ैर, गाजे - बाजे के साथ मैं उसकी मांग का नया सिंदूर बन गया।
अब मैं अधिकृत तौर पर उससे प्रेम कर सकता था। मैं कोई शुरुआत करता, उसके पहले ही बक्से में रखा वह ऐतिहासिक प्रेम पत्र उसके हाथ लग गया और उसने मुझे इतिहास बनाने में ज़रा भी देर नहीं की। इतिहास में दाखिल होते ही मुझे जो नया आशियाना मिला, वह एक बरगद का पेड़ था। इस पर कुछ सीनियर भूत पहले से रहते थे। इसके ठीक सामने एक पीपल का पेड़ था, जिसे ' चुड़ैल हॉस्टल ' के नाम से जाना जाता था। उस हॉस्टल पर नज़र पड़ते ही मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। ज़िंदा होता तो चीख पड़ता। वहां मेरा पहला प्यार अर्थात हाई स्कूल वाली पड़ोसन हाथों में शमा लिए ' कहीं दीप जले कहीं दिल ' गा रही थी। अब वो मुकम्मल और हसीन चुड़ैल बन चुकी थी।
उसे देख मेरा भूत ख़ुशी से पागल होते - होते बचा। लेकिन, ये ख़ुशी बहुत देर न ठहर सकी... अभी मैं अपनी महबूबा का ठीक से दीदार भी न कर पाया था कि उस हॉस्टल में एक नई चुड़ैल ने एंट्री ली। वो चुड़ैल बनने से पहले भी चुड़ैल थी अर्थात मेरी पत्नी थी। पूरी ज़िंदगी जिस लव स्टोरी को पूरा करने का मैं सपना देखता रहा, वह फिर अधूरी रह गई थी। अंत में कहानी सिर्फ़ इतनी है कि मेरी बीवी यानी गुंडे की बेटी ने ख़ुद को बेवा बनाने के बाद अंगूर की बेटी का इतना सेवन किया कि टें बोल गई। और, अब स्थाई रूप से मेरी छाती पर, जो अब नहीं थी, मूंग दलने आ गई। कौन कहता है कि मरने के बाद दो दिल मिल जाते हैं।
- कमल किशोर सक्सेना
जब मोहल्ले में बुल्डोजर आया
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बात इतनी सी नहीं थी। कई क्विंटल की थी। रात तक सब ठीक था। मोहल्ले के लोग अपनी दिनचर्या पूरी करके जब सोने गए तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन सुबह आंख खुली तो चौराहे पर एक बुल्डोज़र खड़ा देखा। उसे देखते ही सब चौंक पड़े। बुल्डोज़र दिखना अच्छा संकेत नहीं था। ये काली बिल्ली के रास्ता काटने या ज़रूरी काम से निकलते समय छींक देने से भी बड़ा अपशकुन था। बुल्डोज़र का मतलब यमदूत का मशीनी संस्करण। किसी वैध अपराधी या अवैध इमारत का एनकाउंटर।
देखते ही देखते मोहल्ले वालों में कानाफूसी शुरू हो गई।
"किसके कर्मों का फल है ये, जो हमारा चैन उड़ाने आया है?"
"कल्लू कबाड़ी को दरोगा जी कई बार चोरी-चकारी छोड़ देने की वार्निंग दे चुके थे... आख़िर आ गई न शामत।"
"खड़े-खड़े लफ्फाज़ी करने से कुछ न होगा...सोचो इस मुसीबत से कैसे बचा जाए।"
"चीते की चाल, बाज़ की नज़र और बाजीराव की तलवार से बचना आसान है मगर बाबा के बुल्डोज़र से नहीं। तरकस से तीर निकल चुका है...अब लक्ष्य भेदकर ही लौटेगा।"
जितने मुंह थे, उतनी बातें। पांच मिनट के बाद एक गली से लुंगी-बनियान पहने ढाई सौ का इनामी बाबू बजरंगी निकला। उसके हाथ में एक तख्ती थी, जिस पर लिखा था-'दुहाई हो...जान की दुहाई हो... मैं सरेंडर कर रहा हूं...मेरा एनकाउंटर न किया जाए।' बाबू को देखकर सबके मुंह से सिसकारी निकल गई। अभी इस बदनसीब की उमर ही क्या है। जुर्म की दुनिया में आए एक साल भी तो नहीं हुआ। बेचारा न कुछ कमा पाया...न बचा पाया। बेचारे का कैरियर बनने के पहले ही उजड़ रहा है। भगवान ऐसा अपराधी किसी को न बनाए।
लेकिन बाबू पर इन सारी संवेदनाओं का कोई असर नहीं हुआ। वह अपनी मंज़िल अर्थात मोहल्ले की पुलिस चौकी की ओर बढ़ता ही गया। चौकी में एकमात्र सिपाही मौजूद था। उसने बाबू का सरेंडर नामा स्वीकार करने से मना कर दिया। कहा कि ये अधिकार दरोगा जी का है। चूंकि उन्होंने भी सवेरे-सवेरे बुल्डोज़र के दर्शन कर लिए हैं। अतः वह भी सरेंडर करने इंस्पेक्टर साहब के पास गए हैं। सुना है इंस्पेक्टर साहब के घर के बाहर भी बुल्डोज़र देखा गया है। इसलिए कोई ठिकाना नहीं कि वह भी एसपी साहब के यहां गए हों।
बेचारा बाबू अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाता हुआ अब पुलिस चौकी के बाहर अनशन कर रहा है। इस बीच बुल्डोज़र के संक्रमण से जो अन्य प्रभाव पड़े, वे इस प्रकार हैं- दूध में पानी मिलाने वाले पुत्तन घोसी ने प्रायश्चित स्वरूप अपने ग्राहकों को घी और मक्खन देने का निर्णय ले लिया। मोहल्ले के डॉक्टर झटका के नर्सिंग होम में भी डिस्काउंट लागू कर दिया गया। पैर की हड्डी टूटने पर हाथ का प्लास्टर मुफ़्त। इलाज के दौरान मौत हो जाने पर एंबुलेंस के साथ कफ़न सहित अंतिम संस्कार सामग्री मुफ़्त। सिर्फ़ यही नहीं, बुल्डोज़र की कृपा से मोहल्ले के खुले मैनहोलों में ढक्कन लग गए। स्ट्रीट लाइट के खराब बल्ब बदल गए। बिजली चोरी करने वालों ने खंभे से अपनी-अपनी कंटिया उतार ली।
मोहल्ले में टीवी के न्यूज़ चैनलों या ओटीटी पर गूंजती वेब सिरीज़ की आवाज़ों की जगह चैन की बंसी बजती सुनाई देने लगी। लड़कों ने नशा न करने की सामूहिक प्रतिज्ञा कर डाली। लड़कियां और महिलाएं बिना छिड़े स्कूल-कॉलेज और मार्केट जाने लगीं। फेरी वाले बिना डंडी मारे सब्ज़ी और फल तोलने लगे। काली कमाई करने वाले व्यापारी ख़ुद अपने बही-खाते जीएसटी कार्यालय में जाकर जमा कर आए। और तो और, जानवरों में भी तमाम सुधार देखे गए। कुत्ते अनुशासित हो गए। उन्होंने टाइम टेबल बना लिया। हफ्ते के पहले तीन दिन भौंकते और बाद के तीन दिन काटते। इतवार को छुट्टी मनाते। आवारा गायों ने भी यातायात नियमों का पालन शुरू कर दिया और चौराहे या सड़क के बीच बैठना छोड़ दिया।
तीन दिन बाद। अचानक एक आदमी आया। बुल्डोज़र पर बैठा। उसे स्टार्ट किया और लेकर जाने लगा। मोहल्ले वाले हैरत में। उससे पूछा तो जवाब मिला, "यहां का काम ख़त्म हो गया। अब इसे दूसरे मोहल्ले में रखने जा रहा हूं।"
- कमल किशोर सक्सेना
Wednesday, April 7, 2021
दारू पदावली (सरलार्थ) ------------------
नोट : इस पदावली में मूल पद ना देकर केवल उनका भावार्थ दिया जा रहा है। इन्हें पढ़कर पाठकगण मूल पदों का स्वयं अंदाज़ लगा लें।
(1)
कवि कहता है - दारू की दुकानें खुल गई हैं। ये देखकर पियक्कड़ जन उसी प्रकार आनंदित हैं, जैसे कोई टुच्चा चार जगह से जुड़ा नोट चलाकर होता है। जैसे टीचर की नानी मरने के कारण अचानक स्कूल में छुट्टी हो जाने से होमवर्क ना करने वाला बच्चा होता है। जैसे चौराहे पर मुर्गा बना सीनियर लाकडाउन तोड़क जूनियर को मुर्गत्व प्राप्त होता देखकर होता है।
(2)
डेढ़ माह की जुदाई के बाद मयखानों का घूंघट उठा है। अरमानों की बारात लिए दारूबाज लाइन में खड़े हैं। उन्हें ना आंधी डिगा पा रही है और ना बेमौसम बरसात। सच्चे सुरा प्रेमियों की यही पहचान है। उन्हें गर्व भी है कि मुसीबत से भरे इस कोरोना काल में उन्हें डूबती अर्थव्यवस्था को उबारने लायक समझा गया। ऐसे देशभक्तों की जितनी भी सराहना की जाए, कम है। ऐसे देश रत्नों को सुराश्री, सुराभूषण और सुरा रत्न जैसे पुरस्कारों से नवाजा जाना चाहिए।
(3)
एक ब्योड़ा दूसरे ब्योडे से कहता है - भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं। आखिर हमारी डेढ़ महीने की तपस्या रंग ले ही आई... मयखाना खुला। सच्चे मन से किया गया पुरुषार्थ व्यर्थ नहीं जाता। क्वार्टर, अद्धे, बोतल या पाउच की शक्ल में वापस आता है। इसलिए हे सुरापति! अपने तप की शक्ति पहचान। एक सांस में पूरा अध्धा खींचने के बाद साथी मयवीर जवाब देता है - तेरी मां का टना ... कहां है कोरोना। कैसा है कोरोना। जरा सामने तो आ ना।
(4)
कवि अपना चौथा पैग बनाते हुए आगे कहता है - नाली में पड़ा ...कीचड़ से सराबोर दारूबाज श्वान से भी श्रेष्ठ होता है क्योंकि श्वान सुरा से रीता होता है। दारूबाज सड़क पर भी गिरता है तो घोड़े पर सवार होकर। ऐसे नशा शिरोमणि के आगे संसार के सारे वाहन नतमस्तक हैं। वे अभिनंदनीय हैं...प्रशंसनीय हैं...अनुकरणीय है। नशे में टुन्न दारूबाज के सुख की कल्पना कोई नहीं कर सकता। ये संसार का सर्वोत्तम सुख है।
(5)
एक सखी दूसरी सखी से कहती है - हमारे परमेश्वर अच्छा भला झाडू - पोंछा कर रहे थे ... डांट डपट भी सुनने की आदत डाल लिये थे। मगर ठेका खुल गया। सरकार बेवफा निकली। खुद स्त्रीलिंग होकर भी महिलाओं का साथ ना दिया। दूसरी सखी मुंह से आग की लपटें निकालकर जवाब देती है - सच कहा तुमने लेकिन अगर मेरे सांवरिया ने अब पुराने तेवर दिखाए तो कसम लाकडाउन की... चौराहे के पुलिस वाले के हवाले कर दूंगी और कह दूंगी कि मुआ बहुत खांसता है ... ले जाओ अस्पताल। डाल दो चार - छह साल के क्वारांटिंन में।
कमल किशोर सक्सेना
Tuesday, April 6, 2021
हैप्पी बर्थडे टू मी
4 अप्रैल 1956, शाम 6 बजकर 60 मिनट और पता नहीं कितने सेकंड। राउंड फिगर में करीब 7 बजे का समय। ना आसमान में बिजली कौंधी, ना कोई आकाशवाणी हुई, ना बिल्ली हंसी - ना कुत्ता रोया लेकिन हम पैदा हो गए। अच्छा हुआ महान भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने हमारे पैदा ना होने की भविष्यवाणी नहीं की थी, वरना कई अन्य की तरह वह भी ग़लत साबित हो जाती। हमारा पैदा होना कोई आश्चर्य ना था...आश्चर्य तो तब होता जब हम मंगल या शनि पर पैदा हुए होते। ख़ैर, जब हम पैदा हुए तो बेहद कमज़ोर, बल्कि कहना चाहिए कमज़ोरेस्ट थे। हमारे बचने की किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। हालांकि, डॉक्टरों ने जवाब नहीं दिया था किंतु उनसे किसी ने सवाल भी नहीं किया था।
मगर हम ना सिर्फ ज़िंदा रहे बल्कि लगातार ज़िंदा बने रहे। इतने सालों में हमने ज़िंदगी के साथ एक मिनट का भी नागा नहीं किया। ख़ैर, पैदाइश के समय हमारा वज़न इतना कम था कि हमें और सोने को एक ही बांट से तौला जा सकता था। हम साधारण आंखों से नहीं दिखते थे। कहते हैं पूत के पांव पालने में नज़र आ जाते हैं लेकिन हमारे माइक्रोस्कोप में नज़र आए। पहले सबने सोचा कि शायद केवल आत्मा की डिलीवरी हुई है। लेकिन जब डॉक्टरों ने बताया कि टोटल पंचतत्व यही हैं, तब हमारे पिता जी के पिता जी को विश्वास हुआ कि वह बाबा बन गए हैं। उन्होंने इस खुशी में मोहल्ले में बूंदी के दाने बांटे। पूरा लड्डू इसलिए नहीं दिया गया ताकि ख़ुशी और उसके कारण का संतुलन बना रहे।
हमारा जन्म कानपुर के उर्सला अस्पताल में हुआ था। आज़ादी से पहले अस्पताल अंग्रेज़ों का था लेकिन अब सरकार का। मगर वहां पैदा होने वाले बच्चे सरकारी नहीं कहलाते थे। उस समय के सरकारी अस्पताल स्वस्थ हुआ करते थे। बच्चा बदलने की कला उस दौर में विकसित नहीं हो पाई थी। अस्पताल में डॉक्टर और दवाएं, दोनों का भरपूर स्टॉक रहता था। कोई भी वहां इस विश्वास के साथ इलाज करा सकता था कि उसका हाथ टूटा है तो प्लास्टर हाथ में ही लगेगा, पैर में नहीं। ऑपरेशन की कैंची ट्रे में ही रखी जाती थी, मरीज़ के पेट में नहीं। ऐसे सतयुगी वातावरण में जब हमारे जैसा अमानक ( मानकों के विपरीत ) बच्चा पैदा हुआ तो कुछ लोगों ने इसे भ्रष्टाचार की शुरुआत कहा।
देश में भ्रष्टाचार और अपने आंगन में हम, दोनों तेज़ी से बढ़ने लगे। कुछ समय बाद भ्रष्टाचार की सेहत तो ठीक हो गई लेकिन हमारी डेढ़ पसलियां पौने दो ना हो पाईं। हमारी मां ने मालिश, खिलाई - पिलाई, दवा - दुआ, मंदिर, फ़कीर, आदि सारे जतन कर डाले मगर हमारी खाल और हड्डियों के बीच मांस नहीं उगा तो नहीं उगा। घर पर जो भी परिचित, नाते - रिश्तेदार आता, हमारे लिए कोई दवा या इलाज तजवीज़ कर जाता। मां - पिता जी किसी से मिलने जाते तो भी बातचीत का विषय हमारी सेहत, जो नहीं थी, ही रहता। हम सेहत बनाने की प्रयोगशाला बनकर रह गए थे। अच्छा हुआ कि किसी रसूख वाले के यहां नहीं जन्मे वरना तत्कालीन भारत में हमारी दुर्बलता भी राष्ट्रीय समस्या होती।
कहते हैं मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। हम केवल दुर्बलता में ही चैंपियन नहीं थे, रंग के मामले में भी उल्टे तवे से थोड़े ही उन्नीस थे। ' कोढ़ में खाज ' वाली कहावत के ' लिविंग लीजेंड ' बन गए हम। यही वजह थी कि नज़र से बचाने वाला काला टीका हमें नहीं लगाया जाता था, बल्कि जहां नज़र लगने का अंदेशा होता था, वहां हमें लगा दिया जाता था। उस समय गोरा बनाने के इतने क्रीम, लोशन आदि सौंदर्य प्रसाधन नहीं आते थे और ना ब्यूटी पार्लर होते थे। अपना रूप निखारने के लिए आदमी ले - देकर साबुन की बट्टी पर ही निर्भर करता था। उसमें भी ' लक्स ' फिल्म अभिनेत्रियों के लिए आरक्षित था और ' लाइफ ब्वॉय ' बड़े घर के कुत्तों के लिए। हमारे जैसे मीडियम क्लास लोग ' हमाम ' टाइप साबुन पर आश्रित रहते थे।
हम उसी से नहाते रहे। सुबह - शाम नहाते रहे। दस साल तक नहाते रहे। तब जाकर भ्रम टूटा कि साबुन लगाने से कोई गोरा नहीं होता। इसके बाद हमारा दुनिया के सारे साबुनों से विश्वास उठ गया। सिद्धांतत: हमें आजीवन साबुन का प्रयोग ना करने की शपथ ले लेनी चाहिए थी किंतु इसमें एक खतरा था कि अंधेरे में जो थोड़ा - बहुत हमारा अहसास बना रहता है, वो भी खत्म हो जाता। अब तक हम इतने बड़े हो गए थे कि हमें हमारा आकार मिल चुका था। सिर्फ कलर को छोड़ दिया जाए तो सौंदर्य के सारे मानदंडों पर खरे उतरते थे। यथा : छरहरा बदन, बड़ी - बड़ी आंखें, सुतवां लंबी नाक, सुराहीदार गर्दन, घने - काले केश, पतली कमर... लेकिन जब इन सबका टोटल किया जाता तो बनते कमल किशोर सक्सेना। आज इसी टोटल की 65 वीं वर्षगांठ है। आमीन!
- कमल किशोर सक्सेना
Sunday, October 11, 2015
ए· हारे हुए मैच ·े साइड इफेक्ट्स
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रविवार ·ी दोपहर त· ग्रीनपार्· में बड़ी खुशनुमा हवाएं चल रही थीं ले·िन शाम होते-होते वे उदास हो गयीं। भारत मैच हार गया। हवाएं उदास तो सारा वातावरण उदास। अपने-अपने नीड़ों ·ो वापस लौटते पक्षीगण भी ·लरव ·रना भूल·र उदास हो गये। पशुओं ·ा मूड अलग खराब हो गया। ·ुत्ते सबसे ज्यादा उदास थे... ए· तो ग्रीनपार्· में घुसने ·ो नहीं मिला...ऊपर से मैच भी हाथ से नि·ल गया। पता नहीं ·ुत्तों ·े साथ सख्ती ·रने ·ी क्या जरूरत थी। उनसे ·ौन सी साम्प्रदायि· ·ा खतरा हो स·ता था। परमट चौराहे पर बैठा ए· ·ुत्ता इतना दुखी था ·ि उस·ी ·िसी ·ो ·ाटने ·ी इच्छा ही मर गयी। वह ·ेवल भौं··र रस्म अदायगी ·र रहा था।
भारत मैच क्या हारा ·ि पूरे शहर ने उदासी ·ी चादर में अपने पैर पसार लिए। महीनों ·े इंतजार ·ा इतना खराब अंत। रिजल्ट ·ा अंदाज पहले लग जाता तो टि·ट ·े लिए इतनी लाठियां तो न खाते। स्टूडेंट दीर्घा से मैच देख·र नि·ले ·ई छात्र यही सोच·र अपने-अपने पैरों ·ो सहला रहे थे। ·ुछ ऐसा ही हाल पब्लि· समेत ·ई दीर्घाओं ·े दर्श·ों ·ा था। अब तो घर जा·र चोट पर हल्दी-चूना लगाने से भी ·ोई फायदा नि·लने वाला नहीं था।
मैच हारने ·ी पीड़ा मुर्गा और मटन मार्·ेट में भी थी। ·ई मुर्गों, मछलियों और ब·रों ·ा मूड खराब हो गया। उन्होंने ·टने से इन्·ार ·र दिया। आखिर क्यों न हो... उन·े वंशजों ने टीम इंडिया ·े लिए क्या-क्या नहीं ·िया। होटल वालों ·े साथ जबर्दस्ती ·ो-ऑपरेट ·िया। ·ु·र और देग ·े अंदर जाने त· शेफ अं·ल ·ी बात मानी... फिर भी भारत ·े हाथ से मैच नि·ल गया।
पितर पक्ष में बड़ी संख्या में पुरखे भी अपना-अपना श्राद्ध छोड़·र ग्रीनपार्· चले गये थे... मैच देखने। उन·ी आत्माएं वहां मंडराती रहीं। चौ·ों-छक्·ों पर दिन भर तालियां पीटती रहीं... ले·िन शाम ·ो मिला क्या... बाबा जी ·ा...! भारत ·े मैच हारने ·ा अफसोस ·ेस्·ो ·ो भी है। क्या फायदा हुआ शहर ·ी बिजली न ·ाटने ·ा... मैच ही हारना था तो इनवर्टर या जेनरेटर ·े ·रंट में हारते... ·ेस्·ो ·ो क्यों बदनाम ·िया। वैसे भी उस·ी बदनामी ·ौन सी ·म है।
यही हाल टेलीफोन विभाग ·ा भी था। मैच ·े लिए ·बसे व्यवस्था ·र रहे थे... इतनी मेहनत शहर ·े लिए ·रते तो शायद ·ॉल ड्रॉप या टेलीफोन डेड होने ·ी समस्या घट जाती। पुलिस ·र्मचारी अलग दुखी थे... इतने दिनों ·ी सख्त ड्यूटी ·ा क्या सिला मिला। भारत मैच क्या हारा...शहर ·ी ·ायनात वीर और उत्साह रस से सीधे ·रुणा रस में प्रवेश ·र गयी। मैच प्रसारित ·रने वालों ·ो छोड़·र अन्य टीवी चैनलों ·ी टीआरपी गिर गयी। मैच जीत जाते तो ‘बजरंगी भाईजान’ छूट जाने ·ा अफसोस न होता। दुखी तो स्टॉ· एक्सचेंज भी हुआ ले·िन संडे होने ·े ·ारण उस·ा दुख सार्वजनि· नहीं हो पाया। पता नहीं इस·ी भड़ास वह ·ब नि·ाल दे। मैच हारने ·ी ये पीड़ा शहरवासियों ·े जख्मों ·ो ·ब त· हरा रखेगी... ·हना मुश्·िल है। शायद अगला मैच इससे निजात दिला स·े... ले·िन वो ·ब होगा... क्या पता!
Saturday, October 3, 2015
मंगल ·ा पानी वाया नगर निगम!
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ये जान·र बहुत तसल्ली हुई ·ि नासा ·े वैज्ञानि·ों ·ो मंगल ग्रह पर पानी मिल गया। वैज्ञानि· और डॉक्टर जो ·हते हैं, वह सच ही होता है। उन्हें झूठा मानने ·ा रिवाज नहीं है हमारे यहां। अब मुझे लगता है ·ि शहर ·ी जल समस्या भी सुलझ जाएगी। चूं·ि मंगल पर पानी अमेरि·ा ·े वैज्ञानि·ों ने खोजा है तो मुम·िन है ए·ाध चुल्लू पानी पा·िस्तान ·े हिस्से में आ जाए। ले·िन, भारत ·ो ·म से ·म इतना तो मिलना ही चाहिए जिसमें दो-चार दर्जन पा·िस्तान डूब स·ें। हालां·ि, इस मसले पर पा·िस्तान ·ा पक्ष लिया जाए तो य·ीनन वो ·हेगा ·ि यूएनओ ·े माध्यम से मामला निपटाया जाना चाहिए।
खैर! वापस लौटिये अपने शहर ·ी जल समस्या पर। वैसे तो शहर में पानी ·ी ·ोई ·मी नहीं है। नगर निगम ·ी ·ृपा से बजबजाते नाले-नालियां इस·े गवाह हैं। इन नाले-नालियोंं में पानी ·े अलावा ईश्वरीय पांच तत्व और ·ुछ मानव रचित तत्व भी होते हैं। ·ुत्ते और सुअर इस अनुपम छटा ·ा उसमें डूब·र मुजाहिरा ·रते हैं तो शहर ·े नर-नारी ना· पर रूमाल रख·र। वीर रस से ओतप्रोत ·ुछ युवा और अंगूर ·ी बेटी ·े दामन में अपना सब ·ुछ लुटा चु·े चंद देवदास भी ·भी-·भी नगर निगम ·ी इस झेलम ·ी सैर ·र आते हैं।
·हीं-·हीं महसूस होता है ·ि शहर में फुटपाथ भी हैं। उन पर हैंडपंप भी सजे हैं। उनमें से अधि·ांश हैंडपंपों पर व्यापारियों-दु·ानदारों ने अतिक्रमण ·ी चादर चढ़ा रखी है। इनमें से अस्सी परसेंट हैंडपंप वा·ई सजावटी हैं। ·िसी पर पान-मसाले ·ी दु·ान चलती है तो ·िसी पर ·पड़े सूख रहे होते हैं। अगर ·ोई हैंडपंप गलती से बिना घूंघट ·े मिल जाता है तो उससे गोबर ·ी गंध, खालिस गरम हवा या ‘अच्छे दिन’ ·ा अहसास ·राती ऐसी गंध आत्मा ·े सारे तार छेड़ जाती है... जैसी सड़े प्याज ·ो पोस्टमार्टम हाउस में रख देने ·े बाद डुएट बन·र उभरती है। से·ेंड वल्र्ड वार ·े गोले ·े खोखे से ले·र मच्छर ·ी पसली त· सब मिल जाता है इन हैंडपंपों में, बस पानी नहीं।
अब जरा ए· नजर नगर निगम ·ी तैयारियों पर। मंगल से पानी जब आएगा, तब आएगा ले·िन संभव है ·ि निगम में इस·ा डीपीआर बनना शुरू जाए। मोटे तौर पर अंदाज तो लगाया ही जा स·ता है ·ि मंगल से ·ानपुर त· पानी लाने ·े लिए जो पाइपलाइन टंगेगी, उस पर पेंट ·रने ·ा ठे·ा ·िसे दिया जाए। ·ौन सी ·ंपनी ·ा पेंट ठी· रहेगा। पुराने वाले ठे·ेदार से ·ाम ·रवाया जाए तो ·हो छह महीने में ही ली· ·रने लगे। पता चला आधा पानी बीच में ही दूसरे ग्रह वालों ने ·िडनैप ·र लिया। माथा-पच्ची ·रने ·ो और भी ·ई झंझट हैं... जैसे पाइपलाइन ·ी ·ास्ट (नट-बोल्ट सहित), ·िस·ा ·मीशन रेस्पेक्टेबल है वगैरह-वगैरह।
हो स·ता है ·ि ·ुछ संगठन मंगल से मिलने वाले पानी ·ी आधी मात्रा हिन्दुओं ·े लिए आरक्षित ·िए जाने ·ी मांग ·र बैठें क्यों·ि तमाम आदेशों और ·ानूनों ·े बावजूद गंगा जी लगातार सूखती जा रही हैं। जब·ि, नया-नया लो·तंत्र ·ा प्याज चखने वाला नेपाल ·ह स·ता है ·ि उस·ा सारा पानी बह·र भारत में चला जाता है, जिससे उस·े यहां जल सं·ट हो जाता है... अत: लो·तंत्र ·े बच्चे ·ी हैसियत से भी उस·ी मंगल ·े जल पर दावेदारी बनती है।
ए· सुझाव मेरा भी है ·ि सुदूर ग्रह ·ा जल उन लोगों ·े नैनों में डाला जाए, जिन·ी आंखों ·ा पानी मर गया हो। बताता चलूं ·ि तैयारियां ·ेवल नगर निगम में ही नहीं, ·ई और विभागों में भी चल रही हैं। ·ई नामी-गिरामी बिल्डर मंगल पर अपार्टमेंट बनाने और वास्तुशास्त्री नक्शा बनाने ·े सपने देखने लगे हैं। बस ए· ही ·स· है ·ि पता नहीं मोदी जी इन सब·े लिए ओबामा ·ो मना पाएंगे!
Friday, September 25, 2015
झल· दिखला जा... ए· बार आजा-आजा-आजा...
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प्रिये!
सच ·हता हूं... पूरा ए· सप्ताह हो गया तुम्हारे दीदार·ो। ेंमोहल्ले ·ा ट्रांसफार्मर फुं·ने ·े बाद उमस भरी गर्मीमें यह समय मैंने ·ैसे तड़प-तड़प·र ·ाटा है... इसे मेरा दिल ही जानता है। दिनमें धूल-धक्·ड़ और रातमें मच्छर! भगवान ऐसा जुल्म ·िसी जुल्मी पर भी न ·रे। पता नहीं तुम मेरे साथ ·िस जुल्म·ा बदला ले रही हो ·ि तुम्हारी ए· झल· पाने·ो मैं तरस गया हूं। ·ेस्·ोसे मेरा ·ोई बैर नहीं है। सारे बिल भी समयसे जमा ·रता हूं। इंस्पेक्टर साहब मीटर·ी रीडिंग लेने जब भी आते हैं... मैं उन्हें ·ोल्ड ड्रिं· और नम·ीन·े साथ पत्र-पुष्पभी अर्पित ·रता हूं। ऐसेमें तुम्हारी बेवफाई मेरी समझसे परे है।
डार्लिंग! तुम नहीं जानतीं ·ि तुम्हारे वियोगमें मेरे घर·ी क्या हालत हो गई है। फ्रिज बंद पड़ा है। जब तुम ही नहीं हो तो उस·ा क्या लाभ? न ठंडा पानी मिल स·ता है और न सब्जी-फल वगैरह उसमें रखे जा स·ते हैं। साढ़े चार बाई डेढ़ फिट·ा वह डिब्बा मुंह अलग चिढ़ाता रहता है। हार·र मैंने उससे गोदरेज·ी अलमारी·ा ·ाम लेना शुरू ·र दिया है। अब उसमें ·पड़े और ·िताबें रखने लगा हूं।
ऐ मेरी दो सौ बीस वोल्ट·ा झट·ा मारने वाली हुस्नपरी! सच ·ितने दिन हो गए तेरा झट·ा खाए। मैंने अपने घर·ी टूटी-फूटी वायरिंग सिर्फ इसलिए ठी· नहीं ·रवाई क्यों·ि तुम्हारे झट·ोंमें जो ·शिश है... वो पड़ोसनमें भी नहीं...हालां·ि उस·ा ·रंट भी चार सौ चालीस वोल्ट ·ा होता है।
मेरे सपनों·ी रानी! तुम नहीं जानतीं ·ि तुम्हारे बिना घर·ा टीवीभी बेजान है। श्रीमती जी·ो ‘सास-बहू’ देखे ·ई दिन हो चु·े हैं। शायद तुम्हें ·ल्पनाभी न हो ·ि वह ए· बार मुझे तो छोड़ स·ती हैं ले·िन सास-बहू·े सीरियल नहीं। तुम मानो या न मानो ले·िन सच ये है ·ि जिस वक्त सीरियल आने ·ा टाइम होता है... वह दूरबीन लगा·र सामने वाले पड़ोसी·े टीवीसे अपने नेत्रों·ो उप·ृत ·रती हैं। पड़ोसी ·े यहां जेनरेटर नाम· सौत है। और, सीरियल·े बीच ‘छोटा सा ब्रे·’ आता है तो सुराही·ा पानी पी-पी·र मुझे और तुम्हें बिना ब्रे· लिए ·ोसती हैं।
हे ·ेस्·ो·ी पटरानी! तुम नहीं जानतीं ·ि तुम्हारी जुदाई मेरे पूरे परिवार पर भारी है। मेरा बेटा पसीना पोंछते और मच्छर मारते हुए ·ंपटीशन·ी तैयारी ·र रहा है। अगर उस·ा ·ॅरियर बिगड़ता है तो उस·े लिए तुम और ·ेवल तुम ही जिम्मेदार होगी। मजबूरी है ·ि मेरी हैसियत न इनवर्टर लगवाने·ी है और न जेनरेटर अफोर्ड ·रने·ी। तुम ही मेरे दुखों·ी नैया पार लगा स·ती हो। रहम ·रो।
ऐ हैसियत देख·र प्रति यूनिट अपने दाम निर्धारित ·रने वाली नटवरी! अब तुम्हारी जुदाई बर्दाश्त ·ोटेसे बाहर हो चु·ी है। ·भी-·भी सोचता हूं ·ि आत्महत्या ही ·र लूं ले·िन ये सोच·र इस विचार·ो त्याग देता हूं ·ि ·हीं परिवार ·े लोग मेरा पार्थिव शरीर तुमसे चलने वाले शवदाह गृह ले गए तो वहांभी तुम नहीं मिलोगी। और, फुं·ने·े इंतजारमें मेरी लाश अलग सड़ जाएगी। हो स·ता है ·ि अगला जन्मभी ले लूं और तुम्हारे दर्शन न हों। मेरी विपदा·ो समझो। तुम्हारी ए· झल· पाने·ो मैं सौ जिंदगियां ·ुर्बान ·र स·ता हूं। ले·िन तुम्हारे बिना मर नहीं स·ता। इसलिए ए· बार तो झल· दिखला जा। भगवान ·े लिए ए· बार आजा, आजा, आजा... आजा!
- ·मल ·िशोर सक्सेना
Tuesday, December 21, 2010
'पÓ से 'प्याजÓ, 'लÓ से 'लहसुनÓ
मेरे सामने एक प्याज है। इसे मैं एक हफ्ते से टकटकी लगाकर देख रहा हूं कि आखिर बनाने वाले नेे क्या सोचकर इसे 'टियर गनÓ थमा दी। वरना, कितनी खूबसूरत फिगर है। ज्यों-ज्यों कपड़े उतरते जाते हैं, त्यों-त्यों निखार आता जाता है। लेकिन, इतनी मस्त अदाओं वाला प्याज इस समय सबको जार-जार रुला रहा है।
मैं भी रो रहा हूं। एक हफ्ते से सोच रहा हूं कि परिवार के इस इकलौते प्याज को खर्च करूं या ड्राइंग रूम में सजा दूं। किचेन के स्तर से तो ऊपर उठ चुका है वो। पक्का फ्रेम करवाकर दीवार पर लगवाने का इरादा इसलिए नहीं है कि अभी मुझे प्याज के किचेन में वापस लौटने की उम्मीद है। आशावादी हूं न। इसीलिए।
खैर, इसे इसके एक किलो साथियों के साथ पिछले महीने खरीदा था सब्जीमंडी से। बाकी साथी तो पेट की जंग की भेंट चढ़ गए। अब ये इकलौता बचा है। मेरी आंखों का नूर, मेरा कोहिनूर, जाने-जिगर, घर का इकलौता चिराग, चश्मे-बद्दूर। कहने की जरूरत नहीं कि आजकल मैं प्याज की पूजा रहा हूं। खाने के लिए सोचना भी पाप है। लहसुन भी इन दिनों प्याज का मौसेरा भाई बनकर उभरा है।
खाते-पीते घरों के लोग जानते हैं कि लहसुन-प्याज विहीन भोजन करना कितना कष्टप्रद होता है। फिर मैं तो उस खानदान को बिलांग कराता हूं, जहां बकरे का मतलब बिरयानी और लेग पीस का मतलब सिर्फ मुर्गा समझा जाता है। और, दुनिया के तमाम बावर्चीखाने गवाह हैं कि बिना लहसुन-प्याज के बकरे, मुर्गे तो छोडिय़े, झींगा मछली तक कुकर में जाने को राजी नहीं होती।
कल मेरे कुकर ने मुझसे पूछा- कितने दिन मुझे और दाल-भात पर जिंदा रहना पड़ेगा। तुम्हें शाकाहार का संदेशा देना हो तो शौक से दो लेकिन मुझे तो हफ्ते में मिनिमम दो दिन नॉन वेज चाहिए ही चाहिए। कहते हुए कुकर के ढक्कन से लार टपकने लगी। मुझे अफसोस भी हुआ। बेचारा कुकर। यही तो दिन हैं इसके खाने-खेलने के। ऐसे अनेक अवसर आये, जब कुकर का मन नहीं होता था तो भी बकरे का भेजा या मुर्गे की टांग जबर्दस्ती उसमें घुस जाते थे। प्रेशर लगाना पड़ता है। मजबूरी है। आप ही बताइये, वह कौन पत्थर दिल पेटू होगा जो ये सीन देखकर कुकर में सीटी न लगा दे। यही हाल कड़ाही का था। मछली के मूड़ों के बीच खेली-पढ़ी मेरी कड़ाही को आजकल पालक और करमकल्ले से काम चलाना पड़ रहा था। मिक्सी कल पूछ रही थी कि क्या मुझे खाली जूस निकालने के लिए रख छोड़ा है। आजकल मसाला क्यों नहीं पीसते। प्याज महंगा है तो चटनी ही पीस लो। भारी दिन चल रहे हैं क्या। अब मैं इस कम्बख्त कड़ाही और मिक्सी को कैसे समझाऊं कि हम जैसे आम आदमियों के लिए इससे भारी दिन और क्या होंगे।
प्याज महंगा होने से केवल किचेन का ही कुकर नहीं रो रहा है। कूकुर अर्थात कुत्ते भी रो रहे हैं। जो बंगलों की चारदीवारी में बंद रहते हैं, उनकी बात मैं नहीं जानता लेकिन गली के कुत्तों का तो स्वाद चला गया है। कल मैंने कूड़े के ढेर के पास एक कुत्ते को बेमन से टहलते देखा। भोज्य पदार्थों, अंत: और वाह्य वस्त्रों के टुकड़ों, कॉस्मेटिक सामान और कम्प्यूटर के पुर्जों सहित कई चीजें उस कूड़े की शोभा बढ़ा रही थीं लेकिन कुत्ते के चेहरे से उदासी की पर्तें हट नहीं रही थीं। पास ही एक सुअरिया अपनी दिनचर्या जी रही थी। सुअरिया तृप्त होकर खुश थी। कुत्ता उदास। एक तरफ आशा की ताल-तलैया थी। दूसरी तरफ निराशा की सुनामी। एक ओर मुंह लटकाये कुत्ता था तो दूसरी ओर चहचहाती-इठलाती सुअरिया। इधर खुशी, उधर मातम।
थोड़ी देर में सुअरिया ने कुत्ते से पूछा- 'कुत्ता सर! अब तो फिर एनडीए की सरकार बन गई है। लोगों में खौफ नहीं है। वे आधी रात तक घूमने-फिरने लगे हैं। अब तुम्हारे पास उन्हें काटने और भौंकने का चौबीसों घंटों इस्कोप है। चारों ओर सुशासन की बयार नहीं बल्कि आंधी चल रही है। कल मैं टहलते हुए नदी तक चली गयी थी। वहां कई सरकारी कर्मचारी एक अजगर से काम करवाने पर तुले थे। लेकिन वह भी था सरकारी अजगर। वह भी उस जमाने का, जब विभागों में काम न करने का रिवाज था। अजगर टस से मस होने को तैयार न था। इधर कर्मचारियों को भी नया-नया डीए मिला था। वे भी डीए के जोश में थे। बड़ी जोर-आजमाइश हुई। लेकिन होइये वही जो राम रचि राखा। अर्थात, इस युद्ध में विजय की जयमाला अजगर के गले में पड़ी। कर्मचारी ये कहते हुए वापस लौट गए कि दो बार डीए और बढऩे दो। इतने में तो इसे हिलाना भी मुश्किल है। खैर, उस अजगर से मेरी काफी देर बात हुई। तमाम मुद्दों पर। वह आजकल बीमार है। अल्ट्रासाउंड कराया था। डॉक्टर का कहना है कि बिना प्याज का मीट-मछली खाने से इसके पेट में इनफेक्शन हो गया है। दवा चल रही है। सुबह-शाम हरे प्याज वाला सागा खा रहा है और दूध में च्यवनप्राश ले रहा है।Ó
सुअरिया ने ढेर पर आकर गिरी नई लाट को देखकर एक बार अपने होंठों पर जीभ फेरी फिर आगे बोली- 'भाई ये प्याज-व्याज तो चोंचले हैं तुम लोगों के। हम लोगों को देखो। एक ही फेवरिट डिश। हजारों-लाखों सालों से चली आ रही है। न मैन्यू बदला। न अंदाज। सर्वत्र उपलब्ध। न बीपीएल कार्ड की जरूरत न एपीएल की। न चोर चुराये न डाकू ले जाये। न सडऩे का खतरा। न खराब होने का डर। न फ्रिज की जरूरत, न ओवन की। आदमी कुछ भी खाये, उसे कनवर्ट हमारी डिश में ही होना है। प्याज-लहसुन महंगा हो हमारी बला से। लेकिन तुम क्यों उदास हो। देखो दिसंबर खतम हो रहा है। किसी युवती की मादक अंगड़ाई की तरह ठंड अंग-अंग में चुभने लगी है। कितना रोमांटिक मौसम है। खास तौर से तुम कुत्ता समुदाय के लिए। अरे तुम्हें तो अपनी कुतिया को लेकर गोवा या शिमला निकल जाना चाहिए था। यहीं रहना था तो पटना के गांधी मैदान में रैली करते। आने वाले साल को 'अंतर्राष्ट्रीय कुत्ता वर्षÓ घोषित किए जाने की मांग करते... मगर तुम यहां मुंह लटकाये यहां घूरे के ढेर पर उदास बैठे हो। अच्छा बस इतना बता दो कि क्या तुम्हारी कुतिया किसी और के साथ भाग गई है या तुम्हारा पिल्ला पड़ोसी को पापा बोलता है। भगवान के लिए बता दो फिर मैं अपने प्रियतम के पास चली जाऊंगी। देखो कितनी देर से मेरा प्रियतम मैनहोल में युगल स्नान करने के लिए मुझे बुला रहा है।Ó
कुत्ते ने एक लंबी सांस ली और कहना शुरू किया- 'तुम्हें पता है कि किसी कुत्ते के लिए दुनिया की सबसे बड़ी सजा क्या है? उसे हड्डी से दूर कर देना। और हड्डी की सबसे बडी सजा है उसे लहसुन-प्याज से दूर कर दिया जाए। और मैं, एक कुत्ता होकर ये दोनों सजाएं एक साथ भोग रहा हूं। घोर नाइंसाफी है। पहले झुग्गी- झोपडिय़ों की जूठन में भी लहसुन-प्याज के छिलके के दर्शन हो जाते थे। लेकिन अब तो बंगलों के बाहर भी मूली और गोभी के पत्तों का पहरा है। अरे तुम क्या जाना कि दुनिया कितने तरह के स्वादों से भरी हुई है।Ó
कहते हुए कुत्ता बिना बल्ब वाले सट्रीट लाइट के खंभे के नीचे बैठ गया। पास ही किसी मैगजीन का फटा हुआ पेज पड़ा था। उस पेज पर प्याज की फोटो छपी थी और पीछे से गीत की आवाज आ रही थी- 'मैं तो एक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर!Ó
मैं भी रो रहा हूं। एक हफ्ते से सोच रहा हूं कि परिवार के इस इकलौते प्याज को खर्च करूं या ड्राइंग रूम में सजा दूं। किचेन के स्तर से तो ऊपर उठ चुका है वो। पक्का फ्रेम करवाकर दीवार पर लगवाने का इरादा इसलिए नहीं है कि अभी मुझे प्याज के किचेन में वापस लौटने की उम्मीद है। आशावादी हूं न। इसीलिए।
खैर, इसे इसके एक किलो साथियों के साथ पिछले महीने खरीदा था सब्जीमंडी से। बाकी साथी तो पेट की जंग की भेंट चढ़ गए। अब ये इकलौता बचा है। मेरी आंखों का नूर, मेरा कोहिनूर, जाने-जिगर, घर का इकलौता चिराग, चश्मे-बद्दूर। कहने की जरूरत नहीं कि आजकल मैं प्याज की पूजा रहा हूं। खाने के लिए सोचना भी पाप है। लहसुन भी इन दिनों प्याज का मौसेरा भाई बनकर उभरा है।
खाते-पीते घरों के लोग जानते हैं कि लहसुन-प्याज विहीन भोजन करना कितना कष्टप्रद होता है। फिर मैं तो उस खानदान को बिलांग कराता हूं, जहां बकरे का मतलब बिरयानी और लेग पीस का मतलब सिर्फ मुर्गा समझा जाता है। और, दुनिया के तमाम बावर्चीखाने गवाह हैं कि बिना लहसुन-प्याज के बकरे, मुर्गे तो छोडिय़े, झींगा मछली तक कुकर में जाने को राजी नहीं होती।
कल मेरे कुकर ने मुझसे पूछा- कितने दिन मुझे और दाल-भात पर जिंदा रहना पड़ेगा। तुम्हें शाकाहार का संदेशा देना हो तो शौक से दो लेकिन मुझे तो हफ्ते में मिनिमम दो दिन नॉन वेज चाहिए ही चाहिए। कहते हुए कुकर के ढक्कन से लार टपकने लगी। मुझे अफसोस भी हुआ। बेचारा कुकर। यही तो दिन हैं इसके खाने-खेलने के। ऐसे अनेक अवसर आये, जब कुकर का मन नहीं होता था तो भी बकरे का भेजा या मुर्गे की टांग जबर्दस्ती उसमें घुस जाते थे। प्रेशर लगाना पड़ता है। मजबूरी है। आप ही बताइये, वह कौन पत्थर दिल पेटू होगा जो ये सीन देखकर कुकर में सीटी न लगा दे। यही हाल कड़ाही का था। मछली के मूड़ों के बीच खेली-पढ़ी मेरी कड़ाही को आजकल पालक और करमकल्ले से काम चलाना पड़ रहा था। मिक्सी कल पूछ रही थी कि क्या मुझे खाली जूस निकालने के लिए रख छोड़ा है। आजकल मसाला क्यों नहीं पीसते। प्याज महंगा है तो चटनी ही पीस लो। भारी दिन चल रहे हैं क्या। अब मैं इस कम्बख्त कड़ाही और मिक्सी को कैसे समझाऊं कि हम जैसे आम आदमियों के लिए इससे भारी दिन और क्या होंगे।
प्याज महंगा होने से केवल किचेन का ही कुकर नहीं रो रहा है। कूकुर अर्थात कुत्ते भी रो रहे हैं। जो बंगलों की चारदीवारी में बंद रहते हैं, उनकी बात मैं नहीं जानता लेकिन गली के कुत्तों का तो स्वाद चला गया है। कल मैंने कूड़े के ढेर के पास एक कुत्ते को बेमन से टहलते देखा। भोज्य पदार्थों, अंत: और वाह्य वस्त्रों के टुकड़ों, कॉस्मेटिक सामान और कम्प्यूटर के पुर्जों सहित कई चीजें उस कूड़े की शोभा बढ़ा रही थीं लेकिन कुत्ते के चेहरे से उदासी की पर्तें हट नहीं रही थीं। पास ही एक सुअरिया अपनी दिनचर्या जी रही थी। सुअरिया तृप्त होकर खुश थी। कुत्ता उदास। एक तरफ आशा की ताल-तलैया थी। दूसरी तरफ निराशा की सुनामी। एक ओर मुंह लटकाये कुत्ता था तो दूसरी ओर चहचहाती-इठलाती सुअरिया। इधर खुशी, उधर मातम।
थोड़ी देर में सुअरिया ने कुत्ते से पूछा- 'कुत्ता सर! अब तो फिर एनडीए की सरकार बन गई है। लोगों में खौफ नहीं है। वे आधी रात तक घूमने-फिरने लगे हैं। अब तुम्हारे पास उन्हें काटने और भौंकने का चौबीसों घंटों इस्कोप है। चारों ओर सुशासन की बयार नहीं बल्कि आंधी चल रही है। कल मैं टहलते हुए नदी तक चली गयी थी। वहां कई सरकारी कर्मचारी एक अजगर से काम करवाने पर तुले थे। लेकिन वह भी था सरकारी अजगर। वह भी उस जमाने का, जब विभागों में काम न करने का रिवाज था। अजगर टस से मस होने को तैयार न था। इधर कर्मचारियों को भी नया-नया डीए मिला था। वे भी डीए के जोश में थे। बड़ी जोर-आजमाइश हुई। लेकिन होइये वही जो राम रचि राखा। अर्थात, इस युद्ध में विजय की जयमाला अजगर के गले में पड़ी। कर्मचारी ये कहते हुए वापस लौट गए कि दो बार डीए और बढऩे दो। इतने में तो इसे हिलाना भी मुश्किल है। खैर, उस अजगर से मेरी काफी देर बात हुई। तमाम मुद्दों पर। वह आजकल बीमार है। अल्ट्रासाउंड कराया था। डॉक्टर का कहना है कि बिना प्याज का मीट-मछली खाने से इसके पेट में इनफेक्शन हो गया है। दवा चल रही है। सुबह-शाम हरे प्याज वाला सागा खा रहा है और दूध में च्यवनप्राश ले रहा है।Ó
सुअरिया ने ढेर पर आकर गिरी नई लाट को देखकर एक बार अपने होंठों पर जीभ फेरी फिर आगे बोली- 'भाई ये प्याज-व्याज तो चोंचले हैं तुम लोगों के। हम लोगों को देखो। एक ही फेवरिट डिश। हजारों-लाखों सालों से चली आ रही है। न मैन्यू बदला। न अंदाज। सर्वत्र उपलब्ध। न बीपीएल कार्ड की जरूरत न एपीएल की। न चोर चुराये न डाकू ले जाये। न सडऩे का खतरा। न खराब होने का डर। न फ्रिज की जरूरत, न ओवन की। आदमी कुछ भी खाये, उसे कनवर्ट हमारी डिश में ही होना है। प्याज-लहसुन महंगा हो हमारी बला से। लेकिन तुम क्यों उदास हो। देखो दिसंबर खतम हो रहा है। किसी युवती की मादक अंगड़ाई की तरह ठंड अंग-अंग में चुभने लगी है। कितना रोमांटिक मौसम है। खास तौर से तुम कुत्ता समुदाय के लिए। अरे तुम्हें तो अपनी कुतिया को लेकर गोवा या शिमला निकल जाना चाहिए था। यहीं रहना था तो पटना के गांधी मैदान में रैली करते। आने वाले साल को 'अंतर्राष्ट्रीय कुत्ता वर्षÓ घोषित किए जाने की मांग करते... मगर तुम यहां मुंह लटकाये यहां घूरे के ढेर पर उदास बैठे हो। अच्छा बस इतना बता दो कि क्या तुम्हारी कुतिया किसी और के साथ भाग गई है या तुम्हारा पिल्ला पड़ोसी को पापा बोलता है। भगवान के लिए बता दो फिर मैं अपने प्रियतम के पास चली जाऊंगी। देखो कितनी देर से मेरा प्रियतम मैनहोल में युगल स्नान करने के लिए मुझे बुला रहा है।Ó
कुत्ते ने एक लंबी सांस ली और कहना शुरू किया- 'तुम्हें पता है कि किसी कुत्ते के लिए दुनिया की सबसे बड़ी सजा क्या है? उसे हड्डी से दूर कर देना। और हड्डी की सबसे बडी सजा है उसे लहसुन-प्याज से दूर कर दिया जाए। और मैं, एक कुत्ता होकर ये दोनों सजाएं एक साथ भोग रहा हूं। घोर नाइंसाफी है। पहले झुग्गी- झोपडिय़ों की जूठन में भी लहसुन-प्याज के छिलके के दर्शन हो जाते थे। लेकिन अब तो बंगलों के बाहर भी मूली और गोभी के पत्तों का पहरा है। अरे तुम क्या जाना कि दुनिया कितने तरह के स्वादों से भरी हुई है।Ó
कहते हुए कुत्ता बिना बल्ब वाले सट्रीट लाइट के खंभे के नीचे बैठ गया। पास ही किसी मैगजीन का फटा हुआ पेज पड़ा था। उस पेज पर प्याज की फोटो छपी थी और पीछे से गीत की आवाज आ रही थी- 'मैं तो एक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर!Ó
Sunday, October 31, 2010
दरोगा भर्ती लिखित परीक्षा (बिहार)
नोट : हर खंड के सभी सवालों का जवाब देना जरूरी है। हर सवाल के अंक अलग-अलग हैं, जो आपकी एड़ी की नाप और खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा जांचने के बाद निर्धारित किये जायेंगे।
खंड (क) सामान्य ज्ञान
(1) पोस्टमार्टम हमेशा मरने बाद ही क्यों किया जाता है?
(2) मृत्युपूर्व बयान जीवित अवस्था में क्यों दर्ज करवाना चाहिए?
(3) दो पुलिस वालों को मौसेरा भाई क्यों नहीं कहा जा सकता?
(4) एक आदर्श पुलिसकर्मी को अपने सेवाकाल में कितनी बार निलंबित और लाइन हाजिर होना चाहिए?
(5) इनकाउंटर में मरने के लिए अपराधी होना क्यों आवश्यक है?
खंड (ख) व्यावहारिक ज्ञान
(1) मां और बहन की गाली से आप क्या समझते हैं? ये अपने घर में क्यों नहीं दी जा सकतीं?
(2) 'वर्दी पर धब्बाÓ लगाने के पांच सर्वश्रेष्ठ तरीके कौन से हैं? तथा, पिछले वित्तीय वर्ष में इन धब्बों को छुड़ाने के लिए विभाग को कुल कितनी राशि खर्च करनी पड़ी?
(3) 'मुठभेड़Ó आउटडोर गेम है या इनडोर? इसे अपराधियों के अलावा और किन- किन लोगों के साथ खेला जा सकता है?
(4) क्या विभागीय महिलाओं को भी उन्हीं नजरों से देखा जाना चाहिए, जिन नजरों से कुछ पुलिस वाले अन्य को देखते हैं?
(5) प्रदेश के पांच नामचीन अपराधियों की जीवनी और उपलब्धियां संक्षेप में लिखिये। कोई भी जीवनी दो सौ शब्दों से ज्यादा बड़ी न हो। बेशक अपराधी चाहे जितना बड़ा क्यों न हो।
खंड (ग) आरक्षित ज्ञान
(1) 'आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूंÓ की अवधारणा पर जो लोग विश्वास करते हैं, उन्हें समाज में क्या कहा जाता है? चित्र बनाकर इस अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
(2) ट्रक के नीचे खड़े होकर लिए जाने वाले धन को भी ऊपरी आमदनी क्यों कहते हैं? ये अधिकतम कितनी ऊंचाई तक की जा सकती है, जिसमें निगरानी या इंटेलिजेंस का खतरा न हो?
(3) पांच अपराधी प्रति माह फरार होने की दर से पूरी जेल खाली होने में कितने वक्त की दरकार होगी?
(4) टिप्पण्ी लिखिये : कमीना, कुत्ता, पितृ नाम से अनभिज्ञ, मसालेदार मदिरा, डंडे का महात्म्य।
(5) थाने में ताला डालने में क्या-क्या कानूनी अड़चनें सामने आती हैं?
खंड (क) सामान्य ज्ञान
(1) पोस्टमार्टम हमेशा मरने बाद ही क्यों किया जाता है?
(2) मृत्युपूर्व बयान जीवित अवस्था में क्यों दर्ज करवाना चाहिए?
(3) दो पुलिस वालों को मौसेरा भाई क्यों नहीं कहा जा सकता?
(4) एक आदर्श पुलिसकर्मी को अपने सेवाकाल में कितनी बार निलंबित और लाइन हाजिर होना चाहिए?
(5) इनकाउंटर में मरने के लिए अपराधी होना क्यों आवश्यक है?
खंड (ख) व्यावहारिक ज्ञान
(1) मां और बहन की गाली से आप क्या समझते हैं? ये अपने घर में क्यों नहीं दी जा सकतीं?
(2) 'वर्दी पर धब्बाÓ लगाने के पांच सर्वश्रेष्ठ तरीके कौन से हैं? तथा, पिछले वित्तीय वर्ष में इन धब्बों को छुड़ाने के लिए विभाग को कुल कितनी राशि खर्च करनी पड़ी?
(3) 'मुठभेड़Ó आउटडोर गेम है या इनडोर? इसे अपराधियों के अलावा और किन- किन लोगों के साथ खेला जा सकता है?
(4) क्या विभागीय महिलाओं को भी उन्हीं नजरों से देखा जाना चाहिए, जिन नजरों से कुछ पुलिस वाले अन्य को देखते हैं?
(5) प्रदेश के पांच नामचीन अपराधियों की जीवनी और उपलब्धियां संक्षेप में लिखिये। कोई भी जीवनी दो सौ शब्दों से ज्यादा बड़ी न हो। बेशक अपराधी चाहे जितना बड़ा क्यों न हो।
खंड (ग) आरक्षित ज्ञान
(1) 'आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूंÓ की अवधारणा पर जो लोग विश्वास करते हैं, उन्हें समाज में क्या कहा जाता है? चित्र बनाकर इस अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
(2) ट्रक के नीचे खड़े होकर लिए जाने वाले धन को भी ऊपरी आमदनी क्यों कहते हैं? ये अधिकतम कितनी ऊंचाई तक की जा सकती है, जिसमें निगरानी या इंटेलिजेंस का खतरा न हो?
(3) पांच अपराधी प्रति माह फरार होने की दर से पूरी जेल खाली होने में कितने वक्त की दरकार होगी?
(4) टिप्पण्ी लिखिये : कमीना, कुत्ता, पितृ नाम से अनभिज्ञ, मसालेदार मदिरा, डंडे का महात्म्य।
(5) थाने में ताला डालने में क्या-क्या कानूनी अड़चनें सामने आती हैं?
Saturday, October 30, 2010
असली राशिफल- अपने कर्मों के आधार पर देखें
मेष : - इस राशि वालों के पंचम घर में राजद और छठे में बची-खुची लोजपा है। दूसरी ओर जद-यू और भाजपा का पंचक भी किलकारी मार रहा है। अत: थूक कर चाटने से बचें। आवश्यकता होने पर ही थूकें। किसी तरह काम न चले तो उसे गटक लें। ये प्राकृतिक विटामिन का काम भी करता है। आश्वासन और भाषणबाजी से कुछ दिनों के लिए तोबा कर लें। समाज से ध्वनि प्रदूषण कम करने में अपना हाथ बंटायें।
कर्क :- आपकी कुंडली में काले धन और काली महिला का योग है। यदि आप भी काले हैं तो कहना ही क्या। आपके दोनों हाथों में लड्डू है। अमावस की रात में चेहरे पर कालिख पोत कर और काला कंबल ओढ़कर, बिना स्ट्रीट लाइट वाली सड़क के खुले मैनहोल के पास काले कुत्ते को काली मसूर की दाल खिलायें। साथ में आप भी खायें। मनोकामना पूर्ण होगी। जमीन पर चलने से बचें। रात में एक पैर बांधकर सोयें।
तुला :- बड़ा लड़का प्रेम विवाह करेगा। जिसके कारण दहेज हानि का योग है। छोटे की शादी में भरपूर मिलेगा लेकिन वह सब बारात बिदा कराकर लौटते समय लुट जायेगा। उसमें अगर आप बच गये तो जिंदा रहेंगे। बेहतर हो कि बचे हुए कामकाज जल्द से जल्द निपटा लें और संपत्ति का बंटवारा कर दें। किसी पर भरोसा न करें। खुद पर भी नहीं। पंद्रह दिन तक आधी रात को देसी दारू पीकर बुलंद आवाज में पड़ोसियों को गालियां दें। सोलहवें दिन बिना किसी प्रयास के आप पोस्टमार्टम हाउस पहुंच जायेंगे। वहां से मोक्ष पाने का प्रयत्न करें।
मकर :- उदर विकार रहेगा। पेट में बातें पचाने में कठिनाई होगी लेकिन परनिंदा में आनंद आयेगा। हां, पड़ोसियों से संबंध खराब होने का पूरा-पूरा खतरा है। जीवन साथी आपके चरित्र पर शक करेगा। किंतु उसकी परवाह न करते हुए नये संबंधों को बदस्तूर जारी रखें। बच्चों को प्रेम विवाह के लिए उकसायें क्योंकि दहेज के जमाने में बेटी को डोली में बिठाना आपके बूते में है नहीं। बड़ा लड़का भी किसी लड़की को भगा कर लायेगा। अग्रिम जमानत का बंदोबस्त कर लें क्योंकि अपहरण का मुकदमा आप पर भी लदने का अंदेशा है।
वृष :- बुरी तरह अपमान का योग है। पुलिस से सहायता हरगिज न मांगें। अपरिहार्य हो तो किसी अपराधी को कांफीडेंस में लें। मनोदशा पिछले अपमान जैसी ही रहेगी। अर्थात, दूसरों की पत्नियों को आप घूरेंगे और दूसरे आपकी। ऐहतियात और संयम से काम लें। वरना मोहल्ले के साथ-साथ घर में भी चप्पलें पडऩे का खतरा है। एक आंख बंद करके किसी पैदायशी एक आंख वाले को एक समय का भोजन करायें और उसे भोजपुरी गानों की सीडी भेंट करें।
सिंह :- आपका खराब समय शुरू हो चुका है। दफ्तर में बॉस से कहासुनी होगी। तो आपकी नौकरी कितने दिन चलेगी। नौकरी नहीं रहेगी तो घर में बीवी क्यों रहेगी। वह मायके जाने की धमकी देकर आपके बॉस के घर की शोभा बढ़ायेगी। ऐसी स्थिति आने से रोकने के लिए रोज सुबह-शाम बॉस के साथ उनकी पत्नी की भी आरती उतारें। बुधवार की दोपहर को पत्नी पीडि़त दोस्तों के साथ बैठकर 'बेवफा बीवीÓ कहानी का पाठ करें। पाठ की समाप्ति कर सब मिलकर दो-दो पैग दारू का प्रसाद ग्रहण करें।
वृश्चिक :- आप गल्ती से मनुष्यों में पैदा हो गये हैं। इस सच्चाई को शीघ्र से शीघ्र स्वीकार करें और मोहल्ले के कुत्तों की सोहबत करें। उनकी चाल-ढाल, बोलचाल, आचार-विचार और चरित्र का अध्ययन करें। एक पैर उठाकर आवश्यक कार्य निपटायें। भोजन करते समय हाथों का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। कोशिश करें तो लेटकर भी सुगमता से खाना सीख जायेंगे। आधी रात को उठकर मोहल्ले के कुत्तों के सुर में सुर मिलाने का अभ्यास करें। इसे उस दिन सफल मानें, जिस दिन कोई कुतिया आपकी आवाज से मुतस्सर होकर खिंची चली आये। चार पहिया वाहनों से सावधान रहें।
कुम्भ :- आपके पंचतत्वों, क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा में जल का तत्व गौण है। आंखों में तो कभी था ही नहीं। अर्थात आपमें राजनीति करने के पूरे लक्षण हैं। एकाध आपराधिक मुकदमे भी खुद पर चलवाने का प्रयास करें। आपके अंदर चूंकि जल का तत्व गायब है इसलिए आपको जल से परहेज रखना चाहिए। पानी तभी पियें जब प्यास लगे। नीट पानी तो हरगिज न पियें... उसमें रम, व्हिस्की या ठर्रा आदि पौष्टिक पेयों का अवश्य समावेश करें। स्नान करने की कतई न सोचें। आपके लिए एक चुल्लू ही काफी है। ऐसे में बाथरूम के भीतर कदम रखना आपके लिए हितकर नहीं है।
कर्क :- आपकी कुंडली में काले धन और काली महिला का योग है। यदि आप भी काले हैं तो कहना ही क्या। आपके दोनों हाथों में लड्डू है। अमावस की रात में चेहरे पर कालिख पोत कर और काला कंबल ओढ़कर, बिना स्ट्रीट लाइट वाली सड़क के खुले मैनहोल के पास काले कुत्ते को काली मसूर की दाल खिलायें। साथ में आप भी खायें। मनोकामना पूर्ण होगी। जमीन पर चलने से बचें। रात में एक पैर बांधकर सोयें।
तुला :- बड़ा लड़का प्रेम विवाह करेगा। जिसके कारण दहेज हानि का योग है। छोटे की शादी में भरपूर मिलेगा लेकिन वह सब बारात बिदा कराकर लौटते समय लुट जायेगा। उसमें अगर आप बच गये तो जिंदा रहेंगे। बेहतर हो कि बचे हुए कामकाज जल्द से जल्द निपटा लें और संपत्ति का बंटवारा कर दें। किसी पर भरोसा न करें। खुद पर भी नहीं। पंद्रह दिन तक आधी रात को देसी दारू पीकर बुलंद आवाज में पड़ोसियों को गालियां दें। सोलहवें दिन बिना किसी प्रयास के आप पोस्टमार्टम हाउस पहुंच जायेंगे। वहां से मोक्ष पाने का प्रयत्न करें।
मकर :- उदर विकार रहेगा। पेट में बातें पचाने में कठिनाई होगी लेकिन परनिंदा में आनंद आयेगा। हां, पड़ोसियों से संबंध खराब होने का पूरा-पूरा खतरा है। जीवन साथी आपके चरित्र पर शक करेगा। किंतु उसकी परवाह न करते हुए नये संबंधों को बदस्तूर जारी रखें। बच्चों को प्रेम विवाह के लिए उकसायें क्योंकि दहेज के जमाने में बेटी को डोली में बिठाना आपके बूते में है नहीं। बड़ा लड़का भी किसी लड़की को भगा कर लायेगा। अग्रिम जमानत का बंदोबस्त कर लें क्योंकि अपहरण का मुकदमा आप पर भी लदने का अंदेशा है।
वृष :- बुरी तरह अपमान का योग है। पुलिस से सहायता हरगिज न मांगें। अपरिहार्य हो तो किसी अपराधी को कांफीडेंस में लें। मनोदशा पिछले अपमान जैसी ही रहेगी। अर्थात, दूसरों की पत्नियों को आप घूरेंगे और दूसरे आपकी। ऐहतियात और संयम से काम लें। वरना मोहल्ले के साथ-साथ घर में भी चप्पलें पडऩे का खतरा है। एक आंख बंद करके किसी पैदायशी एक आंख वाले को एक समय का भोजन करायें और उसे भोजपुरी गानों की सीडी भेंट करें।
सिंह :- आपका खराब समय शुरू हो चुका है। दफ्तर में बॉस से कहासुनी होगी। तो आपकी नौकरी कितने दिन चलेगी। नौकरी नहीं रहेगी तो घर में बीवी क्यों रहेगी। वह मायके जाने की धमकी देकर आपके बॉस के घर की शोभा बढ़ायेगी। ऐसी स्थिति आने से रोकने के लिए रोज सुबह-शाम बॉस के साथ उनकी पत्नी की भी आरती उतारें। बुधवार की दोपहर को पत्नी पीडि़त दोस्तों के साथ बैठकर 'बेवफा बीवीÓ कहानी का पाठ करें। पाठ की समाप्ति कर सब मिलकर दो-दो पैग दारू का प्रसाद ग्रहण करें।
वृश्चिक :- आप गल्ती से मनुष्यों में पैदा हो गये हैं। इस सच्चाई को शीघ्र से शीघ्र स्वीकार करें और मोहल्ले के कुत्तों की सोहबत करें। उनकी चाल-ढाल, बोलचाल, आचार-विचार और चरित्र का अध्ययन करें। एक पैर उठाकर आवश्यक कार्य निपटायें। भोजन करते समय हाथों का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। कोशिश करें तो लेटकर भी सुगमता से खाना सीख जायेंगे। आधी रात को उठकर मोहल्ले के कुत्तों के सुर में सुर मिलाने का अभ्यास करें। इसे उस दिन सफल मानें, जिस दिन कोई कुतिया आपकी आवाज से मुतस्सर होकर खिंची चली आये। चार पहिया वाहनों से सावधान रहें।
कुम्भ :- आपके पंचतत्वों, क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा में जल का तत्व गौण है। आंखों में तो कभी था ही नहीं। अर्थात आपमें राजनीति करने के पूरे लक्षण हैं। एकाध आपराधिक मुकदमे भी खुद पर चलवाने का प्रयास करें। आपके अंदर चूंकि जल का तत्व गायब है इसलिए आपको जल से परहेज रखना चाहिए। पानी तभी पियें जब प्यास लगे। नीट पानी तो हरगिज न पियें... उसमें रम, व्हिस्की या ठर्रा आदि पौष्टिक पेयों का अवश्य समावेश करें। स्नान करने की कतई न सोचें। आपके लिए एक चुल्लू ही काफी है। ऐसे में बाथरूम के भीतर कदम रखना आपके लिए हितकर नहीं है।
Monday, April 26, 2010
Saturday, April 24, 2010
चंद नये यातायात संकेत
अपना शहर जो दुर्भाग्य या सौभाग्य से ऐन बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। इस शहर में लोग चलने के लिए प्राय: दो विधियों का प्रयोग करते हैं। एक - सड़क और दूसरे - गढ्डे। सड़क और गढ्डों का वही संबंध है जो छायावादी कवियों ने चोली और दामन तय कर दिया है। इसलिए दोनों को एक- दूसरे से जुदा करने पर वही दफा लगती है, जो लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट, सलीम-अनारकली, हीर-रांझा आदि प्रागैतिहासिक प्रेमी युगलों के खिलाफ साजिश रचने वालों पर लगी थी। फिर भी जुदा नहीं किया जा सका। तो नगर निगम किस खेत की मूली है। इसलिए जनता जब ज्यादा शोर मचाती है तो कुछ सड़कों बनाने के लिए निगम तोड़ देता है। अर्थात निर्माण के लिए विध्वंस। एक डान को मारने के लिए दूसरे को पैदा करना ही पड़ता है। यही सृष्टि का भी नियम है।
खैर, बात हो रही थी शहर की, जो दुर्भाग्य या सौभाग्य बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। सवाल यह है कि शहर में लोग चलते कैसे हैं। जैसा मैंने ऊपर कहा कि शहर में चलने के लिए सर्वाधिक सुलभ साधन दो ही हैं- सड़क और गढ्डे। वो बात अलग है कि कुछ ज्ञान पिपासु अपनी जिज्ञासा शांत करने को मैनहोल या नाले का रुख भी कर लेते हैं।
कुछ शव के रूप में शहर को अपना अंतिम दर्शन देते हैं। बाकी इसकी जरूरत भी नहीं समझते और परिवार को मुआवजे के हवाले करके सीधे बैंकुठधाम की राह पकड़ लेते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनकी आत्मा को दुर्घटना मे मरने के बाद ही शांति मिलेगी। अत: वे वही रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। वैसे मरने के लिए बाढ़ और सूखा भी विकल्प हैं लेकिन काफी लोग इतना धैर्य नहीं रख पाते। आप ही बताइये कि जाड़े में मरने का मूड बनाने वाला व्यक्ति क्या अगली बरसात की राह देखेगा। वो भी भरोसा नहीं कि बरसात हो ही जाएगी।
हालांकि आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम हमारी पुलिस भी करती है लेकिन लोगों का उस पर विश्वास नहीं। फर्जी एनकाउंटर भले थम गए हों लेकिन 'अपराधी' को मारने पर किसी युग में प्रतिबंध नहीं रहा है। आज भी नहीं है। लेकिन कुछ लोग पिछड़े के पिछड़े ही बने रहना चाहते हैं। पुलिस के हाथों मरने में उनकी नानी मरती है।
बहरहाल, मेरे कहने का लब्बो-लुआब ये है कि सांसारिक माया-मोह से छुटकारा पाने को शहर की सड़कें और गडढे भी कम भूमिका नहीं निभाते। मेरे एक परिचित का करीब तीस वर्ष का अनुभव है नगर निगम का। वह उसके कर्मचारी नहीं हैं लेकिन मुकदमा लड़ते- लड़ते कानून और नियमों के पक्के जानकार हो गए हैं। उनका कहना है कि नगम के संविधान में सड़कों का प्रावधान तो है लेकिन गढ्डों का नहीं। शायद संविधान लिखने वालों ने गढ्डों की कल्पना नहीं की होगी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में कोई गढ्डा प्रधान युग आएगा, जिसमें शहर, मोहल्ला और सड़क क्या.. पूरे के पूरे देश को ही समा लेने की क्षमता होगी।
हमारे - आपके सौभाग्य से ये वहीं युग है। सड़क से लेकर विधानसभा तक गढ्डे ही गढ्डे हैं। अलग- अलग साइज और प्रकृत्ति के। शहर में यातायात भी सदा सुहागन है। गढ्डों के आसपास मौजूद सड़क के किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, इसके लिए यातायात विभाग और थाना-चौकी भी हैं। इसके अलावा काफी अरसे से महसूस किया जा रहा था कि सड़कों और चौराहों पर जो यातायात संकेत के बोर्ड लगाए जाते हैं, वे शहर की फितरत से मेल नहीं खाते। इस शहर को ऐसे संकेतों की आवश्यकता है, जिसके लोग अभ्यस्त हैं। विभाग की सुविधा के लिए परिस्थितयों का उल्लेख मैं कर देता हूं। उनके लिए संकेत यातायात विभाग तय कर ले।
मुलाहिजा हो :-
* चौराहे पर पुलिस की जगह गाय बैठी है। कृपया उसके गोबर को क्षति पहुंचाये बिना सड़क पार करें।
* स्ट्रीट लाइट खराब है। लेकिन खंभे में करंट आता है। सावधान रहें।
* अगले मोड़ पर पिस्तौल- चाकू से लैस दो कार्यकर्ता लैस मिल सकते हैं। अपना भला- बुरा आप खुद सोच लें।
* सिपाही जी की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए ट्रक वालों से निवेदन है कि खुले पैसे लेकर चाय की दुकान पर आ जाएं।
* चौराहे पर कुत्तों के वर्चस्व की जंग जारी है। और, अस्पताल में रैबीज के इंजेक्शन नहीं हैं।
* यहां उत्तम किस्म की नकली दारू हर समय मिलती है। चुनाव, रैलियों या विशेष अवसरों पर आर्डर देकर सप्लाई की व्यवस्था है।
* आगे जाम लगा है। तुरंत पीछे लौट जाएं वरना फिर पलट भी न सकेंगे।
* इस रोड पर विधायक निधि से अतिक्रमण किया गया है। उसे घूरें नहीं।
खैर, बात हो रही थी शहर की, जो दुर्भाग्य या सौभाग्य बिहार की राजधानी के पड़ोस में है। सवाल यह है कि शहर में लोग चलते कैसे हैं। जैसा मैंने ऊपर कहा कि शहर में चलने के लिए सर्वाधिक सुलभ साधन दो ही हैं- सड़क और गढ्डे। वो बात अलग है कि कुछ ज्ञान पिपासु अपनी जिज्ञासा शांत करने को मैनहोल या नाले का रुख भी कर लेते हैं।
कुछ शव के रूप में शहर को अपना अंतिम दर्शन देते हैं। बाकी इसकी जरूरत भी नहीं समझते और परिवार को मुआवजे के हवाले करके सीधे बैंकुठधाम की राह पकड़ लेते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनकी आत्मा को दुर्घटना मे मरने के बाद ही शांति मिलेगी। अत: वे वही रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। वैसे मरने के लिए बाढ़ और सूखा भी विकल्प हैं लेकिन काफी लोग इतना धैर्य नहीं रख पाते। आप ही बताइये कि जाड़े में मरने का मूड बनाने वाला व्यक्ति क्या अगली बरसात की राह देखेगा। वो भी भरोसा नहीं कि बरसात हो ही जाएगी।
हालांकि आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम हमारी पुलिस भी करती है लेकिन लोगों का उस पर विश्वास नहीं। फर्जी एनकाउंटर भले थम गए हों लेकिन 'अपराधी' को मारने पर किसी युग में प्रतिबंध नहीं रहा है। आज भी नहीं है। लेकिन कुछ लोग पिछड़े के पिछड़े ही बने रहना चाहते हैं। पुलिस के हाथों मरने में उनकी नानी मरती है।
बहरहाल, मेरे कहने का लब्बो-लुआब ये है कि सांसारिक माया-मोह से छुटकारा पाने को शहर की सड़कें और गडढे भी कम भूमिका नहीं निभाते। मेरे एक परिचित का करीब तीस वर्ष का अनुभव है नगर निगम का। वह उसके कर्मचारी नहीं हैं लेकिन मुकदमा लड़ते- लड़ते कानून और नियमों के पक्के जानकार हो गए हैं। उनका कहना है कि नगम के संविधान में सड़कों का प्रावधान तो है लेकिन गढ्डों का नहीं। शायद संविधान लिखने वालों ने गढ्डों की कल्पना नहीं की होगी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में कोई गढ्डा प्रधान युग आएगा, जिसमें शहर, मोहल्ला और सड़क क्या.. पूरे के पूरे देश को ही समा लेने की क्षमता होगी।
हमारे - आपके सौभाग्य से ये वहीं युग है। सड़क से लेकर विधानसभा तक गढ्डे ही गढ्डे हैं। अलग- अलग साइज और प्रकृत्ति के। शहर में यातायात भी सदा सुहागन है। गढ्डों के आसपास मौजूद सड़क के किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, इसके लिए यातायात विभाग और थाना-चौकी भी हैं। इसके अलावा काफी अरसे से महसूस किया जा रहा था कि सड़कों और चौराहों पर जो यातायात संकेत के बोर्ड लगाए जाते हैं, वे शहर की फितरत से मेल नहीं खाते। इस शहर को ऐसे संकेतों की आवश्यकता है, जिसके लोग अभ्यस्त हैं। विभाग की सुविधा के लिए परिस्थितयों का उल्लेख मैं कर देता हूं। उनके लिए संकेत यातायात विभाग तय कर ले।
मुलाहिजा हो :-
* चौराहे पर पुलिस की जगह गाय बैठी है। कृपया उसके गोबर को क्षति पहुंचाये बिना सड़क पार करें।
* स्ट्रीट लाइट खराब है। लेकिन खंभे में करंट आता है। सावधान रहें।
* अगले मोड़ पर पिस्तौल- चाकू से लैस दो कार्यकर्ता लैस मिल सकते हैं। अपना भला- बुरा आप खुद सोच लें।
* सिपाही जी की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए ट्रक वालों से निवेदन है कि खुले पैसे लेकर चाय की दुकान पर आ जाएं।
* चौराहे पर कुत्तों के वर्चस्व की जंग जारी है। और, अस्पताल में रैबीज के इंजेक्शन नहीं हैं।
* यहां उत्तम किस्म की नकली दारू हर समय मिलती है। चुनाव, रैलियों या विशेष अवसरों पर आर्डर देकर सप्लाई की व्यवस्था है।
* आगे जाम लगा है। तुरंत पीछे लौट जाएं वरना फिर पलट भी न सकेंगे।
* इस रोड पर विधायक निधि से अतिक्रमण किया गया है। उसे घूरें नहीं।
Wednesday, April 21, 2010
जलजमाव - गंदगी पर उच्च स्तरीय वैज्ञानिक विश्लेषण
शहर की गंदगी अब एक तरह से ब्रांड बन चुकी है। चैनल वाले उसे इतने ऐंगल से घुमा- घुमाकर दिखा चुके हैं कि अब गंदगी का सारा ग्लैमर खत्म हो चुका है। इतने मनोयोग से शायद फैशन परेड का कवरेज भी नहीं करते होंगे। खैर, इधर सुनने में आया है कि गंदगी से अब सरकार, विपक्ष, अधिकारी और पीडि़तों से लेकर नॉन पीडि़तों तक के सब्र का पैमाना भर चुका है। यही नहीं बरसों पूर्व स्वर्गीय हो चुके स्वनामधन्य वैज्ञानिक भी इस गंदगी से चिंतित हैं।
पिछले दिनों इन वैज्ञानिकों की आत्माओं का एक अखिल ब्रह्मांड सम्मेलन अंतरिक्ष के गांधी मैदान में हुआ। सम्मेलन में मुजफ्फरपुर की गंदगी, अतिक्रमण, वसूली, बिजली, पानी, कूड़ा- कचरा, जलजमाव, अस्पताल आदि समस्याओं पर भी विचार किया गया। चूंकि ये विश्लेषण चोटी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, इसलिए इसे 'चोटी का वैज्ञानिक विश्लेषण' नाम दिया गया।
महान वैज्ञानिक आइंसटीन का मानना था कि मई के महीने में साढ़े तीन सौ प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के उल्कापिंड धरती पर अस्सी डिग्री देशांतर से दशमलव पंद्रह मिलीमीटर ईस्ट में गिरते हैं। ये जगह ठीक वहां है, जहां अघोरिया बाजार का नाला गिरता है। लेकिन दिखता नहीं क्योंकि उस पर अतिक्रमण किया गया है। अत: जब तक तीन अरब साल से जारी उल्कापिंडों की इस बारिश को कर्क रेखा से पौने पांच सौ वर्ग माइक्रोमीटर देशांतर में शिफ्ट नहीं किया जाएगा, तब तक कल्याणी चौक के जाम की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
ये सुनकर आर्कमिडीज की आत्मा को क्रोध आ गया। वह बिगड़कर बोली- 'जलजमाव का मुझसे ज्यादा तजुर्बा है आपको। मैं तो डिक्लेयर्ड साइंटिस्ट ही वहीं हुआ।' खैर, दादा आर्कमिडीज ने जो फार्मूला बताया, उसके अनुसार जलजमाव प्रभावित क्षेत्रों की टोटल गंदगी को नालों की सिल्ट में जोड़ने के बाद उसमें नगर निगम के कुल कर्मचारियों की संख्या का गुणा करने पर जो संख्या ज्ञात होगी, उसमें अघोरिया बाजार के आयतन का भाग दे दें। इस भागफल और भारत के अंतरिक्ष भाग्यफल में जो अनुपात है, उससे क्षेत्र की कुल गंदगी का पता लगाया जा सकता है। और तब ही इसका समाधान हो सकता है।
गुरुत्वाकर्षण के नियम यदि न्यूटन ने खुद न बनाये होते तो इस वक्त वहां दरोगा जी फौजदारी का मुकदमा लिख रहे होते। बात ही कुछ ऐसी कही थी आर्कमिडीज ने, जिसे सुनकर न्यूटन का खून खौलने की इजाजत मांगने लगा। आर्कमिडीज का फार्मूला उन्होंने सुना। एकदम असहमत थे उससे। उनके हिसाब से भारत का अंतरिक्ष भाग्यफल और अघोरिया बाजार की गंदगी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सर आइजक का मानना था कि ये सब क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप है। यदि अघोरिया बाजार को उसी तरह पलटा जा सकता, जिस तरह पैजामा सीधा करके पहना जाता है तो निश्चित रूप से वहां पांच अरब साल ईसा पूर्व हुए जलजमाव के निशान मिल जाएंगे। वर्तमान संकट तो तत्कालीन दमन की प्रतिक्रिया भर है। हालांकि दुनिया को गति के नियमों से परिचित कराने वाला महान वैज्ञानिक इस बात पर अवश्य हैरान था कि नगर निगम के कार्य की गति कौन से नियम से प्रतिपादित होती है।
इसके बाद सम्मेलन में गैलीलियो, राबर्ट बंधु, मार्कोनी, ग्राहम बेल, वगैरह- वगैरह ने भी अपने- अपने शोधपत्र पढ़े। जिनसे निष्कर्ष निकला कि जब तक शहर के आपेक्षिक घनत्व और नगर निगम की आद्रता की रासायनिक प्रतिक्रिया होती रहेगी, तब तक इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। मुख्यमंत्री कर लें तो भले कर लें।
पिछले दिनों इन वैज्ञानिकों की आत्माओं का एक अखिल ब्रह्मांड सम्मेलन अंतरिक्ष के गांधी मैदान में हुआ। सम्मेलन में मुजफ्फरपुर की गंदगी, अतिक्रमण, वसूली, बिजली, पानी, कूड़ा- कचरा, जलजमाव, अस्पताल आदि समस्याओं पर भी विचार किया गया। चूंकि ये विश्लेषण चोटी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, इसलिए इसे 'चोटी का वैज्ञानिक विश्लेषण' नाम दिया गया।
महान वैज्ञानिक आइंसटीन का मानना था कि मई के महीने में साढ़े तीन सौ प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के उल्कापिंड धरती पर अस्सी डिग्री देशांतर से दशमलव पंद्रह मिलीमीटर ईस्ट में गिरते हैं। ये जगह ठीक वहां है, जहां अघोरिया बाजार का नाला गिरता है। लेकिन दिखता नहीं क्योंकि उस पर अतिक्रमण किया गया है। अत: जब तक तीन अरब साल से जारी उल्कापिंडों की इस बारिश को कर्क रेखा से पौने पांच सौ वर्ग माइक्रोमीटर देशांतर में शिफ्ट नहीं किया जाएगा, तब तक कल्याणी चौक के जाम की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
ये सुनकर आर्कमिडीज की आत्मा को क्रोध आ गया। वह बिगड़कर बोली- 'जलजमाव का मुझसे ज्यादा तजुर्बा है आपको। मैं तो डिक्लेयर्ड साइंटिस्ट ही वहीं हुआ।' खैर, दादा आर्कमिडीज ने जो फार्मूला बताया, उसके अनुसार जलजमाव प्रभावित क्षेत्रों की टोटल गंदगी को नालों की सिल्ट में जोड़ने के बाद उसमें नगर निगम के कुल कर्मचारियों की संख्या का गुणा करने पर जो संख्या ज्ञात होगी, उसमें अघोरिया बाजार के आयतन का भाग दे दें। इस भागफल और भारत के अंतरिक्ष भाग्यफल में जो अनुपात है, उससे क्षेत्र की कुल गंदगी का पता लगाया जा सकता है। और तब ही इसका समाधान हो सकता है।
गुरुत्वाकर्षण के नियम यदि न्यूटन ने खुद न बनाये होते तो इस वक्त वहां दरोगा जी फौजदारी का मुकदमा लिख रहे होते। बात ही कुछ ऐसी कही थी आर्कमिडीज ने, जिसे सुनकर न्यूटन का खून खौलने की इजाजत मांगने लगा। आर्कमिडीज का फार्मूला उन्होंने सुना। एकदम असहमत थे उससे। उनके हिसाब से भारत का अंतरिक्ष भाग्यफल और अघोरिया बाजार की गंदगी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सर आइजक का मानना था कि ये सब क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप है। यदि अघोरिया बाजार को उसी तरह पलटा जा सकता, जिस तरह पैजामा सीधा करके पहना जाता है तो निश्चित रूप से वहां पांच अरब साल ईसा पूर्व हुए जलजमाव के निशान मिल जाएंगे। वर्तमान संकट तो तत्कालीन दमन की प्रतिक्रिया भर है। हालांकि दुनिया को गति के नियमों से परिचित कराने वाला महान वैज्ञानिक इस बात पर अवश्य हैरान था कि नगर निगम के कार्य की गति कौन से नियम से प्रतिपादित होती है।
इसके बाद सम्मेलन में गैलीलियो, राबर्ट बंधु, मार्कोनी, ग्राहम बेल, वगैरह- वगैरह ने भी अपने- अपने शोधपत्र पढ़े। जिनसे निष्कर्ष निकला कि जब तक शहर के आपेक्षिक घनत्व और नगर निगम की आद्रता की रासायनिक प्रतिक्रिया होती रहेगी, तब तक इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। मुख्यमंत्री कर लें तो भले कर लें।
Tuesday, April 20, 2010
थूक का महात्म्य
'थूक' एक प्रकृति प्रदत्त पदार्थ है और थूकना मनुष्य प्रदत्त आदत। 'थूक' का उत्पादन मनुष्यों और पशुओं दोनों प्राणियों में समान रूप से होता है। अभी ये तय नहीं हो सका है कि 'लार गिरना', 'थूक कर चाटना', 'थू-थू करना' या करवाना जैसे मुहावरे मनुष्यों की वजह से गढ़े गए या पशुओं की वजह से।
खैर, उत्पादन भले पशुओं में भी होता हो लेकिन इसका सर्वाधिक वितरण सर्वाधिक मनुष्यों में ही होता है। कुछ लोग इसका वितरण किए बिना बात तक नहीं कर पाते। इनके सामने खड़ा व्यक्ति या तो बार-बार अपना चेहरा रूमाल से पोंछता रहता है या फिर सामने वाले के जोरदार झापड़ रसीद कर देता है।
मुहावरे की दृष्टि से ये प्रक्रिया 'मुंह पर थूकना' की श्रेणी में आती है। लेकिन मुहावरे में चूंकि मुंह पर पड़ने वाले छींटों की मात्रा तय नहीं की गयी है, इसलिए ये प्रक्रिया आज तक गुमनामी की जिंदगी जी रही है। 'थूककर चाटना' एक अन्य मुहावरा है। इस मुहावरे में चूंकि पदार्थ का स्वाद स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे स्वांत: सुखाय की श्रेणी में मान लिया गया है।
राजनीति में थूककर चाटने वालों का सबसे ज्यादा महत्व है। बल्कि यूं कहें कि केवल राजनीति ही ऐसा क्षेत्र है, जहां थूकने और फिर चाटने की पूरी आजादी है। इसका प्रमाण है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल को थूकने या चाटने के लिए गठबंधन करते नहीं देखा गया। इसके लिए पूरी स्वतंत्रता दी गई है। आदमी कहीं भी कुल्ला भर- भरके थूक सकता है और विकास में अपना हाथ बंटा सकता है। सच कहा जाए तो राजनीति में थूकने और चाटने की असीम संभावनाएं हैं। मैनेजमेंट की भाषा में कहा जाए तो कामयाबी पाने की महत्वपूर्ण टिप।
बिहार एक खैनी प्रधान प्रदेश है। खैनी और थूक का चोली-दामन का साथ है। दूसरे शब्दों में खैनी को थूक फैक्ट्री का रा-मैटेरियल भी कहा जा सकता है। यदि मान लिया जाए कि सूबे में प्रतिदिन तीन मीट्रिक टन खैनी की खपत है तो निश्चित मानिये कि थूक का उत्पादन भी इससे कम कतई नहीं होगा। अब यदि राष्ट्रीय औसत निकाला जाए तो बिहार थूक उत्पादन में अग्रणी राज्यों में होगा।
लेकिन अफसोस कि तमाम खनिज संपदा की तरह ये संपदा भी समुचित योजनाओं के अभाव में बर्बाद हो रही है। सैकड़ों क्विंटल थूक चौराहों, गलियों, सरकारी कार्यालयों के कोनों, दीवारों, डस्टबिनों आदि में बर्बाद कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे प्रदेश का सैकड़ों टन थूक दूसरे प्रदेशों की धरती सींच रहा है। ये अपने संसाधनों की बर्बादी नहीं तो क्या है।
हर व्यक्ति को कहीं भी थूकने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे उन राज्यों या विदेशी सरकारों से सख्त नफरत है, जो थूकने पर जुर्माना वसूल लेती हैं। यह प्राकृतिक संपदा का अपमान ही नहीं, हमारी बरसों पुरानी आदत का दमन भी है। लेकिन खुशी की बात है कि हमारे प्रदेश में थूकने की पूरी आजादी है। कहीं भी थूक सकते हैं लेकिन इसके लिए सबसे माकूल जगह सड़क मानी गई है। .. क्योंकि वह अपनी जागीर होती है। उसे तोडि़ये, खोदिये, अतिक्रमण कीजिए, थूक की नदियां बहा दीजिए या कितना भी अत्याचार कीजिए, वह बेचारी चूं तक नहीं करती।
हां, सड़क पर थूकने वाले कभी- कभी गलतफहमियां अवश्य पैदा कर देते हैं। कुछ लोग इस डिजायन से थूकते हैं कि खड़े होकर देखने पर गिलट का रुपया लगता है। इस चक्कर में बाद में अपने हाथ चुपचाप पैंट से पोंछते नजर आते हैं। मेरे एक पड़ोसी को थूकने के बाद कुछ देर निहारने की आदत थी। पता नहीं वह उसमें क्या तलाशते थे जो उन्हें पूरे जीवन नहीं मिला और एक दिन अचानक उसी थूक को निहारते- निहारते उनकी आत्मा उसी में समाहित हो गई।
एक बात और। लहू का रंग भले एक होता हो लेकिन थूक का नहीं। काल-परिस्थिति और आदतों के अनुसार यह बदलता रहता है। जैसे तंबाकू खाने वाले व्यक्ति से आप दूध जैसे उजले थूक की कल्पना नहीं कर सकते। इसी विधि से लाल, हरे, नीले, चितकबरे, सिल्की सिल्वर, मून लाइट, गोल्डन सिल्वर आदि रंगों का थूक देखकर आप उसके जनक के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। गनीमत है कि भविष्यवक्ताओं तक अभी ये आइडिया नहीं पहुंचा है। वरना हर पैथेलाजी लैब में एक ज्योतिषी भी बैठा नजर आने लगेगा।
लार को थूक की छोटी बहन कहा जा सकता है। जो अक्सर दूसरों की सुख-समृद्धि देखकर खुद-ब-खुद चू जाती है। खैर, बात थूक की चल रही थी। इसी थूक की वजह से कई बार प्रदेश मुसीबतों में पड़ते-पड़ते बचा है। घटना छठ के आसपास की है। एक नेता जी ने गंगा भ्रमण के दौरान उसमें थूक दिया। गंगा मैया को थूक अर्पण की इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई। किसी ने थूक का बदला थूक से लेने की प्रतिज्ञा कर डाली। तो कोई नेता जी के थूक के कतरे गंगा जी से ढुंढवाकर उसका डीएनए टेस्ट करवाने पर अड़ गया। जिनकी समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने गंगा जी की ओर मुंह करके जोरदार प्रणाम किया और जोर से खंखारकर वहंीं रेत पर थूक दिया। ताकि सनद रहे और आने वाली बरसात में रेत में सूख चुका थूक नदी के पानी में मिलकर अमृत बन जाए। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जितनी विधियो हो सकती थीं, सब अपना ली गई।
कहने का मतलब सब हुआ लेकिन बेचारी गंगा मैया के विचार जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। मैली गंगा का उलाहना तो सभी देते हैं किंतु अपने हिस्से की गंदगी को उसमें बहाने से गुरेज नहीं करते। कहते हैं कि गंगाजल में मिलकर हर चीज पूज्य और पवित्र हो जाती है। अत: भविष्य में यदि वैज्ञानिकों के हाथ नेता जी के थूक के अवशेष लग जाएं तो उसे पवित्र मानकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवा दी जाए। मगर इस मुद्दे पर एक- दूसरे की थू-थू से बिल्कुल तोबा कर ली जाए। थोड़ा कहे को ज्यादा समझिएगा। नो स्पिटिंग प्लीज!
खैर, उत्पादन भले पशुओं में भी होता हो लेकिन इसका सर्वाधिक वितरण सर्वाधिक मनुष्यों में ही होता है। कुछ लोग इसका वितरण किए बिना बात तक नहीं कर पाते। इनके सामने खड़ा व्यक्ति या तो बार-बार अपना चेहरा रूमाल से पोंछता रहता है या फिर सामने वाले के जोरदार झापड़ रसीद कर देता है।
मुहावरे की दृष्टि से ये प्रक्रिया 'मुंह पर थूकना' की श्रेणी में आती है। लेकिन मुहावरे में चूंकि मुंह पर पड़ने वाले छींटों की मात्रा तय नहीं की गयी है, इसलिए ये प्रक्रिया आज तक गुमनामी की जिंदगी जी रही है। 'थूककर चाटना' एक अन्य मुहावरा है। इस मुहावरे में चूंकि पदार्थ का स्वाद स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे स्वांत: सुखाय की श्रेणी में मान लिया गया है।
राजनीति में थूककर चाटने वालों का सबसे ज्यादा महत्व है। बल्कि यूं कहें कि केवल राजनीति ही ऐसा क्षेत्र है, जहां थूकने और फिर चाटने की पूरी आजादी है। इसका प्रमाण है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल को थूकने या चाटने के लिए गठबंधन करते नहीं देखा गया। इसके लिए पूरी स्वतंत्रता दी गई है। आदमी कहीं भी कुल्ला भर- भरके थूक सकता है और विकास में अपना हाथ बंटा सकता है। सच कहा जाए तो राजनीति में थूकने और चाटने की असीम संभावनाएं हैं। मैनेजमेंट की भाषा में कहा जाए तो कामयाबी पाने की महत्वपूर्ण टिप।
बिहार एक खैनी प्रधान प्रदेश है। खैनी और थूक का चोली-दामन का साथ है। दूसरे शब्दों में खैनी को थूक फैक्ट्री का रा-मैटेरियल भी कहा जा सकता है। यदि मान लिया जाए कि सूबे में प्रतिदिन तीन मीट्रिक टन खैनी की खपत है तो निश्चित मानिये कि थूक का उत्पादन भी इससे कम कतई नहीं होगा। अब यदि राष्ट्रीय औसत निकाला जाए तो बिहार थूक उत्पादन में अग्रणी राज्यों में होगा।
लेकिन अफसोस कि तमाम खनिज संपदा की तरह ये संपदा भी समुचित योजनाओं के अभाव में बर्बाद हो रही है। सैकड़ों क्विंटल थूक चौराहों, गलियों, सरकारी कार्यालयों के कोनों, दीवारों, डस्टबिनों आदि में बर्बाद कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे प्रदेश का सैकड़ों टन थूक दूसरे प्रदेशों की धरती सींच रहा है। ये अपने संसाधनों की बर्बादी नहीं तो क्या है।
हर व्यक्ति को कहीं भी थूकने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे उन राज्यों या विदेशी सरकारों से सख्त नफरत है, जो थूकने पर जुर्माना वसूल लेती हैं। यह प्राकृतिक संपदा का अपमान ही नहीं, हमारी बरसों पुरानी आदत का दमन भी है। लेकिन खुशी की बात है कि हमारे प्रदेश में थूकने की पूरी आजादी है। कहीं भी थूक सकते हैं लेकिन इसके लिए सबसे माकूल जगह सड़क मानी गई है। .. क्योंकि वह अपनी जागीर होती है। उसे तोडि़ये, खोदिये, अतिक्रमण कीजिए, थूक की नदियां बहा दीजिए या कितना भी अत्याचार कीजिए, वह बेचारी चूं तक नहीं करती।
हां, सड़क पर थूकने वाले कभी- कभी गलतफहमियां अवश्य पैदा कर देते हैं। कुछ लोग इस डिजायन से थूकते हैं कि खड़े होकर देखने पर गिलट का रुपया लगता है। इस चक्कर में बाद में अपने हाथ चुपचाप पैंट से पोंछते नजर आते हैं। मेरे एक पड़ोसी को थूकने के बाद कुछ देर निहारने की आदत थी। पता नहीं वह उसमें क्या तलाशते थे जो उन्हें पूरे जीवन नहीं मिला और एक दिन अचानक उसी थूक को निहारते- निहारते उनकी आत्मा उसी में समाहित हो गई।
एक बात और। लहू का रंग भले एक होता हो लेकिन थूक का नहीं। काल-परिस्थिति और आदतों के अनुसार यह बदलता रहता है। जैसे तंबाकू खाने वाले व्यक्ति से आप दूध जैसे उजले थूक की कल्पना नहीं कर सकते। इसी विधि से लाल, हरे, नीले, चितकबरे, सिल्की सिल्वर, मून लाइट, गोल्डन सिल्वर आदि रंगों का थूक देखकर आप उसके जनक के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। गनीमत है कि भविष्यवक्ताओं तक अभी ये आइडिया नहीं पहुंचा है। वरना हर पैथेलाजी लैब में एक ज्योतिषी भी बैठा नजर आने लगेगा।
लार को थूक की छोटी बहन कहा जा सकता है। जो अक्सर दूसरों की सुख-समृद्धि देखकर खुद-ब-खुद चू जाती है। खैर, बात थूक की चल रही थी। इसी थूक की वजह से कई बार प्रदेश मुसीबतों में पड़ते-पड़ते बचा है। घटना छठ के आसपास की है। एक नेता जी ने गंगा भ्रमण के दौरान उसमें थूक दिया। गंगा मैया को थूक अर्पण की इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई। किसी ने थूक का बदला थूक से लेने की प्रतिज्ञा कर डाली। तो कोई नेता जी के थूक के कतरे गंगा जी से ढुंढवाकर उसका डीएनए टेस्ट करवाने पर अड़ गया। जिनकी समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने गंगा जी की ओर मुंह करके जोरदार प्रणाम किया और जोर से खंखारकर वहंीं रेत पर थूक दिया। ताकि सनद रहे और आने वाली बरसात में रेत में सूख चुका थूक नदी के पानी में मिलकर अमृत बन जाए। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जितनी विधियो हो सकती थीं, सब अपना ली गई।
कहने का मतलब सब हुआ लेकिन बेचारी गंगा मैया के विचार जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। मैली गंगा का उलाहना तो सभी देते हैं किंतु अपने हिस्से की गंदगी को उसमें बहाने से गुरेज नहीं करते। कहते हैं कि गंगाजल में मिलकर हर चीज पूज्य और पवित्र हो जाती है। अत: भविष्य में यदि वैज्ञानिकों के हाथ नेता जी के थूक के अवशेष लग जाएं तो उसे पवित्र मानकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवा दी जाए। मगर इस मुद्दे पर एक- दूसरे की थू-थू से बिल्कुल तोबा कर ली जाए। थोड़ा कहे को ज्यादा समझिएगा। नो स्पिटिंग प्लीज!
Monday, April 19, 2010
हाय आलू! हाय भंटा! हाय परवल! हाय मूली!
पहले ऐसा माना जाता था कि सब्जी खाना स्वास्थ्यवर्धक होता है लेकिन आजकल ऐसा महसूस हो रहा है कि सब्जी खाना समृद्धता की निशानी है। पिछले दिनों मैं गल्ती से सब्जीमंडी चला गया। वहां सब्जियों के भाव सुनकर गश आते- आते बचा। आलू से लेकर पिद्दी भर का कद्दू तक ऐंठा बैठा था.. जैसे शेयर मार्केट का सारा कारोबार इन्हीं के भरोसे है। दलाल स्ट्रीट में बैठे दलालों पर अफसोस भी हुआ। आज तक एक भी सब्जी को लिस्टेड क्यों नहीं किया गया। शायद लोग भूल गये कि मामूली सा प्याज तक इस देश की सरकार बदल चुका है। खैर!
ऐसा नहीं है कि मेरे परिवार में सब्जी खाने का रिवाज नहीं है। सो तो जानने वाले जानते हैं कि मैं खाते-पीते, पहनते-ओढ़ते खानदान को बिलांग करता हूं। इतिहास गवाह है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय भी मेरे पूर्वजों ने अंग्रेजों से ज्यादा विरोध उड़द की दाल और जिमिकंद की सब्जी का किया था। क्योंकि, दोनों चीजें कब्जावर हैं। गैस बहुत बनाती हैं। गैस्ट्रिक के मरीज जानते हैं कि गैस कितनी लज्जाहीन परेशानी है। खुद को भी परेशान करती है और बगल में बैठे व्यक्ति को भी। मेरे विचार से दुनिया में संभवत: गैस ही ऐसी एकमात्र बीमारी है, जो मरीज के साथ उसके तीमारदारों और वातवरण को भी प्रभावित करती है।
बहरहाल मेरे खानदान में सब्जी खाने का इतिहास काफी पुराना है.. पाषाणकालीन सभ्यता से भी पुराना। प्रमाण यह कि मैं तकरीबन सारी सब्जियां पहचानता हूं। मगर इधर पता नहीं कौन सा शनि मेरे मंगल में प्रवेश कर गया कि अमंगल ही अमंगल हो गया। सब्जियां खाना तो दूर, इधर मैं उन्हें देखने तक को तरस गया हूं। पिछले हफ्ते मैंने डरते- डरते अपनी शरीक-ए-हयात से पूछा- 'क्यों जी! आजकल क्या कोई ऐसा व्रत चल रहा है, जिसमें सब्जी खाना मना होता है। सच पूरे पंद्रह दिन हो गये.. मैंने निनुआ का छिल्का तक नहीं देखा।'
बस मेरा यह कहना था कि वह सड़े हुए कुम्हड़े जैसी फट पड़ीं- 'दिमाग सटक गया है या स्पीडी ट्रायल के चक्कर में जल्दी सठिया गये हो। चले हो प्रिंस आफ वेल्स बनने। कुछ पता भी है। सब्जियों में आग लगी हुई है। फायर ब्रिगेड वाले शहरों, कस्बों की ही आगें बुझाने में हांफ रहे हैं.. यहां तो भगवान भी मालिक बनने को तैयार नहीं।' ये सुनकर मेरे अंर्तमन ने मुझे कांपने की आज्ञा दी लेकिन बिना वास्तविकता जांचे कांपना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ था। इसलिए तुरंत झोला उठाया और चला आया सब्जीमंडी। अब आगे की कथा जरा दिल थामकर।
पूरी मंडी में एक अलग किस्म की दहशत व्याप्त थी। हर सब्जी के आगे टैग लगा हुआ था, जिस पर उसका मूल्य अंकित था। बस हाल मार्क की कमी थी वरना सब्जियों और सोने के तेवरों में कोई फर्क नहीं था। ग्राहक सहमे हुए थे। दिल के मरीजों की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। पता नहीं किस सब्जी का भाव सुनकर दौरा पड़ जाये।
कटहल, मटर, मशरूम और शिमला मिर्च जैसी चीजें ब्लैक कैट कमांडो की कड़ी सुरक्षा में थीं। इन्हें छूना तो दरकिनार देखना भी आसान न था। उसके लिये सचिवालय से पास बनवाना पड़ता था। मंडी में रह- रहकर सूचना प्रसारित की जा रही थी कि आफ सीजन सब्जी खरीदने लोगों के लिए पैन संख्या का उल्लेख करना आवश्यक है।
मैंने एक दुकानदार से डरते- डरते आलू का भाव पूछा। उसने ऐसे घूरा जैसे तसल्ली कर लेना चाहता हो कि औकात भी है आलू खरीदने की या खामखां टाइम खोटी करने चले आए। फिर कुछ सोचकर बोला- 'एक रुपए जोड़ा!' दाम सुनकर अपनी शरीक-ए-हयात का चेहरा याद आ गया, जिसके खाली हाथ लौटने पर और सुर्ख हो जाने का पूरा- पूरा खतरा था।
हिम्मत करके आगे पूछा- 'और भय्या.. भंटा क्या भाव?'
'पचास पैसे प्रति वर्ग इंच!'
'यार भंटा बेच रहे हो या अपार्टमेंट।' मैंने कह तो दिया लेकिन इससे पहले कि दुकानदार वीर रस में प्रवेश करे, आगे बढ़ गया।
अगले दुकानदार से कुछ कहने की जरूरत न पड़ी। उसे शायद लगा कि मैं सूचना कार्यालय से सूचना पाने के अधिकार के तहत सूचनाधिकारी की स्वीकृति लेकर उसे सूचित करने आ रहा हूं। इसलिए पास पहुंचते ही बिना कामा- फुल स्टॉप के चालू हो गया-
'ध्यान से नोट कर लीजिये। मैं एक बार में ही सारी सब्जियों के भाव बता देता हूं.. मूली दो रुपए प्रति सेंटीमीटर, परवल का छिल्का चार रुपए पाव, हरी धनिया एक रुपए की चार पत्ती, मिर्च एक रुपए जोड़ा, टमाटर, कुंदरू और भिंडी दो रुपए में दो मिनट दिखाये जाएंगे। अंडरस्टैंड.. हिंदी में कुछ समझे। अब आगे बढि़ये.. चलिये, दुकान के सीधे प्रसारण का समय हो रहा है। चैनल वाले आते ही होंगे।'
इसके बाद के शब्द मैं नहीं सुन सका और मंडी के बाहर निकल आया। बाहर जानवरों का हरा-हरा चार बिक रहा था। मन में एक स्वाभाविक उत्कंठा हुई कि जब जानवर मनुष्य का भोजन कर सकते हैं तो मनुष्य उनका क्यों नहीं। सिद्ध भी हो चुका है कि चारा कतई नुकसानदायक चीज नहीं है। उसे मनुष्य आसानी से पचा सकता है। वैसे भी आकार-प्रकार को अगर छोड़ दिया जाए तो सब्जियों और चारे की हरियाली में कोई फर्क नहीं होता।
चारा बेचने वाला मेरी ओर बड़ी हसरत से देख रहा था। पता नहीं हालत पर उसे रहम आ रहा था या वह बेवकूफ समझ रहा था कि घर में गाय-घोड़े बंधे होंगे। एक पल मैं चारे के सामने ठिठका फिर पूछा- 'ये क्या भाव है?'
दोस्तों! जवाब में दुकानदार केवल मुस्कुराया। हालांकि वह कह सकता था कि भाव जानकर क्या करोगे। आप तो ये बताओ.. यहीं खाओगे या घर ले जाओगे। लेकिन उसकी मुस्कुराहट में जो शब्द छिपे थे अगर वे आकार पाते तो शायद ये होते- मंहगाई कोसने की नहीं सोचने की चीज है। आखिर क्यों हर चीज का दाम आसमान छू रहा है। वजह साफ है। मांग ज्यादा, उत्पादन कम। ऊपर से प्राकृतिक आपदाएं। प्रदूषित पर्यावरण। इसलिए असंतुलन है। देखते जाइये.. अगर अब भी नहीं चेते तो एक दिन आप वाकई चारे का भाव पूछते नजर आएंगे।
और अंत में..
मुरारी के फ्रिज में शराब की खाली बोतलें देखकर उनके दोस्त ने पूछा- 'ये खाली बोतलों का क्या मतलब है?'
'ये मेरे उन मेहमानों के लिए हैं, जो नहीं पीते।' जवाब मिला।
ऐसा नहीं है कि मेरे परिवार में सब्जी खाने का रिवाज नहीं है। सो तो जानने वाले जानते हैं कि मैं खाते-पीते, पहनते-ओढ़ते खानदान को बिलांग करता हूं। इतिहास गवाह है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय भी मेरे पूर्वजों ने अंग्रेजों से ज्यादा विरोध उड़द की दाल और जिमिकंद की सब्जी का किया था। क्योंकि, दोनों चीजें कब्जावर हैं। गैस बहुत बनाती हैं। गैस्ट्रिक के मरीज जानते हैं कि गैस कितनी लज्जाहीन परेशानी है। खुद को भी परेशान करती है और बगल में बैठे व्यक्ति को भी। मेरे विचार से दुनिया में संभवत: गैस ही ऐसी एकमात्र बीमारी है, जो मरीज के साथ उसके तीमारदारों और वातवरण को भी प्रभावित करती है।
बहरहाल मेरे खानदान में सब्जी खाने का इतिहास काफी पुराना है.. पाषाणकालीन सभ्यता से भी पुराना। प्रमाण यह कि मैं तकरीबन सारी सब्जियां पहचानता हूं। मगर इधर पता नहीं कौन सा शनि मेरे मंगल में प्रवेश कर गया कि अमंगल ही अमंगल हो गया। सब्जियां खाना तो दूर, इधर मैं उन्हें देखने तक को तरस गया हूं। पिछले हफ्ते मैंने डरते- डरते अपनी शरीक-ए-हयात से पूछा- 'क्यों जी! आजकल क्या कोई ऐसा व्रत चल रहा है, जिसमें सब्जी खाना मना होता है। सच पूरे पंद्रह दिन हो गये.. मैंने निनुआ का छिल्का तक नहीं देखा।'
बस मेरा यह कहना था कि वह सड़े हुए कुम्हड़े जैसी फट पड़ीं- 'दिमाग सटक गया है या स्पीडी ट्रायल के चक्कर में जल्दी सठिया गये हो। चले हो प्रिंस आफ वेल्स बनने। कुछ पता भी है। सब्जियों में आग लगी हुई है। फायर ब्रिगेड वाले शहरों, कस्बों की ही आगें बुझाने में हांफ रहे हैं.. यहां तो भगवान भी मालिक बनने को तैयार नहीं।' ये सुनकर मेरे अंर्तमन ने मुझे कांपने की आज्ञा दी लेकिन बिना वास्तविकता जांचे कांपना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ था। इसलिए तुरंत झोला उठाया और चला आया सब्जीमंडी। अब आगे की कथा जरा दिल थामकर।
पूरी मंडी में एक अलग किस्म की दहशत व्याप्त थी। हर सब्जी के आगे टैग लगा हुआ था, जिस पर उसका मूल्य अंकित था। बस हाल मार्क की कमी थी वरना सब्जियों और सोने के तेवरों में कोई फर्क नहीं था। ग्राहक सहमे हुए थे। दिल के मरीजों की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। पता नहीं किस सब्जी का भाव सुनकर दौरा पड़ जाये।
कटहल, मटर, मशरूम और शिमला मिर्च जैसी चीजें ब्लैक कैट कमांडो की कड़ी सुरक्षा में थीं। इन्हें छूना तो दरकिनार देखना भी आसान न था। उसके लिये सचिवालय से पास बनवाना पड़ता था। मंडी में रह- रहकर सूचना प्रसारित की जा रही थी कि आफ सीजन सब्जी खरीदने लोगों के लिए पैन संख्या का उल्लेख करना आवश्यक है।
मैंने एक दुकानदार से डरते- डरते आलू का भाव पूछा। उसने ऐसे घूरा जैसे तसल्ली कर लेना चाहता हो कि औकात भी है आलू खरीदने की या खामखां टाइम खोटी करने चले आए। फिर कुछ सोचकर बोला- 'एक रुपए जोड़ा!' दाम सुनकर अपनी शरीक-ए-हयात का चेहरा याद आ गया, जिसके खाली हाथ लौटने पर और सुर्ख हो जाने का पूरा- पूरा खतरा था।
हिम्मत करके आगे पूछा- 'और भय्या.. भंटा क्या भाव?'
'पचास पैसे प्रति वर्ग इंच!'
'यार भंटा बेच रहे हो या अपार्टमेंट।' मैंने कह तो दिया लेकिन इससे पहले कि दुकानदार वीर रस में प्रवेश करे, आगे बढ़ गया।
अगले दुकानदार से कुछ कहने की जरूरत न पड़ी। उसे शायद लगा कि मैं सूचना कार्यालय से सूचना पाने के अधिकार के तहत सूचनाधिकारी की स्वीकृति लेकर उसे सूचित करने आ रहा हूं। इसलिए पास पहुंचते ही बिना कामा- फुल स्टॉप के चालू हो गया-
'ध्यान से नोट कर लीजिये। मैं एक बार में ही सारी सब्जियों के भाव बता देता हूं.. मूली दो रुपए प्रति सेंटीमीटर, परवल का छिल्का चार रुपए पाव, हरी धनिया एक रुपए की चार पत्ती, मिर्च एक रुपए जोड़ा, टमाटर, कुंदरू और भिंडी दो रुपए में दो मिनट दिखाये जाएंगे। अंडरस्टैंड.. हिंदी में कुछ समझे। अब आगे बढि़ये.. चलिये, दुकान के सीधे प्रसारण का समय हो रहा है। चैनल वाले आते ही होंगे।'
इसके बाद के शब्द मैं नहीं सुन सका और मंडी के बाहर निकल आया। बाहर जानवरों का हरा-हरा चार बिक रहा था। मन में एक स्वाभाविक उत्कंठा हुई कि जब जानवर मनुष्य का भोजन कर सकते हैं तो मनुष्य उनका क्यों नहीं। सिद्ध भी हो चुका है कि चारा कतई नुकसानदायक चीज नहीं है। उसे मनुष्य आसानी से पचा सकता है। वैसे भी आकार-प्रकार को अगर छोड़ दिया जाए तो सब्जियों और चारे की हरियाली में कोई फर्क नहीं होता।
चारा बेचने वाला मेरी ओर बड़ी हसरत से देख रहा था। पता नहीं हालत पर उसे रहम आ रहा था या वह बेवकूफ समझ रहा था कि घर में गाय-घोड़े बंधे होंगे। एक पल मैं चारे के सामने ठिठका फिर पूछा- 'ये क्या भाव है?'
दोस्तों! जवाब में दुकानदार केवल मुस्कुराया। हालांकि वह कह सकता था कि भाव जानकर क्या करोगे। आप तो ये बताओ.. यहीं खाओगे या घर ले जाओगे। लेकिन उसकी मुस्कुराहट में जो शब्द छिपे थे अगर वे आकार पाते तो शायद ये होते- मंहगाई कोसने की नहीं सोचने की चीज है। आखिर क्यों हर चीज का दाम आसमान छू रहा है। वजह साफ है। मांग ज्यादा, उत्पादन कम। ऊपर से प्राकृतिक आपदाएं। प्रदूषित पर्यावरण। इसलिए असंतुलन है। देखते जाइये.. अगर अब भी नहीं चेते तो एक दिन आप वाकई चारे का भाव पूछते नजर आएंगे।
और अंत में..
मुरारी के फ्रिज में शराब की खाली बोतलें देखकर उनके दोस्त ने पूछा- 'ये खाली बोतलों का क्या मतलब है?'
'ये मेरे उन मेहमानों के लिए हैं, जो नहीं पीते।' जवाब मिला।
Monday, April 12, 2010
मरने के बाद
मुझे एक झटका सा लगा। महसूस हुआ कि मैं जमीन छोड़ चुका हूं। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह हवाई यात्रा में महसूस होता है। जमीन छोड़ने और इस अहसास को महसूस करने के दरम्यान मैंने अच्छी भली ऊंचाई पकड़ ली। जैसे हवा का अनुकूल रुख होने पर पतंग खुद-ब-खुद अपनी ऊंचाई तलाश लेती है।
तभी दूसरा झटका लगा। ये देखकर कि मेरा शरीर गायब था। हैरत हुई कि जिस जिस्म को तेल, पानी, शैंपू और जूं देकर इतने बरसों तक पाला पोसा, वह अचानक दगा दे गया। मेरी हालत अजीब सी होनी शुरू होती। इसी बीच मुझे एक और अपने जैसा दिखा। वह मेरी ही ओर आ रहा था। पास आकर बोला- 'बधाई हो! आखिर तुम मर ही गये।'
अपने मरने का जिक्र सुनकर मैं चौंका। तो ये बात है। इसीलिए मेरा पांच फुट बाई तीस सेंटीमीटर का शरीर नदारद है। अब मैंने उसे ध्यान से देखा। वह भी मेरी ही तरह था यानी मरा हुआ। इसका मतलब! आगे कुछ मैं सोच पाता, उसके पहले ही वह बोला- 'पता है, तुम्हारे साथ मैं भी पुलिस की गोली से घायल हुआ था। और, तुम्हारे साथ ही सरकारी अस्पताल में भर्ती भी हुआ। वहां पता नहीं क्या हुआ। डॉक्टर तुम्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गये। मैं बेहोश हो गया। होश आया तो तुम्हारे बेड पर ढाई- ढाई फुट के दो मरीज पड़े थे। मैं इसे डॉक्टरों का चमत्कार समझ रहा था। लेकिन तुम्हें यहां देखकर मेरा मतलब मरा हुआ देखकर मेरी सारी चिंताएं दूर हो गयीं।'
किसी के मरने पर खुश होना और बात है लेकिन अपने मरने की खुशी दूसरे को मनाते देखना.. भगवान ये दिन किसी को न दिखाये। लेकिन उसे मेरी भावनाओं से कोई मतलब नहीं था। शायद वह बेवकूफ समझ रहा था कि आदमी के मरने के बाद उसकी भावनाएं भी मर जाती हैं। सच कहा है कि कुछ लोगों को मरने के बाद भी अक्ल नहीं आती। वह उसी श्रेणी में था। मुझे गुमसुम देखकर उसे होश आया और मेरे मरने की खुाशी में गा रहे मंगल गीतों को उसने विराम लगाया।
'क्या हुआ बिरादर?' उसने सहानुभूति से पूछा।
'कुछ नहीं यार। विश्वास नहीं हो रहा कि मैं मर चुका हूं।' मैंने सच्चाई बता दी।
'होता है यार.. होता है। पहली-पहली बार मरने में ऐसा ही होता है।' उसने इस आत्मविश्वास से जवाब दिया जैसे उसे कई बार मरने का तर्जुबा हो।
'.. जानते हो', वह आगे बाला- 'अस्पताल में मेरे सामने के बेड वाला मरीज तो पोस्टमार्टम में पहुंचने के बाद भी नहीं मान रहा था कि वह मर चुका है। बाद में इलाके के दरोगा जी ने जाकर हड़का तब साला मरने को तैयार हुआ।'
मुझे लगा कि छोटी सी मृत्योपरांत आयु में भी उसने मरने के मामले में काफी रिसर्च कर डाली है। अब मुझे उसमें दिलचस्पी जाग उठी। वैसे भी उस इलाके में, जहां कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था.. उसके सहारे टाइम पास किया जा सकता था। ये सोच मैंने उससे मित्रवत पूछा- 'मरने के पहले जब तुम जिंदा थे, मेरा मतलब धरती पर तुम क्या करते थे?'
'नौकरी की तलाश।' उसने सपाट सा जवाब दिया।
'यानी कुछ नहीं करते थे।'
'कहा न कि नौकरी की तलाश करता था। घर में सबसे बड़ा था। पिताजी इसी इंतजार में रिटायर हो गये कि बुढ़ापे में उनका सहारा बनूंगा। अपने चार छोटे भाई- बहनों को पैरों पर खड़ा करूंगा। कैंसर पीडि़त मां का इलाज कराऊंगा.. लेकिन कुछ न करा सका तो जानबूझकर उस भीड़ में घुस गया, जिस पर पुलिस गोली चला रही थी। और, मेरी मुराद पूरी हो गयी। पिता को निकम्मे बेटे से छुटकारा मिल गया।'
उसकी बात सुनकर इच्छा हुई कि मेरी आंखें भर आयें लेकिन आंखें थी ही नहीं। मुझे लगा कि वह उतना बेवकूफ नहीं है, जितना मैं माने बैठा हूं।
अचानक वह बोला- 'चलो श्मशान घाट चलते हैं। वहां अपना अंतिम संस्कार हो रहा होगा।'
अपना अंतिम संस्कार होते देखना। यह विचार भी कमाल का था। यहां तो साक्षात होने जा रहा था। सच्चाई यह थी कि हम मर चुके थे और अब अंतिम संस्कार ही देख सकते थे। शादी-ब्याह या किसी पार्टी में तो कोई बुलाने से रहा। मैंने मौन स्वीकृति दे दी और थोड़ी ही देर में हम दोनों श्मशान घाट आ गये।
मजे की भीड़ थी वहां भी। हालांकि शहर में कोई दंगा या बलवा भी नहीं हुआ था और सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक न ही किसी महामारी का हमला। फिर भी श्मशान गुलजार था। वहां मजे की चिल्ल-पों मची हुई थी। मुर्दा से ज्यादा शोर भावी मुर्दे मतलब कंधा देने वाले मचा रहे थे। (क्रमश:)
तभी दूसरा झटका लगा। ये देखकर कि मेरा शरीर गायब था। हैरत हुई कि जिस जिस्म को तेल, पानी, शैंपू और जूं देकर इतने बरसों तक पाला पोसा, वह अचानक दगा दे गया। मेरी हालत अजीब सी होनी शुरू होती। इसी बीच मुझे एक और अपने जैसा दिखा। वह मेरी ही ओर आ रहा था। पास आकर बोला- 'बधाई हो! आखिर तुम मर ही गये।'
अपने मरने का जिक्र सुनकर मैं चौंका। तो ये बात है। इसीलिए मेरा पांच फुट बाई तीस सेंटीमीटर का शरीर नदारद है। अब मैंने उसे ध्यान से देखा। वह भी मेरी ही तरह था यानी मरा हुआ। इसका मतलब! आगे कुछ मैं सोच पाता, उसके पहले ही वह बोला- 'पता है, तुम्हारे साथ मैं भी पुलिस की गोली से घायल हुआ था। और, तुम्हारे साथ ही सरकारी अस्पताल में भर्ती भी हुआ। वहां पता नहीं क्या हुआ। डॉक्टर तुम्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गये। मैं बेहोश हो गया। होश आया तो तुम्हारे बेड पर ढाई- ढाई फुट के दो मरीज पड़े थे। मैं इसे डॉक्टरों का चमत्कार समझ रहा था। लेकिन तुम्हें यहां देखकर मेरा मतलब मरा हुआ देखकर मेरी सारी चिंताएं दूर हो गयीं।'
किसी के मरने पर खुश होना और बात है लेकिन अपने मरने की खुशी दूसरे को मनाते देखना.. भगवान ये दिन किसी को न दिखाये। लेकिन उसे मेरी भावनाओं से कोई मतलब नहीं था। शायद वह बेवकूफ समझ रहा था कि आदमी के मरने के बाद उसकी भावनाएं भी मर जाती हैं। सच कहा है कि कुछ लोगों को मरने के बाद भी अक्ल नहीं आती। वह उसी श्रेणी में था। मुझे गुमसुम देखकर उसे होश आया और मेरे मरने की खुाशी में गा रहे मंगल गीतों को उसने विराम लगाया।
'क्या हुआ बिरादर?' उसने सहानुभूति से पूछा।
'कुछ नहीं यार। विश्वास नहीं हो रहा कि मैं मर चुका हूं।' मैंने सच्चाई बता दी।
'होता है यार.. होता है। पहली-पहली बार मरने में ऐसा ही होता है।' उसने इस आत्मविश्वास से जवाब दिया जैसे उसे कई बार मरने का तर्जुबा हो।
'.. जानते हो', वह आगे बाला- 'अस्पताल में मेरे सामने के बेड वाला मरीज तो पोस्टमार्टम में पहुंचने के बाद भी नहीं मान रहा था कि वह मर चुका है। बाद में इलाके के दरोगा जी ने जाकर हड़का तब साला मरने को तैयार हुआ।'
मुझे लगा कि छोटी सी मृत्योपरांत आयु में भी उसने मरने के मामले में काफी रिसर्च कर डाली है। अब मुझे उसमें दिलचस्पी जाग उठी। वैसे भी उस इलाके में, जहां कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था.. उसके सहारे टाइम पास किया जा सकता था। ये सोच मैंने उससे मित्रवत पूछा- 'मरने के पहले जब तुम जिंदा थे, मेरा मतलब धरती पर तुम क्या करते थे?'
'नौकरी की तलाश।' उसने सपाट सा जवाब दिया।
'यानी कुछ नहीं करते थे।'
'कहा न कि नौकरी की तलाश करता था। घर में सबसे बड़ा था। पिताजी इसी इंतजार में रिटायर हो गये कि बुढ़ापे में उनका सहारा बनूंगा। अपने चार छोटे भाई- बहनों को पैरों पर खड़ा करूंगा। कैंसर पीडि़त मां का इलाज कराऊंगा.. लेकिन कुछ न करा सका तो जानबूझकर उस भीड़ में घुस गया, जिस पर पुलिस गोली चला रही थी। और, मेरी मुराद पूरी हो गयी। पिता को निकम्मे बेटे से छुटकारा मिल गया।'
उसकी बात सुनकर इच्छा हुई कि मेरी आंखें भर आयें लेकिन आंखें थी ही नहीं। मुझे लगा कि वह उतना बेवकूफ नहीं है, जितना मैं माने बैठा हूं।
अचानक वह बोला- 'चलो श्मशान घाट चलते हैं। वहां अपना अंतिम संस्कार हो रहा होगा।'
अपना अंतिम संस्कार होते देखना। यह विचार भी कमाल का था। यहां तो साक्षात होने जा रहा था। सच्चाई यह थी कि हम मर चुके थे और अब अंतिम संस्कार ही देख सकते थे। शादी-ब्याह या किसी पार्टी में तो कोई बुलाने से रहा। मैंने मौन स्वीकृति दे दी और थोड़ी ही देर में हम दोनों श्मशान घाट आ गये।
मजे की भीड़ थी वहां भी। हालांकि शहर में कोई दंगा या बलवा भी नहीं हुआ था और सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक न ही किसी महामारी का हमला। फिर भी श्मशान गुलजार था। वहां मजे की चिल्ल-पों मची हुई थी। मुर्दा से ज्यादा शोर भावी मुर्दे मतलब कंधा देने वाले मचा रहे थे। (क्रमश:)
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