Saturday, July 9, 2022
मौत का फरमान
मौत का फ़रमान
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पहली बार हमें अपनी आंखों की काबिलियत पर शक़ हुआ। बचपन से हमें अपनी दोनों आंखों पर बहुत गुमान था। इसलिए नहीं कि वे आकार में बड़ी-बड़ी, बंटोला जैसी थीं। इसलिए भी नहीं कि कभी कहीं किसी से लड़ी नहीं, मतलब वर्जिन थीं। या, कि दोनों बराबर थीं, छोटी-बड़ी नहीं। वफ़ादार इतनी कि चश्मे की बैसाखी पकड़ने को तब तैयार हुईं, जब उन्हें एक-दूसरे को ही देखने में दिक्कत होने लगी। फिर इस कागज़ पर लिखी इबारत, जो हमारी आंखों को दिख रही थी, वह किसी और को क्यों नहीं दिखाई दे रही थी। और तो और, वो कागज़ भी किसी को नज़र नहीं आ रहा था। उस पर सिर्फ़ इतना लिखा था, "तुम्हारा समय पूरा हो चुका है। अब से ठीक 12 घंटे के बाद तुम्हारी दूसरे लोक की यात्रा शुरू होगी।"
ये हमारे लिए एक तरह से मौत का फ़रमान था, जो घर के बाहर वाले कमरे में दरवाज़े के पास पड़ा था। उसे शायद दहलीज़ के नीचे से किसी ने भीतर सरकाया था। पोस्टमैन की करतूत भी नहीं हो सकती क्योंकि पत्र किसी लिफाफे में नहीं था और उस पर डाकखाने की मुहर भी नहीं थी। वैसे भी आजकल ई-मेल और व्हाट्स एप के ज़माने में डाक से चिट्ठी कौन भेजता है। हैरत तो यह थी कि घर में वो चिट्ठी हमारे अलावा किसी ने नहीं देखी। जबकि, सुबह 6 बजे से वह दरवाज़ा कई बार खोला-बंद किया जा चुका था। सबसे पहले ग्वाला आया। नल का ताज़ा पानी दे गया। उसमें थोड़ा दूध भी था। फिर शास्त्र सम्मत अर्धांगिनी का दर्ज़ा प्राप्त महिला ने सब्ज़ी वाले से धनिया-मिर्चा लिया। नियमतः उसे साथ में सब्ज़ी भी देनी पड़ी। उसके बाद विधि सम्मत भाई ( ब्रदर इन लॉ ) मिठाई की दुकान से चाशनी ले आया। उसके साथ जलेबी भी प्राप्त हो गई। दोनों बेटे भी अपने दैनिक कार्यक्रम के निमित्त, जिम से अतिरिक्त कैलोरी जलाकर और उतने ही वज़न का पसीना शरीर पर लादकर, वापस आ चुके थे। किंतु इन सबकी टोटल चार जोड़ी आंखों में से एक की भी नज़र उस चिट्ठी पर नहीं पड़ी। हद तो यह थी कि हम हाथ में चिट्ठी लिए खड़े थे लेकिन फिर भी किसी को कुछ नहीं दिख रहा था।
उल्टे परिवार के लोग हमारा चेहरा देख रहे थे और इस बात पर एकमत होने का प्रयास कर रहे थे कि हमें सीधे नूर मंज़िल ( पागलखाना ) में भर्ती कराया जाए या पहले किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखा लिया जाए। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? इस चिट्ठी को किसी की धमकी मानें या वाकई ऊपर वाले का फरमान। धमकी, हमें कौन देता। एक वही शास्त्र सम्मत वाली थीं, लेकिन वह मौखिक देती थीं। बचा ऊपर वाला तो हमें जहां तक याद पड़ता था, हमारे खानदान में दूर-दूर तक किसी को कोई ऐसा फ़रमान नहीं मिला। सबने बिना किसी नोटिस के ही दुनिया छोड़ी। हमें ऐसी स्थिति में घबराने का भी अनुभव नहीं था, फिर भी हिम्मत जुटा कर घबरा लिए। अपनी उन्हीं दुलारी आंखों को, अब हमारी फ़ोटो पर माला पड़ी नज़र आने लगी।
परिवार के लोगों से बहस करना हमने रिटायरमेंट के पहले ही छोड़ दिया था। वे भी हमको अधिकांश मामलों में रिटायर मानकर चलते थे। हमने वह चिट्ठी जेब में डाली और तीन-तीन फिट की जुड़वां टांगों पर, शेष ढाई फीट का जिस्म लादे, लंबे-लंबे डग भरते हुए, बचपन के एकमात्र जीवित दोस्त के पास पहुंच गए। उसे लगातार ज़िंदा रहने का 66 वर्ष का अनुभव था। इत्तफ़ाक से वह उस दिन भी ज़िंदा मिल गया। हमने उसे संक्षेप में सारी दास्तान सुनाई। जिसे सुनने के लिए उसे अपने एक कान से रुई निकालनी पड़ी। दूसरा कान मैल से जाम था। सारी बात सुनकर उसने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और इस तरह गंभीरता से चिंतन करने लगा, जैसे देश की विदेश नीति में आमूल चूल परिवर्तन की दिशा में विचार कर रहा हो।
इस बीच उसके मुंह में मसाले की जुगाली चलती रही। करीब पांच मिनट बाद उसकी आंखों ने जीवित होने का अहसास दिलाया। साथ में मुंह की मांसपेशियों ने भी अपना जीवन प्रमाणपत्र पेश किया और माहौल के सन्नाटे को चीरते हुए जो दो शब्द हमारे कानों से टकराए, वे थे, "चिट्ठी दिखाओ।"
हमने जेब से चिट्ठी निकालकर उसके हाथ पर रख दी। मगर उसने हिकारत से वह हमें वापस करते हुए कहा, "यार सठियाये तो हम-तुम एक साथ थे। लेकिन लगता है तुमने कोई एक्स्ट्रा कोर्स भी कर लिया है। मैंने चिट्ठी मांगी और तुम रुमाल थमा रहे हो...वो भी नाक के आंसुओं में डूबा हुआ।"
उसकी बात से हम चौंके। इसका मतलब साफ़ था कि चिट्ठी उसे भी नहीं दिख रही थी। उधर वह अपनी भड़ास निकालने में लगा था। कह रहा था, "लखनऊ की गर्मी तुम्हारे दिमाग़ में चढ़ गई है। घर जाओ, आराम करो। दो सिल्ली बर्फ़ मैं भिजवा देता हूं...एक बिछा कर लेट जाना, दूसरी ओढ़ लेना।"
हमने अपने स्थाई कमीने दोस्त को खा जाने वाली नज़रों से देखा। लेकिन खाया नहीं क्योंकि उस दिन मंगलवार था और मंगल को हम नॉन वेज नहीं खाते। फिर हमने गूगल से ढूंढ-ढूंढकर चुनिंदा मौलिक लानतें उस पर भेजीं। इस बीच हम घबराहट की चरम सीमा के काफ़ी पास आ गए । डर था कि कहीं इसके बाद दूसरे लोक की सीमा न प्रारंभ हो जाए। ये विचार मन में आते ही वहां से रिवर्स गियर लगा कर भूतकाल हो गए।
इतनी देर में यह तो तय हो गया था कि उक्त चिट्ठी हमारे अलावा किसी को नहीं दिख रही है। हमने तसल्ली के लिए उस चिट्ठी को फिर अपनी आंखों के आगे कई एंगल से नचाया। वह कत्थक, भरत नाट्यम, कत्थकली, कुचीपुड़ी, मोहिनीअट्टम आदि विधाओं में खूब नाची। मगर हर स्टेप के साथ हमें संदेश देना नहीं भूली कि हमारे पास सिर्फ़ 12 घंटे का समय शेष है। चिट्ठी पर यह तहरीर पढ़ते ही हम पर घबराने का दूसरा दौरा पड़ा क्योंकि इस बीच एक घंटा हम बर्बाद कर चुके थे। अब सिर्फ़ 11 घंटे का समय बाक़ी था। उसके बाद....! उसके बाद हमारे नाम के आगे 'स्वर्गीय' लग जाएगा।
"और कहीं मरने के बाद नरक मिला तो?" दिल ने दिमाग़ के आगे शंका रखी।
"तो भी यहां किसको पता चलेगा...लिखा तो फिर भी स्वर्गीय ही जाएगा। आज तक किसी के नाम के पहले नारकीय लिखा देखा है!"
दिमाग़ की दलीलों के आगे दिल ने घुटने टेक दिए। जो होगा देखा जाएगा। हमने 'स्वर्ग' या 'नरक' के झगड़े में न पड़कर अपने बाक़ी बचे एक-एक मिनट का सदुपयोग करने का फ़ैसला किया। समय कम था और कामों की फेहरिस्त लंबी। हमने हिसाब लगाना शुरू किया। तमाम काम अधूरे पड़े थे। कुछ शुरू ही नहीं हुए थे। बचे हुए 11 घंटे में से एक घंटा यह सोचने में ही निकल गया कि हम कौन सा काम करें और कौन सा छोड़ें। फिर ये भी खयाल आया कि कहीं मरने के बाद भूत न बन जाएं। सुना था कि जिनके काम या हसरतें अधूरी रह जाती हैं, वे भूत बनकर मारे-मारे फिरते हैं।
इस विचार के उठते ही हम डर से कांपने लगे। फ़ौरन हनुमान चालीसा पढ़नी शुरू कर दी। डर कुछ कम हुआ तो हिम्मत बढ़ी। हनुमान चालीसा वाला नुस्खा तो कारगर था। लेकिन ये गारंटी नहीं थी कि मृत्योपरांत पढ़ने की परमिशन होगी...क्योंकि आज तक किसी भूत या आत्मा द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ का ज़िक्र नहीं सुना। यही पता था कि उसे सुनकर भूत-प्रेत भाग जाते हैं। अजीब कश्मकश थी। हमें मरने का कोई तजुर्बा भी नहीं था और न कोई भूत-प्रेत हमारी फ्रेंड लिस्ट में था, जो शंका समाधान करता। हम पर तीसरा दौरा पड़ा। गनीमत रही कि दौरा घबराहट का था, दिल का नहीं...वरना डेडलाइन से पहले ही इस जहां से डेबिट होकर उस जहां में क्रेडिट हो चुके होते।
अब 8 घंटे बचे थे हमारे पास। वैसे तो 8 घंटे बहुत होते हैं। नौकरी में एक शिफ्ट की ड्यूटी ख़त्म हो जाती है लेकिन जब ज़िंदगी की शिफ्ट का सवाल हो तो बहुत कम मालूम पड़ते हैं। हमें लगा अगर अधूरे काम निपटाने लगे तो बचा हुआ सारा समय उसी में ख़त्म हो जाएगा और काम शायद फिर भी न निपटें। यह विचार आते ही हमने अधूरे कामों को गोली मारने की सोची। लेकिन अचानक खयाल आया कि यह तो हिंसा हो जाएगी और आख़िरी समय में हिंसा ठीक नहीं। यह सोच अधूरे कामों को भाड़ में जाने का रास्ता दिखा दिया, जो पुराने लखनऊ की तरफ़ जाता था।
अब दिल ने कहा कि चलते-चलते कुछ नेक काम कर लो। सुना है आख़िरी वक्त में की गई नेकी, पूरे जीवन की बदी पर भारी पड़ती है। यह विचार कर हम बैट्री रिक्शा में बैठकर गोमती के पास आ गए। आख़िर नेकी करने के बाद उसे दरिया में भी तो डालना होता है। दरिया की दशा बहुत ख़राब थी। उसमें प्लास्टिक, कचरे, मल-मूत्र के रूप में शहर वालों की नेकियां पहले से पटी पड़ी थीं। हम सोच में पड़ गए कि नेकी लाकर डालेंगे कहां। यहां तो जगह ही नहीं है।
इतनी देर में दो घंटे और कम हो गए। तभी दो सिपाही अपनी तरफ़ आते दिखे। हम आख़िरी समय में पुलिस की सूरत देखने से बचना चाहते थे लेकिन तब तक वे पास आ गए। एक डंडा फटकारता हुआ बोला, "हौ हौ...चचा यहां क्या कर रहे हो?"
"कुछ नहीं...बस ऐसे ही...नदी देखने आए थे।" हमने जवाब दिया।
"काहे... इत्ती उमर हो गई...कभी नदी नहीं देखी!" दूसरे सिपाही ने हमें घूरते हुए कहा। उसके हाथ का डंडा भी अंगड़ाई लेने लगा।
"हम सच कह रहे हैं...नदी ही देखने आए थे...देखिए कितनी गंदगी है।"
"हमें तो लगतो है... ई ससुर गंदगी बढ़ाने आये हैं। चचा तुम्हारा डिब्बा कहां है?"
"कैसा डिब्बा?" हमने घबराकर पूछा।
"सरकार सफ़ाई कराए-कराए परेशान है...स्वच्छ भारत मिशन चलाए है...घर-घर शौचालय बनवा रही है...और तुम साले ससुर के नाती चले आए गंदगी करने"।
एक सिपाही ज़मीन पर डंडा पटककर चिल्लाया तो दूसरा उसका साथ देते हुए बोला, "ले चलो साले को थाने...वहां इसे नदी नहीं समंदर दिखाएंगे।"
हम डर से थर-थर कांपने लगे। लगा शायद यमदूत पुलिस की वर्दी पहनकर हमें लेने आ गए। सिपाही हमें थाने ले जाने पर अड़े थे। उनके चंगुल से छूटना ज़रूरी था। अचानक हमें अपनी जेब में पड़ी उस चिट्ठी का ध्यान आया। हमने उसे निकालकर एक सिपाही के हाथ में रख दिया। उसने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा, "ख़ाली सौ का नोट। चचा कुछ तो लिहाज करो...हम दो लोग हैं...बस 50-50...इतना रेट मत गिराओ।"
अब चौंकने की हमारी बारी थी। मतलब वह चिट्ठी इन्हें सौ का नोट दिख रही है। खैर, इसके बाद वो नोट लेकर दोनों चले गए। हमने इत्मीनान की सांस ली। एक नेक काम तो संपन्न हुआ। घड़ी की सुइयां तेज़ी से भाग रही थीं। हमने सोचा एकाध नेक काम अपने परिवार वालों के लिए भी करते चलें। उन्हें अंजाम देने हम दूसरा टेंपो पकड़कर बैकुंठ धाम आ गए। वहां बड़ी भीड़ थी। चारों तरफ़ मुर्दे ही मुर्दे। हमें लगा यहां तो फुंकने में ही घंटों लग जाएंगे। कहो पुनर्जन्म हो जाए और लाश का नंबर न आए। बेटे और रिश्तेदार अलग कोसेंगे कि बुड्ढा कौन सी मनहूस घड़ी में मरा। ये विचार कर हमने अपने लिए सात मन लकड़ी फटाफट तुलवा कर किनारे रखवा दी और दुकानदार से कह दिया कि शाम को जब हम अर्थी पर आएं तो लड़कों को सप्रेम भेंट कर देना। अच्छा इंप्रेशन पड़ेगा।
लकड़ी वाला क्या सोच रहा होगा, इसकी परवाह किए बिना हम लपककर डेथ सर्टिफिकेट बनवाने जन्म-मृत्यु कार्यालय में घुस गए। वहां कर्मचारी बिना शव देखे सर्टिफिकेट बनाने को तैयार नहीं था। उसे पांच सौ रुपए घूस देकर बड़ी मुश्किल से यकीन दिलवा पाए कि हम ही हैं 'भावी स्वर्गीय!'
ये सब काम निपटाने में अंतिम समय करीब आ गया। आधा घंटा बचा तो हम ओला करके जल्दी से घर आ गए। किसी ने हम पर ध्यान नहीं दिया। हम ड्राइंग रूम में जमीन पर चादर बिछाकर लेट गए। सिरहाने गीता-रामायण रख ली। एक कंडा और दो अगरबत्ती भी जलाकर रख दीं। कोरम पूरा हो गया। अब सिर्फ़ हमें प्राण त्यागने थे। मगर असमंजस इस बात को लेकर था कि प्राण ख़ुद त्यागने होंगे या यमदूतों का इंतज़ार करना होगा। हमने इंतज़ार करने का निश्चय किया और आंखें बंद करके, मुंह में गोमती से लाया गंगाजल डालकर, 'राम नाम सत्य है' का जाप करने लगे। तभी यमदूत ने बुरी तरह झिंझोड़ा। आंखें खोलीं तो वही शास्त्र सम्मत अर्धांगिनी का दर्ज़ा प्राप्त खड़ी थीं। साथ-साथ चिल्ला भी रही थीं, "देखो अपने बाप की करतूत...पलंग के नीचे लेटे पता नहीं क्या-क्या बक रहे हैं। लाख कहा कि रात में गरिष्ठ खाना मत खाओ...लेकिन नहीं, करेंगे अपने मन की। कैसे-कैसे, उल्टे-सीधे सपने देखते हैं। अब तो इन्हें नूर मंज़िल जाकर जमा कर ही आओ।"
हम हतप्रभ से इधर उधर ताकने लगे। उधर बड़ा बेटा मोबाइल से नूर मंज़िल का नंबर डायल कर रहा था।
- कमल किशोर सक्सेना
Monday, May 9, 2022
एक छोटी सी लव स्टोरी
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मैं एक भूत हूं। भूत, भविष्य, वर्तमान वाला नहीं... मरने के बाद वाला। मरने के पहले जब मैं ज़िंदा था तो बाकायदा पैंसठ किलो का शरीर रखता था। उस शरीर में करीब 150 ग्राम का दिल। दिल में जान के अलावा तमाम अरमान, सुख - चैन और तमन्नाएं भी बसती थीं। एकदम हाउसफुल था। ऐसी खचाखच स्थिति में वह मेरे पड़ोस में रहने आ गई। उसे देखते ही पहला काम ये हुआ कि मेरे दिल से जान निकलकर उसमें ट्रांसफ़र हो गई, सुख - चैन बग़ावत कर बैठे, अरमानों की सुनामी आ गई। ये मेरा पहला प्यार था। तब मैं हाई स्कूल में पढ़ता था और वह आठवीं में। हम दोनों की शिक्षा भी नाबालिग थी और हम भी।
छह महीने मैं उसे बस देखता ही रहा। तब मुझे समझ में आया कि वह कहीं और देखती है। उसका कहीं और देखना आंखों के दोष के कारण नहीं, बल्कि इस कारण था कि उसकी दृष्टि, मुझे पारकर सामने रहने वाले एक और लड़के पर ठहरती थी। मेरी इकतरफ़ा प्रेम कहानी में पहली बार विलेन की एंट्री हुई। दिल ने भी पहली बार ईर्ष्या की भावना महसूस की। नतीजा, अगले दिन मैंने उस विलेन को बिना किसी कारण के पीट दिया। वह विज्ञान का विद्यार्थी था। उसने न्यूटन का तीसरा नियम पढ़ा था, अतः उसने प्रतिक्रिया में मुझे पीट दिया। उस ज़माने में मेरे आत्मसम्मान का जन्म नहीं हुआ था, फिर भी उसे ठेस लग गई।
उन्हीं दिनों मैंने कहीं पढ़ लिया कि मोहब्बत और जंग में सब जायज़ होता है। यहां मोहब्बत ( भले इकतरफ़ा ) भी थी और जंग भी, अतः मैं कुछ जायज़ करने का मौक़ा ढूंढने लगा। कहते हैं कि सच्चे इश्क़ में तमाम मुश्किलें आती हैं... इसलिए यहां भी आईं। मैं कुछ करने का मौक़ा ही ढूंढता रह गया और उसके पापा ने दूसरे मोहल्ले में मकान ढूंढ लिया। लेकिन, सच्चे आशिक़ की तरह मैंने हार नहीं मानी और अपने इश्क़ की गुमटी उसके स्कूल के बाहर डाल ली। रोज़ अपने स्कूल की जगह मैं उसके विद्यालय में हाज़िरी देने लगा। इस चक्कर में मेरी अटेंडेंस शॉर्ट हो गई और परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया। मुझे परीक्षा न दे पाने से ज़्यादा दुख इस बात का था कि उसने अब तक एक बार भी मेरी ओर नज़र उठाकर देखा नहीं था। अपने घुटने की यादगार चोट के अलावा, अब मैंने इश्क़ की चोट भी महसूस की।
उन दिनों इश्क़ में चोट खाए लोग गांजा, चरस, शराब आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन करते थे, जिससे उनमें बड़े से बड़ा सदमा सहने की हिम्मत बनी रहती थी। अतः मैंने बिना समय गंवाए मोहल्ले की ' नशा भक्षण समिति ' की सदस्यता ग्रहण कर ली। वह समिति वास्तव में घायल और टूटे दिल वालों का नर्सिंग होम थी। कुछ सदस्य इश्क़ में पागल होकर समिति की शरण में आए थे, उनके लिए अलग विभाग था। कुछ आई सी यू में थे। समिति के अध्यक्ष को ख़ुद कई जगह से ठुकराए जाने का लंबा तजुर्बा हासिल था, इसलिए वह ड्रग्स लेते थे। मेरा केस अभी गंभीर नहीं हुआ था, लिहाज़ा मुझे दारू के तीन पैग का हल्का डोज़ देने के बाद लेटर - ओ - थेरोपी ( लव लेटर लिखने ) की सलाह दी गई। मैं देवदास पर नवीं बार फ़िल्म नहीं बनवाना चाहता था, अतः इस थेरोपी के लिए राज़ी हो गया।
मेरे अंदर लिखने - पढ़ने का इतना ही सलीका होता तो हाई स्कूल न पास कर लेता। लेटर लिखवाने के लिए मुझे दूसरे मोहल्ले के एक ' प्रेम पत्र विशेषज्ञ ' की सेवाएं लेनी पड़ीं क्योंकि अपने मोहल्ले में सब मेरे जैसे थे। उनके लिए भैंस और काले अक्षर में कोई भेद न था... गनीमत सिर्फ़ इतनी थी कि उन्होंने कभी काले अक्षर से दूध दुहने की कोशिश नहीं की। उन प्रेम पत्र विशेषज्ञ के पास इतना काम था कि अगले छह महीने तक समय नहीं था। ऐसा लग रहा था, जैसे उस दौर का हर व्यक्ति बस प्रेम करने का ही काम करता था, बाक़ी काम अमेरिका आदि देशों की मदद से होते थे। ख़ैर, छह महीने बाद अपने हिस्से का प्रेम पत्र लिखवाने के बाद जब मैं उसे देने गया तो पता चला कि वह स्कूल ही नहीं, शहर भी छोड़ गई।
इस झटके के बाद क़ायदे से मुझे संपूर्ण रूप से टूट जाना चाहिए था लेकिन ख़ाली मेरा दिल टूटा, जिसे मैंने फेविकोल से चिपकाकर काम चलाने लायक बना लिया। पत्र लिखवाने की फ़ीस तो बेकार गई ही, साथ ही उसे पाने की आख़िरी उम्मीद भी टूट गई। अब मेरे सामने दो रास्ते थे... आत्महत्या कर लूं या किसी का अपहरण कर उससे प्रेम करूं। लेकिन, प्रेम में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता, ये सोच मैं जेब में पत्र डालकर, उसे देने योग्य चेहरे की खोज में जुट गया। समय बीतता गया। तब तक मैं हाई स्कूल में पांच बार फेल होकर मोहल्ले में नया रिकॉर्ड बना चुका था। इस बीच एक से नज़रें मिलीं भी, वह भी हाई स्कूल में तीन बार फेल हो चुकी थी। लेकिन उसे भी पत्र देने की नौबत नहीं आई क्योंकि वह और किसी सीनियर फेलियर की तलाश में थी।
इसके बाद उक्त प्रेम पत्र देने के लिए मैंने तीन प्रयास और किए। पहला प्रयास राशन की लाइन में किया। वह महिलाओं की लाइन में पीछे लगी थी। उसका साथ पाने को मैं अपनी लाइन में आगे से पीछे आ गया। लेकिन, मेरे आगे से हटते ही उसने अपने भाई को मेरे स्थान पर लगा दिया और ख़ुद घर चली गई। चिट्ठी जेब में ही पड़ी रह गई। दूसरी कोशिश तब की, जब घरवालों को पूरा विश्वास हो गया कि मैं इस जन्म में हाई स्कूल पास नहीं कर सकता। अंततः इसी क्लास में लगातार सात बार फेल होने के बाद पढ़ाई ने मुझे छोड़ दिया। तब पड़ोस के घर में बर्तन मांजने वाली को मैंने उक्त पत्र देने की कोशिश की। उसने अपने पति से शिकायत कर दी और मैं अपनी टांगों से हाथ धोते - धोते बचा। केवल पैर तुड़वाने के एग्रीमेंट के बाद मैंने प्रेम के पत्राचार पाठ्यक्रम से तौबा कर ली। पत्र को बक्से में रखकर मैं लगभग भूल गया।
तीन महीने बाद मैं फिर अपने पैरों पर खड़ा हो गया। इस बीच, साथ के सभी यार - दोस्त, विवाह और बच्चों को प्राप्त हो चुके थे। शुभचिंतकों ने सलाह दी कि शादी कर लो, प्रेम उसके बाद भी किया जा सकता है। मैं तैयार हो गया किंतु शहर में अब कोई शरीफ़ परिवार मुझे अपना दामाद बनाने को तैयार न था। थक - हारकर मैंने एक भूतपूर्व गुंडे की बेटी का उद्धार करने की सोची। ये मेरा तीसरा और अंतिम प्रयास था। गुंडे की बेटी भी गुंडी थी। मुझसे पहले वह दो लोगों का उनके जीवन से उद्धार कर चुकी थी, ये बात मुझे मालूम न थी। ख़ैर, गाजे - बाजे के साथ मैं उसकी मांग का नया सिंदूर बन गया।
अब मैं अधिकृत तौर पर उससे प्रेम कर सकता था। मैं कोई शुरुआत करता, उसके पहले ही बक्से में रखा वह ऐतिहासिक प्रेम पत्र उसके हाथ लग गया और उसने मुझे इतिहास बनाने में ज़रा भी देर नहीं की। इतिहास में दाखिल होते ही मुझे जो नया आशियाना मिला, वह एक बरगद का पेड़ था। इस पर कुछ सीनियर भूत पहले से रहते थे। इसके ठीक सामने एक पीपल का पेड़ था, जिसे ' चुड़ैल हॉस्टल ' के नाम से जाना जाता था। उस हॉस्टल पर नज़र पड़ते ही मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। ज़िंदा होता तो चीख पड़ता। वहां मेरा पहला प्यार अर्थात हाई स्कूल वाली पड़ोसन हाथों में शमा लिए ' कहीं दीप जले कहीं दिल ' गा रही थी। अब वो मुकम्मल और हसीन चुड़ैल बन चुकी थी।
उसे देख मेरा भूत ख़ुशी से पागल होते - होते बचा। लेकिन, ये ख़ुशी बहुत देर न ठहर सकी... अभी मैं अपनी महबूबा का ठीक से दीदार भी न कर पाया था कि उस हॉस्टल में एक नई चुड़ैल ने एंट्री ली। वो चुड़ैल बनने से पहले भी चुड़ैल थी अर्थात मेरी पत्नी थी। पूरी ज़िंदगी जिस लव स्टोरी को पूरा करने का मैं सपना देखता रहा, वह फिर अधूरी रह गई थी। अंत में कहानी सिर्फ़ इतनी है कि मेरी बीवी यानी गुंडे की बेटी ने ख़ुद को बेवा बनाने के बाद अंगूर की बेटी का इतना सेवन किया कि टें बोल गई। और, अब स्थाई रूप से मेरी छाती पर, जो अब नहीं थी, मूंग दलने आ गई। कौन कहता है कि मरने के बाद दो दिल मिल जाते हैं।
- कमल किशोर सक्सेना
जब मोहल्ले में बुल्डोजर आया
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बात इतनी सी नहीं थी। कई क्विंटल की थी। रात तक सब ठीक था। मोहल्ले के लोग अपनी दिनचर्या पूरी करके जब सोने गए तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन सुबह आंख खुली तो चौराहे पर एक बुल्डोज़र खड़ा देखा। उसे देखते ही सब चौंक पड़े। बुल्डोज़र दिखना अच्छा संकेत नहीं था। ये काली बिल्ली के रास्ता काटने या ज़रूरी काम से निकलते समय छींक देने से भी बड़ा अपशकुन था। बुल्डोज़र का मतलब यमदूत का मशीनी संस्करण। किसी वैध अपराधी या अवैध इमारत का एनकाउंटर।
देखते ही देखते मोहल्ले वालों में कानाफूसी शुरू हो गई।
"किसके कर्मों का फल है ये, जो हमारा चैन उड़ाने आया है?"
"कल्लू कबाड़ी को दरोगा जी कई बार चोरी-चकारी छोड़ देने की वार्निंग दे चुके थे... आख़िर आ गई न शामत।"
"खड़े-खड़े लफ्फाज़ी करने से कुछ न होगा...सोचो इस मुसीबत से कैसे बचा जाए।"
"चीते की चाल, बाज़ की नज़र और बाजीराव की तलवार से बचना आसान है मगर बाबा के बुल्डोज़र से नहीं। तरकस से तीर निकल चुका है...अब लक्ष्य भेदकर ही लौटेगा।"
जितने मुंह थे, उतनी बातें। पांच मिनट के बाद एक गली से लुंगी-बनियान पहने ढाई सौ का इनामी बाबू बजरंगी निकला। उसके हाथ में एक तख्ती थी, जिस पर लिखा था-'दुहाई हो...जान की दुहाई हो... मैं सरेंडर कर रहा हूं...मेरा एनकाउंटर न किया जाए।' बाबू को देखकर सबके मुंह से सिसकारी निकल गई। अभी इस बदनसीब की उमर ही क्या है। जुर्म की दुनिया में आए एक साल भी तो नहीं हुआ। बेचारा न कुछ कमा पाया...न बचा पाया। बेचारे का कैरियर बनने के पहले ही उजड़ रहा है। भगवान ऐसा अपराधी किसी को न बनाए।
लेकिन बाबू पर इन सारी संवेदनाओं का कोई असर नहीं हुआ। वह अपनी मंज़िल अर्थात मोहल्ले की पुलिस चौकी की ओर बढ़ता ही गया। चौकी में एकमात्र सिपाही मौजूद था। उसने बाबू का सरेंडर नामा स्वीकार करने से मना कर दिया। कहा कि ये अधिकार दरोगा जी का है। चूंकि उन्होंने भी सवेरे-सवेरे बुल्डोज़र के दर्शन कर लिए हैं। अतः वह भी सरेंडर करने इंस्पेक्टर साहब के पास गए हैं। सुना है इंस्पेक्टर साहब के घर के बाहर भी बुल्डोज़र देखा गया है। इसलिए कोई ठिकाना नहीं कि वह भी एसपी साहब के यहां गए हों।
बेचारा बाबू अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाता हुआ अब पुलिस चौकी के बाहर अनशन कर रहा है। इस बीच बुल्डोज़र के संक्रमण से जो अन्य प्रभाव पड़े, वे इस प्रकार हैं- दूध में पानी मिलाने वाले पुत्तन घोसी ने प्रायश्चित स्वरूप अपने ग्राहकों को घी और मक्खन देने का निर्णय ले लिया। मोहल्ले के डॉक्टर झटका के नर्सिंग होम में भी डिस्काउंट लागू कर दिया गया। पैर की हड्डी टूटने पर हाथ का प्लास्टर मुफ़्त। इलाज के दौरान मौत हो जाने पर एंबुलेंस के साथ कफ़न सहित अंतिम संस्कार सामग्री मुफ़्त। सिर्फ़ यही नहीं, बुल्डोज़र की कृपा से मोहल्ले के खुले मैनहोलों में ढक्कन लग गए। स्ट्रीट लाइट के खराब बल्ब बदल गए। बिजली चोरी करने वालों ने खंभे से अपनी-अपनी कंटिया उतार ली।
मोहल्ले में टीवी के न्यूज़ चैनलों या ओटीटी पर गूंजती वेब सिरीज़ की आवाज़ों की जगह चैन की बंसी बजती सुनाई देने लगी। लड़कों ने नशा न करने की सामूहिक प्रतिज्ञा कर डाली। लड़कियां और महिलाएं बिना छिड़े स्कूल-कॉलेज और मार्केट जाने लगीं। फेरी वाले बिना डंडी मारे सब्ज़ी और फल तोलने लगे। काली कमाई करने वाले व्यापारी ख़ुद अपने बही-खाते जीएसटी कार्यालय में जाकर जमा कर आए। और तो और, जानवरों में भी तमाम सुधार देखे गए। कुत्ते अनुशासित हो गए। उन्होंने टाइम टेबल बना लिया। हफ्ते के पहले तीन दिन भौंकते और बाद के तीन दिन काटते। इतवार को छुट्टी मनाते। आवारा गायों ने भी यातायात नियमों का पालन शुरू कर दिया और चौराहे या सड़क के बीच बैठना छोड़ दिया।
तीन दिन बाद। अचानक एक आदमी आया। बुल्डोज़र पर बैठा। उसे स्टार्ट किया और लेकर जाने लगा। मोहल्ले वाले हैरत में। उससे पूछा तो जवाब मिला, "यहां का काम ख़त्म हो गया। अब इसे दूसरे मोहल्ले में रखने जा रहा हूं।"
- कमल किशोर सक्सेना
Wednesday, April 7, 2021
दारू पदावली (सरलार्थ) ------------------
नोट : इस पदावली में मूल पद ना देकर केवल उनका भावार्थ दिया जा रहा है। इन्हें पढ़कर पाठकगण मूल पदों का स्वयं अंदाज़ लगा लें।
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कवि कहता है - दारू की दुकानें खुल गई हैं। ये देखकर पियक्कड़ जन उसी प्रकार आनंदित हैं, जैसे कोई टुच्चा चार जगह से जुड़ा नोट चलाकर होता है। जैसे टीचर की नानी मरने के कारण अचानक स्कूल में छुट्टी हो जाने से होमवर्क ना करने वाला बच्चा होता है। जैसे चौराहे पर मुर्गा बना सीनियर लाकडाउन तोड़क जूनियर को मुर्गत्व प्राप्त होता देखकर होता है।
(2)
डेढ़ माह की जुदाई के बाद मयखानों का घूंघट उठा है। अरमानों की बारात लिए दारूबाज लाइन में खड़े हैं। उन्हें ना आंधी डिगा पा रही है और ना बेमौसम बरसात। सच्चे सुरा प्रेमियों की यही पहचान है। उन्हें गर्व भी है कि मुसीबत से भरे इस कोरोना काल में उन्हें डूबती अर्थव्यवस्था को उबारने लायक समझा गया। ऐसे देशभक्तों की जितनी भी सराहना की जाए, कम है। ऐसे देश रत्नों को सुराश्री, सुराभूषण और सुरा रत्न जैसे पुरस्कारों से नवाजा जाना चाहिए।
(3)
एक ब्योड़ा दूसरे ब्योडे से कहता है - भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं। आखिर हमारी डेढ़ महीने की तपस्या रंग ले ही आई... मयखाना खुला। सच्चे मन से किया गया पुरुषार्थ व्यर्थ नहीं जाता। क्वार्टर, अद्धे, बोतल या पाउच की शक्ल में वापस आता है। इसलिए हे सुरापति! अपने तप की शक्ति पहचान। एक सांस में पूरा अध्धा खींचने के बाद साथी मयवीर जवाब देता है - तेरी मां का टना ... कहां है कोरोना। कैसा है कोरोना। जरा सामने तो आ ना।
(4)
कवि अपना चौथा पैग बनाते हुए आगे कहता है - नाली में पड़ा ...कीचड़ से सराबोर दारूबाज श्वान से भी श्रेष्ठ होता है क्योंकि श्वान सुरा से रीता होता है। दारूबाज सड़क पर भी गिरता है तो घोड़े पर सवार होकर। ऐसे नशा शिरोमणि के आगे संसार के सारे वाहन नतमस्तक हैं। वे अभिनंदनीय हैं...प्रशंसनीय हैं...अनुकरणीय है। नशे में टुन्न दारूबाज के सुख की कल्पना कोई नहीं कर सकता। ये संसार का सर्वोत्तम सुख है।
(5)
एक सखी दूसरी सखी से कहती है - हमारे परमेश्वर अच्छा भला झाडू - पोंछा कर रहे थे ... डांट डपट भी सुनने की आदत डाल लिये थे। मगर ठेका खुल गया। सरकार बेवफा निकली। खुद स्त्रीलिंग होकर भी महिलाओं का साथ ना दिया। दूसरी सखी मुंह से आग की लपटें निकालकर जवाब देती है - सच कहा तुमने लेकिन अगर मेरे सांवरिया ने अब पुराने तेवर दिखाए तो कसम लाकडाउन की... चौराहे के पुलिस वाले के हवाले कर दूंगी और कह दूंगी कि मुआ बहुत खांसता है ... ले जाओ अस्पताल। डाल दो चार - छह साल के क्वारांटिंन में।
कमल किशोर सक्सेना
Tuesday, April 6, 2021
हैप्पी बर्थडे टू मी
4 अप्रैल 1956, शाम 6 बजकर 60 मिनट और पता नहीं कितने सेकंड। राउंड फिगर में करीब 7 बजे का समय। ना आसमान में बिजली कौंधी, ना कोई आकाशवाणी हुई, ना बिल्ली हंसी - ना कुत्ता रोया लेकिन हम पैदा हो गए। अच्छा हुआ महान भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने हमारे पैदा ना होने की भविष्यवाणी नहीं की थी, वरना कई अन्य की तरह वह भी ग़लत साबित हो जाती। हमारा पैदा होना कोई आश्चर्य ना था...आश्चर्य तो तब होता जब हम मंगल या शनि पर पैदा हुए होते। ख़ैर, जब हम पैदा हुए तो बेहद कमज़ोर, बल्कि कहना चाहिए कमज़ोरेस्ट थे। हमारे बचने की किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। हालांकि, डॉक्टरों ने जवाब नहीं दिया था किंतु उनसे किसी ने सवाल भी नहीं किया था।
मगर हम ना सिर्फ ज़िंदा रहे बल्कि लगातार ज़िंदा बने रहे। इतने सालों में हमने ज़िंदगी के साथ एक मिनट का भी नागा नहीं किया। ख़ैर, पैदाइश के समय हमारा वज़न इतना कम था कि हमें और सोने को एक ही बांट से तौला जा सकता था। हम साधारण आंखों से नहीं दिखते थे। कहते हैं पूत के पांव पालने में नज़र आ जाते हैं लेकिन हमारे माइक्रोस्कोप में नज़र आए। पहले सबने सोचा कि शायद केवल आत्मा की डिलीवरी हुई है। लेकिन जब डॉक्टरों ने बताया कि टोटल पंचतत्व यही हैं, तब हमारे पिता जी के पिता जी को विश्वास हुआ कि वह बाबा बन गए हैं। उन्होंने इस खुशी में मोहल्ले में बूंदी के दाने बांटे। पूरा लड्डू इसलिए नहीं दिया गया ताकि ख़ुशी और उसके कारण का संतुलन बना रहे।
हमारा जन्म कानपुर के उर्सला अस्पताल में हुआ था। आज़ादी से पहले अस्पताल अंग्रेज़ों का था लेकिन अब सरकार का। मगर वहां पैदा होने वाले बच्चे सरकारी नहीं कहलाते थे। उस समय के सरकारी अस्पताल स्वस्थ हुआ करते थे। बच्चा बदलने की कला उस दौर में विकसित नहीं हो पाई थी। अस्पताल में डॉक्टर और दवाएं, दोनों का भरपूर स्टॉक रहता था। कोई भी वहां इस विश्वास के साथ इलाज करा सकता था कि उसका हाथ टूटा है तो प्लास्टर हाथ में ही लगेगा, पैर में नहीं। ऑपरेशन की कैंची ट्रे में ही रखी जाती थी, मरीज़ के पेट में नहीं। ऐसे सतयुगी वातावरण में जब हमारे जैसा अमानक ( मानकों के विपरीत ) बच्चा पैदा हुआ तो कुछ लोगों ने इसे भ्रष्टाचार की शुरुआत कहा।
देश में भ्रष्टाचार और अपने आंगन में हम, दोनों तेज़ी से बढ़ने लगे। कुछ समय बाद भ्रष्टाचार की सेहत तो ठीक हो गई लेकिन हमारी डेढ़ पसलियां पौने दो ना हो पाईं। हमारी मां ने मालिश, खिलाई - पिलाई, दवा - दुआ, मंदिर, फ़कीर, आदि सारे जतन कर डाले मगर हमारी खाल और हड्डियों के बीच मांस नहीं उगा तो नहीं उगा। घर पर जो भी परिचित, नाते - रिश्तेदार आता, हमारे लिए कोई दवा या इलाज तजवीज़ कर जाता। मां - पिता जी किसी से मिलने जाते तो भी बातचीत का विषय हमारी सेहत, जो नहीं थी, ही रहता। हम सेहत बनाने की प्रयोगशाला बनकर रह गए थे। अच्छा हुआ कि किसी रसूख वाले के यहां नहीं जन्मे वरना तत्कालीन भारत में हमारी दुर्बलता भी राष्ट्रीय समस्या होती।
कहते हैं मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। हम केवल दुर्बलता में ही चैंपियन नहीं थे, रंग के मामले में भी उल्टे तवे से थोड़े ही उन्नीस थे। ' कोढ़ में खाज ' वाली कहावत के ' लिविंग लीजेंड ' बन गए हम। यही वजह थी कि नज़र से बचाने वाला काला टीका हमें नहीं लगाया जाता था, बल्कि जहां नज़र लगने का अंदेशा होता था, वहां हमें लगा दिया जाता था। उस समय गोरा बनाने के इतने क्रीम, लोशन आदि सौंदर्य प्रसाधन नहीं आते थे और ना ब्यूटी पार्लर होते थे। अपना रूप निखारने के लिए आदमी ले - देकर साबुन की बट्टी पर ही निर्भर करता था। उसमें भी ' लक्स ' फिल्म अभिनेत्रियों के लिए आरक्षित था और ' लाइफ ब्वॉय ' बड़े घर के कुत्तों के लिए। हमारे जैसे मीडियम क्लास लोग ' हमाम ' टाइप साबुन पर आश्रित रहते थे।
हम उसी से नहाते रहे। सुबह - शाम नहाते रहे। दस साल तक नहाते रहे। तब जाकर भ्रम टूटा कि साबुन लगाने से कोई गोरा नहीं होता। इसके बाद हमारा दुनिया के सारे साबुनों से विश्वास उठ गया। सिद्धांतत: हमें आजीवन साबुन का प्रयोग ना करने की शपथ ले लेनी चाहिए थी किंतु इसमें एक खतरा था कि अंधेरे में जो थोड़ा - बहुत हमारा अहसास बना रहता है, वो भी खत्म हो जाता। अब तक हम इतने बड़े हो गए थे कि हमें हमारा आकार मिल चुका था। सिर्फ कलर को छोड़ दिया जाए तो सौंदर्य के सारे मानदंडों पर खरे उतरते थे। यथा : छरहरा बदन, बड़ी - बड़ी आंखें, सुतवां लंबी नाक, सुराहीदार गर्दन, घने - काले केश, पतली कमर... लेकिन जब इन सबका टोटल किया जाता तो बनते कमल किशोर सक्सेना। आज इसी टोटल की 65 वीं वर्षगांठ है। आमीन!
- कमल किशोर सक्सेना
Sunday, October 11, 2015
ए· हारे हुए मैच ·े साइड इफेक्ट्स
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रविवार ·ी दोपहर त· ग्रीनपार्· में बड़ी खुशनुमा हवाएं चल रही थीं ले·िन शाम होते-होते वे उदास हो गयीं। भारत मैच हार गया। हवाएं उदास तो सारा वातावरण उदास। अपने-अपने नीड़ों ·ो वापस लौटते पक्षीगण भी ·लरव ·रना भूल·र उदास हो गये। पशुओं ·ा मूड अलग खराब हो गया। ·ुत्ते सबसे ज्यादा उदास थे... ए· तो ग्रीनपार्· में घुसने ·ो नहीं मिला...ऊपर से मैच भी हाथ से नि·ल गया। पता नहीं ·ुत्तों ·े साथ सख्ती ·रने ·ी क्या जरूरत थी। उनसे ·ौन सी साम्प्रदायि· ·ा खतरा हो स·ता था। परमट चौराहे पर बैठा ए· ·ुत्ता इतना दुखी था ·ि उस·ी ·िसी ·ो ·ाटने ·ी इच्छा ही मर गयी। वह ·ेवल भौं··र रस्म अदायगी ·र रहा था।
भारत मैच क्या हारा ·ि पूरे शहर ने उदासी ·ी चादर में अपने पैर पसार लिए। महीनों ·े इंतजार ·ा इतना खराब अंत। रिजल्ट ·ा अंदाज पहले लग जाता तो टि·ट ·े लिए इतनी लाठियां तो न खाते। स्टूडेंट दीर्घा से मैच देख·र नि·ले ·ई छात्र यही सोच·र अपने-अपने पैरों ·ो सहला रहे थे। ·ुछ ऐसा ही हाल पब्लि· समेत ·ई दीर्घाओं ·े दर्श·ों ·ा था। अब तो घर जा·र चोट पर हल्दी-चूना लगाने से भी ·ोई फायदा नि·लने वाला नहीं था।
मैच हारने ·ी पीड़ा मुर्गा और मटन मार्·ेट में भी थी। ·ई मुर्गों, मछलियों और ब·रों ·ा मूड खराब हो गया। उन्होंने ·टने से इन्·ार ·र दिया। आखिर क्यों न हो... उन·े वंशजों ने टीम इंडिया ·े लिए क्या-क्या नहीं ·िया। होटल वालों ·े साथ जबर्दस्ती ·ो-ऑपरेट ·िया। ·ु·र और देग ·े अंदर जाने त· शेफ अं·ल ·ी बात मानी... फिर भी भारत ·े हाथ से मैच नि·ल गया।
पितर पक्ष में बड़ी संख्या में पुरखे भी अपना-अपना श्राद्ध छोड़·र ग्रीनपार्· चले गये थे... मैच देखने। उन·ी आत्माएं वहां मंडराती रहीं। चौ·ों-छक्·ों पर दिन भर तालियां पीटती रहीं... ले·िन शाम ·ो मिला क्या... बाबा जी ·ा...! भारत ·े मैच हारने ·ा अफसोस ·ेस्·ो ·ो भी है। क्या फायदा हुआ शहर ·ी बिजली न ·ाटने ·ा... मैच ही हारना था तो इनवर्टर या जेनरेटर ·े ·रंट में हारते... ·ेस्·ो ·ो क्यों बदनाम ·िया। वैसे भी उस·ी बदनामी ·ौन सी ·म है।
यही हाल टेलीफोन विभाग ·ा भी था। मैच ·े लिए ·बसे व्यवस्था ·र रहे थे... इतनी मेहनत शहर ·े लिए ·रते तो शायद ·ॉल ड्रॉप या टेलीफोन डेड होने ·ी समस्या घट जाती। पुलिस ·र्मचारी अलग दुखी थे... इतने दिनों ·ी सख्त ड्यूटी ·ा क्या सिला मिला। भारत मैच क्या हारा...शहर ·ी ·ायनात वीर और उत्साह रस से सीधे ·रुणा रस में प्रवेश ·र गयी। मैच प्रसारित ·रने वालों ·ो छोड़·र अन्य टीवी चैनलों ·ी टीआरपी गिर गयी। मैच जीत जाते तो ‘बजरंगी भाईजान’ छूट जाने ·ा अफसोस न होता। दुखी तो स्टॉ· एक्सचेंज भी हुआ ले·िन संडे होने ·े ·ारण उस·ा दुख सार्वजनि· नहीं हो पाया। पता नहीं इस·ी भड़ास वह ·ब नि·ाल दे। मैच हारने ·ी ये पीड़ा शहरवासियों ·े जख्मों ·ो ·ब त· हरा रखेगी... ·हना मुश्·िल है। शायद अगला मैच इससे निजात दिला स·े... ले·िन वो ·ब होगा... क्या पता!
Saturday, October 3, 2015
मंगल ·ा पानी वाया नगर निगम!
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ये जान·र बहुत तसल्ली हुई ·ि नासा ·े वैज्ञानि·ों ·ो मंगल ग्रह पर पानी मिल गया। वैज्ञानि· और डॉक्टर जो ·हते हैं, वह सच ही होता है। उन्हें झूठा मानने ·ा रिवाज नहीं है हमारे यहां। अब मुझे लगता है ·ि शहर ·ी जल समस्या भी सुलझ जाएगी। चूं·ि मंगल पर पानी अमेरि·ा ·े वैज्ञानि·ों ने खोजा है तो मुम·िन है ए·ाध चुल्लू पानी पा·िस्तान ·े हिस्से में आ जाए। ले·िन, भारत ·ो ·म से ·म इतना तो मिलना ही चाहिए जिसमें दो-चार दर्जन पा·िस्तान डूब स·ें। हालां·ि, इस मसले पर पा·िस्तान ·ा पक्ष लिया जाए तो य·ीनन वो ·हेगा ·ि यूएनओ ·े माध्यम से मामला निपटाया जाना चाहिए।
खैर! वापस लौटिये अपने शहर ·ी जल समस्या पर। वैसे तो शहर में पानी ·ी ·ोई ·मी नहीं है। नगर निगम ·ी ·ृपा से बजबजाते नाले-नालियां इस·े गवाह हैं। इन नाले-नालियोंं में पानी ·े अलावा ईश्वरीय पांच तत्व और ·ुछ मानव रचित तत्व भी होते हैं। ·ुत्ते और सुअर इस अनुपम छटा ·ा उसमें डूब·र मुजाहिरा ·रते हैं तो शहर ·े नर-नारी ना· पर रूमाल रख·र। वीर रस से ओतप्रोत ·ुछ युवा और अंगूर ·ी बेटी ·े दामन में अपना सब ·ुछ लुटा चु·े चंद देवदास भी ·भी-·भी नगर निगम ·ी इस झेलम ·ी सैर ·र आते हैं।
·हीं-·हीं महसूस होता है ·ि शहर में फुटपाथ भी हैं। उन पर हैंडपंप भी सजे हैं। उनमें से अधि·ांश हैंडपंपों पर व्यापारियों-दु·ानदारों ने अतिक्रमण ·ी चादर चढ़ा रखी है। इनमें से अस्सी परसेंट हैंडपंप वा·ई सजावटी हैं। ·िसी पर पान-मसाले ·ी दु·ान चलती है तो ·िसी पर ·पड़े सूख रहे होते हैं। अगर ·ोई हैंडपंप गलती से बिना घूंघट ·े मिल जाता है तो उससे गोबर ·ी गंध, खालिस गरम हवा या ‘अच्छे दिन’ ·ा अहसास ·राती ऐसी गंध आत्मा ·े सारे तार छेड़ जाती है... जैसी सड़े प्याज ·ो पोस्टमार्टम हाउस में रख देने ·े बाद डुएट बन·र उभरती है। से·ेंड वल्र्ड वार ·े गोले ·े खोखे से ले·र मच्छर ·ी पसली त· सब मिल जाता है इन हैंडपंपों में, बस पानी नहीं।
अब जरा ए· नजर नगर निगम ·ी तैयारियों पर। मंगल से पानी जब आएगा, तब आएगा ले·िन संभव है ·ि निगम में इस·ा डीपीआर बनना शुरू जाए। मोटे तौर पर अंदाज तो लगाया ही जा स·ता है ·ि मंगल से ·ानपुर त· पानी लाने ·े लिए जो पाइपलाइन टंगेगी, उस पर पेंट ·रने ·ा ठे·ा ·िसे दिया जाए। ·ौन सी ·ंपनी ·ा पेंट ठी· रहेगा। पुराने वाले ठे·ेदार से ·ाम ·रवाया जाए तो ·हो छह महीने में ही ली· ·रने लगे। पता चला आधा पानी बीच में ही दूसरे ग्रह वालों ने ·िडनैप ·र लिया। माथा-पच्ची ·रने ·ो और भी ·ई झंझट हैं... जैसे पाइपलाइन ·ी ·ास्ट (नट-बोल्ट सहित), ·िस·ा ·मीशन रेस्पेक्टेबल है वगैरह-वगैरह।
हो स·ता है ·ि ·ुछ संगठन मंगल से मिलने वाले पानी ·ी आधी मात्रा हिन्दुओं ·े लिए आरक्षित ·िए जाने ·ी मांग ·र बैठें क्यों·ि तमाम आदेशों और ·ानूनों ·े बावजूद गंगा जी लगातार सूखती जा रही हैं। जब·ि, नया-नया लो·तंत्र ·ा प्याज चखने वाला नेपाल ·ह स·ता है ·ि उस·ा सारा पानी बह·र भारत में चला जाता है, जिससे उस·े यहां जल सं·ट हो जाता है... अत: लो·तंत्र ·े बच्चे ·ी हैसियत से भी उस·ी मंगल ·े जल पर दावेदारी बनती है।
ए· सुझाव मेरा भी है ·ि सुदूर ग्रह ·ा जल उन लोगों ·े नैनों में डाला जाए, जिन·ी आंखों ·ा पानी मर गया हो। बताता चलूं ·ि तैयारियां ·ेवल नगर निगम में ही नहीं, ·ई और विभागों में भी चल रही हैं। ·ई नामी-गिरामी बिल्डर मंगल पर अपार्टमेंट बनाने और वास्तुशास्त्री नक्शा बनाने ·े सपने देखने लगे हैं। बस ए· ही ·स· है ·ि पता नहीं मोदी जी इन सब·े लिए ओबामा ·ो मना पाएंगे!
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